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दूसरी नजरः जवाबदेही किसकी है

पिछले चार साल के दरम्यान कृषि की औसत वृद्धि दर बहुत कम रही, 2.7 फीसद। लागत+50 फीसद के बराबर समर्थन मूल्य कहीं दिख नहीं रहा। बहुतेरे किसानों को तो घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य भी नहीं मिल पाता है।

Author May 27, 2018 4:20 AM
इस वक्त हमने बांह पकड़ कर सरकार से कहा कि वह उन सवालों का सामना करे जो अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती साबित हो रहे हैं।

जब आप आइपीएल के रोमांचकारी मैच और कर्नाटक में कुर्सी का खेल देखने में मगन थे, देश की अर्थव्यवस्था में कुछ घटित हुआ। इस वक्त हमने बांह पकड़ कर सरकार से कहा कि वह उन सवालों का सामना करे जो अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती साबित हो रहे हैं।

चालू खाते का घाटा

वर्ष 2012-13 में चालू खाते का घाटा एक बड़ी चुनौती था। कड़े उपायों के फलस्वरूप यह कम होकर 2013-14 में 1.74 फीसद पर आ गया। तेल की कीमतों में भारी गिरावट ने राजग सरकार को यह शेखी बघारने का मौका दिया कि उसने पहले तीन साल में चमत्कार कर दिखाया। अब, जब स्थिति उलट गई है, सरकार से कुछ कहते नहीं बन रहा है। चालू खाते का घाटा 2017-18 में 1.9 फीसद था (संभवत:) और 2018-19 में इसके 2.5 फीसद रहने का अनुमान है।

लुढ़कता रुपया

एक मशहूर चुनावी वायदा यह था कि रुपया-डॉलर अनुपात (जो कि तब 1 डॉलर पर 59 रु. था) को कम कर चालीस रु. तक लाया जाएगा! जनवरी और मई 2018 के बीच, दुनिया की जिन मुद्राओं का प्रदर्शन सबसे खराब रहा उनमें रुपया भी था। अब इसका अवमूल्यन 63.65 रु. से बढ़ कर 68.42 रु. हो गया है, और यह 70 रु. के स्तर को भी पार कर सकता है।

निर्यात की नाजुक दशा

यूपीए-1 के दौरान, जिन्सों का निर्यात तीन गुना हो गया, 63 अरब डॉलर से 183 अरब डॉलर, और यूपीए-2 के दौरान यह बढ़ कर 315 अरब डॉलर पर पहुंच गया। राजग सरकार के दौरान यह उस शिखर से हमेशा नीचे ही रहा है। यह घट कर 2015-16 में 262 अरब डॉलर पर आ गया था, और 2017-18 में बमुश्किल 303 अरब डॉलर रहा।

कच्चे तेल की चढ़ी कीमतें

जो जश्न सितंबर 2014 में शुरू हुआ था, खत्म हो चुका है। कच्चे तेल की जो कीमत लुढ़क कर 26 डॉलर प्रति बैरल हो गई थी, वह बढ़ कर 79 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गई है तथा इसके और बढ़ने की आशंका है। पिछले चार साल में इसका घरेलू उत्पादन बढ़ाने के लिए कुछ नहीं किया गया। ब्रिटिश पेट्रोलियम और कैर्न के सिवा कोई भी अंतरराष्ट्रीय तेल कंपनी भारत में तेल की खोज में नहीं लगी है- और ये दोनों कंपनियां भी नए तेलक्षेत्रों की खोज की खातिर और निवेश करने की इच्छुक नहीं दिखतीं।

र्इंधन के दामों में इजाफा

पेट्रोल और डीजल की ऊंची कीमतों को लेकर जन-रोष फैल रहा है। वर्ष 2014 और 2018 के बीच, कच्चे तेल की नीची कीमतों के कारण, सरकार ने पेट्रोल के उत्पादन में पंद्रह रु. प्रति लीटर बचाया और दस रुपए प्रति लीटर उत्पाद शुल्क भी बढ़ा दिया। यही डीजल के साथ हुआ। खुदरा कीमतों में लगातार बढ़ोतरी को देखते हुए सरकार के पास उत्पाद शुल्क में कमी करने के सिवा कोई चारा नहीं है, पर यह वैसा करना नहीं चाहती।

