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तीरंदाज: आराम बड़ी चीज है

जब व्यक्ति आराम में होता है, तो उसे कुछ नया सूझता है, उसमें नई चाहतें पैदा होती हैं, जिनसे कुछ न कुछ संतुष्टि उत्पन्न होती है। काम की भागम भाग संतुष्टि नहीं देती, बल्कि सीने में जलन और दिल में खलिश पैदा करती है। दरअसल, काम जरूरी है, पर काम नपा-तुला होना चाहिए, बेलगाम नहीं होना चाहिए।

प्रतीकात्मक चित्र।

आराम करना एक जीवन शैली है, जैसे कि काम करने को जीवन शैली समझा जाता है। दोनों में फर्क सिर्फ इतना है कि काम करने को अच्छा और आराम को बुरा माना जाता है। कहा जाता है कि काम करना व्यक्ति और समाज दोनों के लिए उपयोगी है। व्यक्ति काम द्वारा जीवन यापन करता है, तो दूसरी ओर समाज, समुदाय के साझे प्रयास से लगातार प्रगति करता जाता है। काम दशा और दिशा को सुधारता है। इतिहास में आज तक जितनी भी भव्य सभ्यताएं निर्मित हुई हैं, वे लोगों की अथक क्रियाशीलता की वजह से हुई हैं। कंधे से कंधा मिला कर दिन-रात लोगों ने परिश्रम किया है, सुख-सुविधा और भोग त्याग कर कड़ी तपस्या के जरिए उन्होंने एक उपलब्धि पर दूसरी उपलब्धि खड़ी की है, जिससे आधुनिक युग का निर्माण हुआ है। हजार साल पहले के जीवन से तो हम अकल्पनीय रूप से बेहतर हुए हैं और आज की तारीख में भी रोज नए प्रवधान हम अपने लिए करते जा रहे हैं, जिससे जीना और सुविधाजनक होता जा रहा है।

मानव कल्पना का प्रकट रूप काम है। वह मेधा उर्जा का स्वंभू हथकरघा है। आदमी के दिमाग में खयाल आता है और उस खयाल को वास्तविक स्वरूप देने में वह जुट जाता है। जहां एक ओर बड़े-बड़े खयालात जैसे कि सिफर (जीरो) का इजाद और हवा में उड़ने का दिमागी लोचा फलित हुए हैं, तो दूसरी ओर पेड़ से उतर कर और गुफाओं से बाहर आकर अपना छोटा-सा घर बनाने की चाह भी पूरी हुई है। जैसे कि सिफर में अंक जुड़े और फिर उनसे गिनती बनी, जिसने जाकर ब्रह्मांड में व्याप्त सितारे गिनने के लिए हमें सक्षम बना दिया, उसी तरह घास-फूस की झोपड़ी से उठ कर हम गगनचुंबी इमारतों में आ बैठे हैं। वास्तव में काम एक दिमागी खलल है। कुछ लोगों में यह खलल ज्यादा होती है और बाकी में कम। पर ज्यादा हो या कम, खलल सबमें होती है। इसकी वजह से ही हम रोज सुबह उठ कर सबसे पहले अपने काम के बारे में सोचते हैं और उसे करने के लिए निकल पड़ते हैं। यकीनन काम हमारे जीवन की धुरी है, जिसके बिना हम बिखर जाएंगे। कहा तो यहां तक जाता है कि अगर काम नहीं करोगे तो फिर क्या करोगे?

