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वक्त की नब्जः विकास का झुनझुना

प्रधानमंत्री बहुत बार कह चुके हैं गर्व से कि उनके दौर में व्यवसाय करना इतना आसान कर दिया गया है कि विदेशी निवेशक भागे-भागे आ रहे हैं भारत में निवेश करने। क्या उन्होंने इस बात पर भी ध्यान दिया है कि देसी निवेशक हजारों की तादाद में भारत से भाग गए हैं पिछले चार सालों में?

Author May 27, 2018 04:30 am
संपन्नता-समृद्धि की बातें छोड़ कर वही गरीबी-गरीबों की बातें करने लगे, जो हम सत्तर वर्षों से कांग्रेस के समाजवादी प्रधानमंत्रियों से सुनते आ रहे हैं

कल मोदी सरकार के चार साल पूरे हुए। सो, अन्य राजनीतिक पंडितों की तरह मैंने भी गुजरे चार वर्षों की उपलब्धियों और खामियों पर ध्यान से सोचने का प्रयास किया इस लेख को लिखने से पहले। नरेंद्र मोदी की भक्तिन मानी जाने के नाते मैंने दिल लगा कर कोशिश की अच्छी चीजों को अहमियत देने की, लेकिन बार-बार उन दो गलतियों की तरफ ध्यान जाता रहा, जो मेरी नजर में सबसे बड़ी वजह हैं, जिसके चलते अब सर्वेक्षण बताने लगे हैं कि प्रधानमंत्री की लोकप्रियता कम हो गई है पिछले कुछ महीनों में। मेरी राय में पहली गलती मोदी ने तब की जब राहुल गांधी ने लोकसभा के अंदर उन पर ताना कसते हुए कहा कि वे ‘सूट-बूट की सरकार’ चला रहे हैं। लगता है कि इस ताने ने मोदी के दिल पर गहरी चोट पहुंचाई, सो जिस आर्थिक दिशा में देश को ले जाना चाहते थे उसे त्याग कर वापस लौट आए कांग्रेसी प्रधानमंत्रियों की दिखाई घिसी-पिटी राह पर।

संपन्नता-समृद्धि की बातें छोड़ कर वही गरीबी-गरीबों की बातें करने लगे, जो हम सत्तर वर्षों से कांग्रेस के समाजवादी प्रधानमंत्रियों से सुनते आ रहे हैं। इस देश के गरीब लोग भी जान गए हैं कि गरीबी बातों से नहीं मिट सकती, इसलिए जब परिवर्तन और विकास की बातें सुनी 2014 के आम चुनाव में, तो उन्होंने मोदी को पूर्ण बहुमत दिया। इसे देख कर कांग्रेस के रणनीतिकार घबरा गए। होशियार हैं ये लोग और मोदी की बातें सुन कर इसलिए डर गए, क्योंकि जानते थे कि अगर आर्थिक नीतियां बदल गर्इं भारत की और मोदी उन साधनों में निवेश करने लग गए, जिनसे असल में ग्रामीण भारत में रोजगार पैदा होंगे तो 2019 में उनकी जीत तय है। ग्रामीण भारत में असली रोजगार तब पैदा होंगे जब कृषि से जुड़े उद्योगों में निवेश होने लगेगा, जब किसान अपनी फसलें तेजी से हवाई अड्डों तक पहुंचा सकेंगे दुनिया के बाजारों में निर्यात करने के लिए। ऐसा तब संभव होगा जब सड़कें अच्छी बनेंगी देहातों में और जब कोल्ड स्टोरेज इतने बन जाएंगे कि भारत की आधी सब्जियां और फल खेतों में ही बर्बाद नहीं होंगे।

प्रधानमंत्री बनने से पहले मोदी खुद ऐसी बातें किया करते थे, लेकिन राहुल गांधी ने ताना क्या कसा कि सीधे लाइन पर आ गए और मनरेगा जैसी खैरात बांटने वाली योजनाओं में निवेश बढ़ाने लगे। काश कि ऐसा करने के बदले उन्होंने राहुल गांधी के ताने का जवाब यह दिया होता कि उनका सपना है कि निकट भविष्य में गरीब से गरीब भारतीय की क्षमता हो सूट-बूट खरीदने की। काश कि वापस खैरात बांटने और किसानों के कर्जे माफ करने पर न आ गए होते। वही पैसा अगर गरीबी हटाने के असली साधनों में निवेश होता तो भारत की शक्ल आज बदल गई होती।