बढ़ती महंगाई

रिजर्व बैंक के सौजन्य से, मुद्रास्फीति के चार साल नियंत्रण में रहने के बाद, उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआइ) बढ़ने लगा है। यह दिसंबर 2017 और जनवरी 2018 में 5 फीसद को पार कर गया था, और तब से, यह 4.5 फीसद के आसपास मंडरा रहा है। अच्छा मानसून मददगार साबित होगा, पर रुपए की लुढ़कती कीमत चोट पहुंचाएगी।

बांड की कीमतों में गिरावट, संख्या में बढ़ोतरी

जुलाई 2017 और मई 2018 के बीच, बांड की संख्या में 1.4 फीसद की बढ़ोतरी हुई, जो कि इस समय 7.87 फीसद है। बैंकों समेत बांडों में निवेश करने वालों को भारी नुकसान हुआ है। आलोचकों ने सरकार द्वारा अत्यधिक उधारी लिये जाने की तरफ इशारा किया है। बांडों की कीमतें और नए बांड किस तरफ ले जाएंगे, यह स्पष्ट नहीं है, जिससे निवेशकों के मन में अनिश्चितता छाई हुई है।

और विकट हुए एनपीए

सभी अधिसूचित बैंकों के एनपीए मार्च 2014 के 4.1 फीसद से बढ़ कर सितंबर 2017 में 10.2 फीसद पर पहुंच गए। ‘ऑपरेशन इंद्रधनुष’ दयनीय दशा में है। हरेक को चोट पहुंची है, पर कुछ को भारी आघात लगा है : बैंकों के मुख्य कार्यकारी अधिकारी, बैंकों के वरिष्ठ अधिकारी, वैधानिक रूप से मान्य ऑडिटर, प्रोमोटर और संभावित बोली लगाने वाले। यह हालत और बिगड़ सकती है।

विदेशी पोर्टफोलियो निवेश में गिरावट

आंकड़ों तक विशेष पहुंच रखने वाले व्यक्तियों द्वारा किए गए दावों और रोजगार-बाजार के वरिष्ठ विश्लेषकों ने हकीकत को और धुंधलाया ही है। श्रम ब्यूरो के तिमाही सर्वे के मुताबिक, प्रत्येक तिमाही में केवल कुछ हजार रोजगार ही पैदा हुए। अगर कुल निश्चित पूंजी निर्माण (जीएफसीएफ) अपने शिखर से 5 फीसद नीचे है, अगर पिछले चार साल में औद्योगिक उत्पादन (आइआइपी) की औसत वृद्धि दर 4.05 फीसद रही है, और अगर निर्यात में कोई वृद्धि नहीं हुई है, तो यह मानना मुश्किल है कि गैर-कृषि रोजगार करोड़ों की तादाद में सृजित हुए।

मुसीबत में किसान, मनरेगा की उपेक्षा

पिछले चार साल के दरम्यान कृषि की औसत वृद्धि दर बहुत कम रही, 2.7 फीसद। लागत+50 फीसद के बराबर समर्थन मूल्य कहीं दिख नहीं रहा। बहुतेरे किसानों को तो घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य भी नहीं मिल पाता है। मनरेगा अब मांग-संचालित कार्यक्रम नहीं है। इसकी मजदूरी में नाममात्र की बढ़ोतरी हुई है, बहुत-से राज्यों में मनरेगा के तहत मिलने वाली मजदूरी वहां दी जा रही न्यूनतम मजदूरी से कम है। मनरेगा के तहत, अप्रैल 2018 में, श्रमिकों की 57 फीसद मजदूरी बकाया थी।

पंद्रहवें वित्त आयोग पर असंतोष

वर्ष 2011 की जनगणना के आंकड़ों को ही अपने हिसाब में रखने के पंद्रहवें वित्त आयोग के फैसले के अलावा कई और बातों को लेकर भी राज्यों (न सिर्फ दक्षिणी राज्यों) के बीच असंतोष है। कम से कम सात राज्यों ने यह निश्चय कर रखा है कि आयोग के लिए तय की गई शर्तों में बदलाव कराए बिना नहीं मानेंगे।

जब आप इस स्तंभ को पढ़ रहे हैं, सरकार द्वारा अपने पिछले चार साल को मनाने के लिए किए गए प्रचार की बाढ़ से आप घिर चुके होंगे। बेशक, हर सरकार के तहत कुछ न कुछ प्रगति होती है। अगर आप जश्न में शामिल होना चाहते हैं, तो हों, पर यह न भूलें कि अर्थव्यवस्था की हालत खस्ता है।

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