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बाखबर: राष्ट्र सारा देखता है

कुछ ‘श्रमिक स्पेशल’ चलाने के बावजूद राष्ट्र सारा देखता है कि वे लौट रहे हैं, कभी न आने के लिए लौट रहे। उनका भरोसा उठ गया है! कौन है जो भरोसा दिलाए?

दिल्ली-यूपी बार्डर पर रोती एक प्रवासी मजदूर। (PTI photo)

कुछ तो करो सरकार/ हम मजदूरों का सूना पड़ा घर द्वार/ हमें हमारे घर भेज दोे सरकार’- ‘टाइम्स नाउ’ पर अपने घर के लिए पैदल ही चल दिया एक मजदूर कैमरे के आगे गा रहा है और राष्टÑ सारा देख रहा है! बेरोजगार और बेघर हुए लाखों गरीब मजदूर सड़कों पर गिरते-पड़ते-घिसटते अपने घरों की ओर जा रहे है।

चैनलों का राजनीतिक दिल भी इनको देख कर पिघल गया है। एंकर, रिपोर्टर इनकी आवाज बन रहे हैं, लेकिन कोई नहीं सुनता!
चैनलों पर पीएम के संबोधन पर बहसें हैं। वित्तमंत्री के दिए पैकेज पर बहसें हैं और इन सबके गाल पर तमाचा मारते हुए वे बेघर-बार हुए, अपने घरों को जाते हुए पामाल और बेहाल मजदूरों के हजूम हैं!

सिर पर गठरी लादे, बच्चों का हाथ पकड़े, पत्नी को साथ लिए वे चलते जाते हैं। कोई अपनी पीठ पर अपने बूढ़े पिता को ढो रहा है, तो कोई अपनी पीठ पर अपनी बूढ़ी मां को उठाए चल रहा है, किसी औरत की गोद में बच्चा है, तो कोई ट्रक पर लटकी रस्सी के सहारे अपने बच्चे को पीठ पर लादे लटक गया है, ताकि छत पर चढ़ सके।…

आपको देख-देख दहशत होती है कि कहीं ये गिर न जाएं।… एक एंकर क्षुब्ध होकर कह उठती है कि क्या सरकारें इनको नहीं देख पा रहीं? क्या वे अंधी बहरी हैं? कोई इनके घर तक जाने के लिए इंतजाम क्यों नहीं करता? एक ओर एंकर कह उठती है कि जिन्होंने हमारे शहर बनाए, हमने उनको ऐसा लाचार बना कर अकेला छोड़ दिया है?

मन में धिक्कारने लगता है!
एनडीटीवी का वह रिपोर्टर दुर्घटना के उस दृश्य को कवर करते लगभग बिलख उठता है कि जिस टेंपो ड्राइवर से उसने सुबह बात की थी, जो अपने टेंपों में अपने बाल-बच्चों के साथ घर जा रहा था, रास्ते में हुई दुर्घटना में क्षत-विक्षत पड़ा है और पत्नी, बच्चे बुरी तरह घायल हैं!

और उस चैनल को देखिए, जो लांग शॉट में अपने घर की ओर जाते मजदूरों की लंबी लाइनों को दिखा रहा है और जिनको हजारों मील दूर जाना है। धूप-ताप, भूख-प्यास, हारी-बीमारी सहते पांवों में छालों के बावजूद वे चले जा रहे हैं, चले जा रहे हैं और रिपोर्टरों और कैमरों के अलावा उनको पूछने वाला कोई नहीं है!

एक रिपोर्टर बताता है कि आंध्र प्रदेश से मध्यप्रदेश जा रहे हैं ये, पंजाब के लिए जा रहे हैं ये, गुजरात से यूपी के लिए निकले हैं। एक आदमी जुगाड़ से बनाई ट्राली में अपनी गर्भवती पत्नी और एक बच्चे को बिठा कर रस्सी से बांध कर खींचे जा रहा है। उसके चेहरे पर न निराशा है न हताशा है, सिर्फ जिजीविषा और जीवट है।

अपने घरों में बंद हम अपने आप से कातरता से पूछते हैं कि क्या वह अपने गांव पहुंच पाएगा? एक चैनल एक मजदूर आरिफ को दिखा रहा है, जो पंद्रह सोलह सौ किलोमीटर दूर अपने घर के लिए साइकिल पर चल पड़ा है। रास्ते में ट्रक का सहारा लेता है और चार दिन में किसी तरह घर तक आता है, लेकिन अपने बीमार पिता को नहीं बचा पाता।

और, वह औरत जिससे ठीक से चला तक नहीं जा रहा, एक सूटकेस घसीटती चल रही है, उस सूटकेस पर उसका तीन-चार साल का बच्चा निढाल होकर चिपक कर सो-सा गया है। लखनऊ से एमपी के लिए लौटने वाले राज मिस्त्रियों से जब एक रिपोर्टर पूछता है कि आप क्यों जा रहे हैं, तो एक कहता है कि मरना है तो अपने घर जाकर मरेंगे, वहां हमारे बाल-बच्चों की कोई देखभाल तो करने वाला होगा। यहां हमारा कौन है?

वे लौटते हुए ट्रेन से कट जाते हैं। दुर्घटनाओं में मर जाते हैं, लेकिन किसी भी नेता की आंख में एक आसूं तक नहीं आता! और, ये गुजरात के भुज की तस्वीरें हैं। सीन में हजारों मजदूर सड़क पर हैं। वे जिस ट्रेन से अपने घर वापस जाना चाहते थे वह अचानक रद्द कर दी गई है। वे निराश और खीझे हुए हैं। कुछ ने सड़क रोक दी है, पुलिस वाले उनको बरज रहे हैं। एक मंत्री अंगवस्त्र पहन कर ‘गुड गवर्नेंस’ का दावा करने में मगन हैं!

यह क्या हो रहा है? एक एंकर स्वयं विचलित होकर कह उठती है- ये है हमारे कल्याणकारी राज्य की असलियत! कटिहार स्टेशन पर बिस्कुटों को लेकर कुछ मजदूर आपस में लड़ जाते हैं और अपने घरों में सुरक्षित हम उनको झगड़ते देख ‘भोजन पर दंगों’ की आशंका से त्रस्त होने लगते हैं।

एक चैनल पर, केरल के वित्तमंत्री टामस आइजक ने सरकार से सवाल किया कि मजदूरों के अंतरराज्यीय विस्थापन की जिम्मेदारी नियमत: केंद्र की है, वह इनके जाने की मुफ्त व्यवस्था क्यों नहीं कर रहा? लेकिन इसका जवाब नहीं आता।

हमने ये दिया, हमने वो दिया, यह तो खूब सुनाई पड़ता है, लेकिन इन मजदूरों की घर जाने की आर्त पुकार नहीं सुनाई पड़ती।
मनीष तिवारी कह उठते हैं- ऐसा लगता है कि लोगों को उनके भाग्य के भरोसे छोड़ दिया गया है।
जी हां, कुछ ‘श्रमिक स्पेशल’ चलाने के बावजूद राष्ट्र सारा देखता है कि वे लौट रहे हैं, कभी न आने के लिए लौट रहे। उनका भरोसा उठ गया है! कौन है जो भरोसा दिलाए?

इस दुष्काल पर याद आती है वह कविता जो कहती है:
‘भूख से बेहाल होकर,
धर्म धीरज प्राण खोकर,
बाप बेटा बेचता है,
राष्ट्र सारा देखता है!’

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