पर क्या काम ही जीवन है? क्या आराम हराम है? एक सामान्य आदमी का जीवन आज काम में बुरी तरह से सना हुआ है। नौकरी हो या व्यापार, हम सब उसमें दत्तचित्त होकर लगे हुए हैं। वही एकमात्र विकल्प है। हमें यकीन है कि काम के जरिए वे सब साधन-सामग्री जुटा पाएंगे, जिससे हम अपने जीवन को सफल घोषित कर सकते हैं। चूहा दौड़ में शामिल रहना एक तरह से सफलता की निशानी मानी जाती है। इस दौड़ में जो सबसे ज्यादा हांफ रहा है, वह सबसे ज्यादा सफल माना जाता है। इससे कोई मतलब नहीं है कि स्वयं के लिए व्यक्ति ने क्या किया या फिर सब कुछ करने के बाद भी वह संतुष्ट है कि नहीं। एक तरह से देखा जाए तो काम प्रेरित सामान्य जीवन पौराणिक भस्मासुर की तरह हो गया है। उसको बुद्धि और विवेक का वरदान तो जरूर है, पर दूसरे की देखा-देखी वह नाचता रहता है और फिर उसी की तरह अपने सिर पर हाथ रख कर भस्म हो जाता है। हम जानते हैं कि हममें सितारे की तरह चमकने की कुव्वत है, पर हम काम की होड़ में लग कर अपने को राख कर लेते हैं। काम करके हम वे सुविधाएं अपने लिए जोड़ते हैं जिनके भोग की हमें कोई खास जरूरत नहीं है। हम कहीं भी ठहर कर नहीं सोचते हैं। कभी भी काम से आराम नहीं लेते हैं।

वैसे सामान्य रूप में काम क्या है? वही ढाक के तीन पात। कुछ पैसे और फिर कुछ और पैसे पाने की अंतहीन लोलुपता। हार्वर्ड बिजनेस रिव्यू ने 2013 में बारह हजार पेशेवरों, यानी हम और आप जैसे लोगों, का एक अध्ययन किया था, जिसमें उसने पाया था कि आधे से ज्यादा पेशेवरों का दृढ विश्वास है कि उनके काम का न तो कोई महत्त्व है और न ही उसका कोई मतलब है। उनका कहना था कि काम करके उन्हें कोई खुशी या संतुष्टि नहीं मिलती है। वे बस उसे किए जा रहे हैं, क्योंकि इसके आलावा वे और क्या कर सकते हैं? एक सौ बयालीस देशों में हुए एक और सर्वे में पाया गया कि दो लाख तीस हजार पेशेवरों में से केवल तेरह प्रतिशत लोग ऐसे थे, जिनको अपना काम पसंद था। सतासी प्रतिशत लोगों ने अपने काम को गोबर बताया (बुलशिट जॉब) और उसकी उपयोगिता को गोबर से कंडे थाप कर चूल्हा जलाने तक ही मापा था। साफ है कि हम सब अपने काम से बहुत असंतुष्ट हैं, पर हमको उससे निकल कर भाग जाने का कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा है। हम फंस गए हैं। असहाय हो गए हैं।

अचंभे की बात यह है कि इस विकट परिस्थिति में अपने को फंसा पाकर भी हमें इससे उबरने का सबसे आसान तरीका नहीं सूझ रहा है। काम का विकल्प आराम है। हम उसको वैसे ही क्यों नहीं अपना सकते, जैसे हमने काम को अपनाया हुआ है? आराम का यहां मतलब निठल्लापन नहीं है, बल्कि मेधा उर्जा का काम और आराम के बीच सही संतुलन बनाने से है। काम से कल्पना नष्ट होती है, मेधा सुप्त होती जाती है और शरीर ध्वस्त हो जाता है। इस स्थिति को ‘बर्न आउट’ कहा जाता है। इसके विपरीत आराम है। आराम जोत जगाता है, मेधा उर्जा को संरक्षित करके कल्पना को सृजन की ओर प्रेरित करता है। आराम में कोई ‘बर्न आउट’ नहीं है, बल्कि नित्य रोज बढ़ती सबलता है। जब व्यक्ति आराम में होता है, तो उसे कुछ नया सूझता है, उसमें नई चाहतें पैदा होती हैं, जिनसे कुछ न कुछ संतुष्टि उत्पन्न होती है। काम की भागम भाग संतुष्टि नहीं देती, बल्कि सीने में जलन और दिल में खलिश पैदा करती है। दरअसल, काम जरूरी है, पर काम नपा-तुला होना चाहिए, बेलगाम नहीं होना चाहिए। उससे फुर्सत लेना बेहद जरूरी है। आराम बड़ी चीज है मुहं ढक कर सोइए, वाजिब नसीहत है। आराम से बड़ा सुख और कोई नहीं है। आराम से बड़ा काम भी शायद हमारे जीवन में नहीं है। इससे खूब करिए और फिर देखिए काम कैसे बनते हैं।

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