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प्रसंगवशः द्रोह या विद्रोह

अगर इतिहास के सत्य को बचाना है तो हमें युद्धों, व्यक्तियों, घटनाओं से हट कर संगीत, नृत्य, ललित कलाएं, साहित्य, संस्कृति और मनुष्यता का इतिहास लिखना और पढ़ना होगा, वरना राजनीति के सिर पर बैठ कर हम झूठ का इतिहास, आरोपों, घोटालों, भ्रष्टाचारों और अपराधों का इतिहास, षड्यंत्रों और जाति-धर्म-हिंसा का इतिहास पैदा करते रहेंगे।

Author June 10, 2018 04:38 am
प्रतीकात्मक चित्र

इतिहास तथ्य पर आधारित होता है। उसकी व्याख्या नहीं की जा सकती, क्योंकि वह साहित्य नहीं है। भारत की प्राचीन परंपरा वांङमयी रही है, इतिहास रचना की नहीं। इसलिए हमने काव्य को भी इतिहास की पोशाक पहना दी। हमारे पास जो भी इतिहास-बोध है, वह जन-श्रुतियों पर आधारित है, न कि वस्तुनिष्ठ लिखित तथ्य पर। भारत में इतिहास-लेखन का काम दस्तावेज की तरह हुआ, इस्लाम के आगमन के बाद। ये इतिहास भी आधुनिक इतिहास की तरह तो नहीं थे, मगर इनमें बादशाहों और हुकूमतों और उनकी शासन-प्रणाली का तारीखी वर्णन था। इसलिए ग्यारहवीं सदी में सुबुक्तगीन के आक्रमण से लेकर अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर और उनके वारिसों के अंत और मराठों के देश भर में प्रभुत्व तक के सारे ऐतिहासिक विवरण तारीख या तवारीख या इतिहास कहलाए तो जरूर, मगर वे या तो समकालीनों के जीवन की रंगीन या युद्धवादी कथाएं थीं या शुद्ध रूप से बादशाहों के जिंदगीनामे। वे आज भले इतिहास की तरह संदर्भ बन जाएं, मगर थे तो वास्तव में आत्मकथात्मक और अतिशयोक्तियों से भरे। इतिहास तो वे थे ही नहीं।

अब सवाल है कि इतिहास-लेखन की परंपरा हमारे पास नहीं रही, तो हम अपने पुरा-इतिहास और पुरातत्त्व को कैसे देखें? प्राचीन सम्राटों, कवियों, कलाकारों, स्मारकों, ग्रंथों के बारे में कैसे जानें कि कब किसने क्या लिखा, किया या ऐसा कुछ किया कि वह इतिहास बन गया? चंद्रगुप्त, चाणक्य, अशोक के कुछ साक्ष्य मिलते हैं। कुछ पढ़े-अनपढ़े शिलालेख मिलते हैं, कार्बन या डीएनए परीक्षण से उनके काल निर्णय भी होते हैं, मगर ऐसा कुछ नहीं मिलता कि उनका कोई विश्वसनीय इतिहास हो। प्राचीन से लेकर आज तक का इतिहास-बोध हमारे पास अत्यंत भावुकता भरा है। जिस प्रकार मुगलों ने अपने समय का दस्तावेजीकरण किया, अंग्रेजों ने बाकायदा तारीखवार, शासकवार, घटनावार और स्थितिवार इतिहास लिखा और लिखवाया, वैसा भारतीय बौद्धिकों और लेखकों ने नहीं किया। उनका भी इतिहास था तो उनकी ही मरजी का, फिर भी लिखा गया था व्यवस्थित चालाकी के साथ। हमारे यहां कवि, कथाकार, कलाकार आदि तो बहुत हो गए और चारण-कवियों ने राजा-महाराजाओं की वीरगाथाएं भी लिखीं, मगर इतिहासकार का जन्म भारत में लगभग दो शताब्दी पहले ही हुआ।

अब यह तो मानना होगा कि भले हमें अपने समकालीन इतिहासकार न मिले हों, मगर आधुनिक भाषा ने इतिहासकारों की एक आकाशगंगा रच दी। प्राचीन भारत-संस्कृति और इतिहास (इंडोलाजी) इतिहास का एक विषय बना, फिर मध्यकाल के नाम पर इतिहास को पहचान दी गई और वह दूसरा इतिहास बना और बाद में आधुनिक इतिहास आया, जिसे प्रारंभ में यूरोप और इंग्लैड या अंग्रेजी साम्राज्य का इतिहास कहा गया। इस प्रकार आधुनिकता ने इतिहास लेखन किया तो अवश्य, मगर वह मुगलों, मराठों, राजपूतों, अंग्रेजों का इतिहास बन गया। भारत की एक समग्र सार्वभौमिकता का वैसा इतिहास आज तक उतना विश्वसनीय नहीं बन पाया, जिस प्रकार पश्चिमी देशों के इतिहास वहां के इतिहासकारों ने रचे। हमारे यहां एक पूरी कौम का इतिहास कभी लिखा ही नहीं गया। आज विडंबना यह है कि हमारा इतिहास-बोध न तटस्थ और निरपेक्ष है, न वस्तुनिष्ठ और विश्वसनीय और न सार्वभौम रूप से भारतीय। हमने इतिहास को जाति, धर्म, पंथ, वस्त्र, भांडों, युद्धों की जीत-हारों और थोथे आत्म गौरव की खिचड़ी बना दिया।