मोदी की दूसरी गलती, मेरी नजर में, तब हुई जब मोहम्मद अखलाक की हत्या के बाद उन्होंने मौन रहने का फैसला किया। छोटी बात नहीं थी यह हत्या। अखलाक को उसके घर के अंदर से घसीट कर हिंदुत्ववादी हत्यारों ने सरेआम दादरी के बिसाहड़ा गांव में पीट-पीट कर मारा था सिर्फ इसलिए कि उनको शक था कि जो गोश्त उसके फ्रिज में मिला वह गाय का था। प्रधानमंत्री जब मौन रहे तो हिंदुत्व कट्टरपंथियों ने समझा कि उनको लाइसेंस मिल गया है इस तरह की और हत्याओं को अंजाम देने का। सो, गोरक्षा के बहाने मुसलमानों का शिकार होने लगा देश भर में। जहां दिखा कोई मुसलमान गाय को अपने वाहन में कहीं ले जाता हुआ वहां पहुंच जाती गोरक्षकों की भीड़ सरिए और पत्थर लेकर। अपनी हत्याओं के इन्होंने खुद वीडियो बनाए, जो सोशल मीडिया पर वायरल हुए हैं। ज्यादातर गोरक्षकों ने हिंसा और हत्याएं उन राज्यों में की हैं, जहां भारतीय जनता पार्टी की सरकारें हैं।

सो, जब विपक्ष के सबसे बड़े राजनेता इकट्ठा हुए पिछले हफ्ते कर्नाटक के नए मुख्यमंत्री के शपथ ग्रहण समारोह में, उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका गठबंधन सेक्युलरवाद को बचाने के लिए है। ये सब वही लोग हैं, जो मोदी के प्रधानमंत्री बनने से पहले ही उन पर सांप्रदायिक होने का आरोप लगाते आए हैं। लेकिन मोदी ने अपने गोरक्षकों को न रोक कर साबित कर दिया कि उनके आरोप सही थे। सही यह भी है कि मुसलमानों को अब देश भर में अहसास होने लगा है कि मोदी के राज में उनको दूसरे दर्जे के नागरिक बनाने की सुनियोजित कोशिश की जा रही है। जब मोदी के अपने मंत्री ही उनको पाकिस्तान जाने को कहते फिरेंगे, तो क्यों न उनको ऐसा लगेगा?

थोड़ी-सी समझदारी होती हिंदुत्ववादियों में तो बहुत पहले जान गए होते कि भारत में मुसलमानों की आबादी इतनी ज्यादा है कि अगर पाकिस्तान भेजने की बातों का कोई परिणाम निकलेगा तो सिर्फ यह कि भारत माता के वास्तव में फिर से टुकड़े होंगे। दूसरी समस्या हमारी यह है कि जब देश के वातावरण में हिंसा और नफरत फैलने लगती है, तो व्यवसाय करने में आसानी जैसी बातें बेमतलब हो जाती हैं।

प्रधानमंत्री बहुत बार कह चुके हैं गर्व से कि उनके दौर में व्यवसाय करना इतना आसान कर दिया गया है कि विदेशी निवेशक भागे-भागे आ रहे हैं भारत में निवेश करने। क्या उन्होंने इस बात पर भी ध्यान दिया है कि देसी निवेशक हजारों की तादाद में भारत से भाग गए हैं पिछले चार सालों में? क्या उन्होंने इस बात पर ध्यान दिया है कि अपने उद्योगपति अभी तक निवेश नहीं कर रहे हैं नए उद्योगों में? क्या इस पर ध्यान दिया है कि जब तक ऐसा होने नहीं लगेगा तब तक न रोजगार के अवसर पैदा होंगे और न ही अच्छे दिन आएंगे?

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