भारत आज जितना समग्र रूप से स्वतंत्र, स्वायत्त और स्वाधीन है उतना कभी नहीं रहा। भारत के पास अपने भारत होने का जितना आत्म-गौरव आज है, वह भी कभी नहीं रहा। विरोध और विरोधाभास कई हैं, तर्क और कुतर्क कई हैं, जातीय स्मृति का घमंड और पाखंड भी बहुत है, बावजूद इस सबके भारत का एक संपूर्ण भूगोल है, एक संपूर्ण ऐतिहासिक-अस्मिता है और भले बंटा-बंटा हो, मगर टूटा टूटा नहीं है। इतना अवश्य है कि इतिहास को विकृत किया गया और किया जा रहा है। इतिहासवाद तक चल पड़ा है। अब कोई इतिहासकार मार्क्सवादी या समाजवादी निष्ठा से इतिहास लिख रहा है तो कोई हिंदूवादी और कोई इस्लामी तरीके से।

किताबों में जो इतिहास दिया गया है, वह स्कूलों-कालेजों के पाठ्यक्रमों का पाठ तो है, मगर ऐसा पाठ नहीं जिससे हमारी पीढ़ी हमारे पूर्वजों का सही योगदान भी जाने और उनका झूठ भी पहचाने। इतिहास पूर्वजों का पर्व नहीं है, न झूठ को सच बताने का गर्व। वह मनुष्य को उसके मनुष्यवान बनाने की भी स्मृति है। हमने भारतीय कौम का तिथिवार इतिहास तो लिखना शुरू किया, मगर हमारे इतिहास लेखन की प्रेरणा और परंपरा पश्चिम ही रहा। पर डॉ. धर्मपाल ने स्वयं ब्रिटिश लाइबेरी, लंडन में बैठ कर अंग्रेजों के शिक्षा और प्रशासनिक छल की पोल खोली है। सुंदलाल का ‘भारत में अंग्रेजी राज’ भी अंग्रेजों के कुराज का गवाह है। अंग्रेजी न्याय के नाम पर क्लाइव और वारेन हेस्टिंग्ज पर लंदन में मुकदमा तो चलाया, मगर उन्हें अंग्रेजी शासन के हित में किए गए काम के नाम पर बरी कर दिया गया। इस प्रकार अंग्रेजी शासन ने हमें विरासत में सरकारी भ्रष्टाचार, सरकारी शोषण, आतंक और भारतीय निष्ठाओं, भाषाओं, शिक्षा व्यवस्थाओं, न्याय प्रजातियों सबको नष्ट करके अंग्रेजी विधान हम पर लाद कर हमें गुलाम बना लिया।

इतिहास के साथ स्वयं हमने भी धोखा किया। अगर वैलूर के सैनिक विद्रोह और 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में देशी राजा, महाराजा, जमींदार, जागीरदार, पूंजीपति, उद्योगपति सब एक साथ उठ खड़े होते तो भारत आजाद होता और फिर न विभाजन होता और न कश्मीर समस्या होती। यहां तक कि हमारी अविभाजित ताकत से चीन भी थरार्ता रहता। आज हम उत्तर-आधुनिक समय में हैं। तकनीकी ने हर चीज को नकार कर उसकी मृत्यु घोषित कर दी है। इतिहास, साहित्य, लेखक, किताब, विज्ञान सबके सब वेब साइटों में जाकर अपनी भौतिक उपस्थिति खो बैठे हैं। अब इतिहास प्रेरणा का विषय नहीं। अब तो इतिहास टुकड़े-टुकड़े हो गया है।

मार्क्सवादी, समाजवादी, सांप्रदायिक, धर्मनिरपेक्ष, जातिवादी, धर्मवादी, राष्ट्रवादी, देशद्रोहवादी झूठों से हमारे इतिहास के सत्य की पवित्रता राजनीति द्वारा अपवित्र की जा रही है। हमें अपनी एकता, विविधता याद दिलानी पड़ती है, अपनी संस्कृति, सभ्यता, परंपरा याद दिलानी पड़ती है फिर भी हम याद कुछ नहीं रखते। इतिहास तो यादों का ही अनुशासन है। फिलहाल यही कहा जा सकता है कि हम इतिहास-द्रोह के समय में स्वयं अपनी मनुष्यता से विद्रोह कर रहे हैं। अगर अपनी-अपनी विचारधारा में रंगा इतिहास ही हमारा इतिहास है, तो ऐसे इतिहास से तो बेहतर है इतिहास का अंत। अगर इतिहास के सत्य को बचाना है तो हमें युद्धों, व्यक्तियों, घटनाओं से हट कर संगीत, नृत्य, ललित कलाएं, साहित्य, संस्कृति और मनुष्यता का इतिहास लिखना और पढ़ना होगा, वरना राजनीति के सिर पर बैठ कर हम झूठ का इतिहास, आरोपों, घोटालों, भ्रष्टाचारों और अपराधों का इतिहास, षड्यंत्रों और जाति-धर्म-हिंसा का इतिहास पैदा करते रहेंगे।

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