article about what a democracy it is by tavleen singh - वक्त की नब्जः यह कैसा लोकतंत्र है ! - Jansatta
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वक्त की नब्जः यह कैसा लोकतंत्र है !

लोकतंत्र का मजाक अगर उड़ा है कर्नाटक चुनावों के बाद, तो सिर्फ इसलिए कि दो राजनीतिक दल, जो एक-दूसरे के जानी दुश्मन थे कल तक, अब इकट्ठा हुए हैं सिर्फ सत्ता की भूख के मारे। ऐसा करके उन्होंने साबित किया है कि विचारधारा और नैतिकता की जगह कम होती जा रही है भारतीय राजनीति में।

Author May 20, 2018 3:29 AM
लोकतंत्र की वास्तव में सेक्युलर राजनेताओं और सेक्युलर पत्रकारों को इतनी चिंता होती तो इस बात पर ध्यान दिलाते कि कर्नाटक में परिणाम चाहे जो भी आए हों, आए तो लोकतांत्रिक तरीके से थे।

कर्नाटक के चुनाव परिणाम आने के बाद जो नाटक हमने पिछले सप्ताह देखा, उसमें इतनी बार कहा गया कि लोकतंत्र खतरे में है कि हम भूल से गए कि सिर्फ एक संदेश स्पष्ट था नतीजों में और वह था कि जनमत कांग्रेस सरकार के खिलाफ था। शायद इस संदेश को भुलाने के वास्ते ही सारा नाटक खेला गया था और शायद इस बात को भी भुला देने के मकसद से कि जिन राजनीतिक दलों ने चुनाव परिणाम आने के बाद मिलीजुली सरकार बनाने का प्रस्ताव रखा है वह कल तक एक-दूसरे के जानी दुश्मान थे। कांग्रेस अध्यक्ष ने जनता दल के बारे में यहां तक कहा था कि भारतीय जनता पार्टी की बी-टीम है यह और जो (एस) लगता है पार्टी के नाम में, उसके माने संघ है, सेक्युलर नहीं। लेकिन राजनीति का खेल विचित्र है, सो अचानक इन ‘सेक्युलरवादी’ नेताओं को याद आया कि उनकी विचारधारा एक ही है, सो नैतिक तौर पर उनका इकट्ठा होना ठीक है।

बुरे दिन जब आते हैं किसी राजनीतिक दल के, तो कई किस्म के समझौते करने पड़ते हैं और इसमें कोई शक नहीं कि कांग्रेस पार्टी के बहुत बुरे दिन आए हुए हैं। कर्नाटक अगर पूरी तरह हाथ से निकल जाता है, तो कांग्रेस सत्ता में रहेगी सिर्फ पंजाब और पांडिचेरी में। सो, किस मुंह से राहुल गांधी अगले वर्ष प्रधानमंत्री बनने का दावा करेंगे? इससे भी गंभीर समस्या यह है कि बिना कर्नाटक के लोकसभा चुनाव के लिए चंदा इकट्ठा करना भी मुश्किल हो सकता है। ये हैं कांग्रेस की असली मुश्किलें, लेकिन इन्हें छिपाने के लिए लोकतंत्र और नैतिकता की बातें की गई हैं ऊंची आवाजों में। कांग्रेस अध्यक्ष ने तो यहां तक कहा पिछले सप्ताह झारखंड में कि लोकतंत्र को समाप्त कर दिया गया है भारत में और तानाशाही का दौर है अब, जिसमें तमाम लोकतांत्रिक संस्थाओं को खतरा है।

यह बात सच होती तो क्या सर्वोच्च न्यायालय के दरवाजे आधी रात को खटका पाते कांग्रेस के वकील येदियुरप्पा का शपथ ग्रहण रोकने की उम्मीद से? न्यायाधीश क्या फैसला सुना सकते थे कर्नाटक के राज्यपाल के फैसले के खिलाफ? जब राहुल गांधी की दादी असली तानाशाह बन गई थीं आपातकाल घोषित करने के बाद, तो राहुल गांधी बहुत छोटे थे। सो, अच्छा होगा कि उनको उस दौर के बारे में थोड़ा ज्ञान दिया जाए। उस दौर को बहुत करीब से देखने के नाते मैं अपना फर्ज समझती हूं उनको याद दिलाना कि उनकी दादीजी ने एक भी लोकतांत्रिक संस्था को उस समय नहीं बख्शा था। थोड़ी-सी मुखालफत बर्दाश्त नहीं थी उस दौर में, सो पत्रकार, लेखक, बुद्धिजीवी, कवि सब जेल भेज दिए जाते थे अगर उनके मुंह से विरोध के दो शब्द भी निकलते। सर्वोच्च न्यायालय का हाल यह था कि इंदिरा गांधी के हर आदेश पर उसको मुहर लगानी पड़ती थी, यहां तक कि जीवन के अधिकार को भी इस अदालत ने जायज ठहराया था।

नरेंद्र मोदी के दौर में ऐसा कुछ नहीं हुआ है, जिसके आधार पर उनको तानाशाह कहा जाए, लेकिन कांग्रेस पार्टी और अन्य ‘सेक्युलर’ राजनीतिक दल प्रधानमंत्री की छवि को एक तानाशाह की छवि में बदल पा सके हैं ‘सेक्युलर’ मीडिया और ‘सेक्युलर’ बुद्धिजीवियों की मदद से। सो, जब कर्नाटक के राज्यपाल ने भारतीय जनता पार्टी को सरकार बनाने का मौका दिया सबसे बड़ा राजनीतिक दल होने के नाते, तो राज्यपाल पर पक्षपात के आरोप लगे। भूल गए जैसे मेरे सेक्युलर बंधु कि राज्यपालों को हमेशा प्रधानमंत्री चुनते आए हैं, सो जब कोई ऐसी समस्या आन पड़ती है जैसे कर्नाटक में पिछले सप्ताह आई, तो अक्सर राज्यपाल ने केंद्र सरकार के हित में फैसला दिया है। पहले कभी इतना हल्ला नहीं मचा, उस समय भी नहीं जब नाजायज तरीके से किसी मुख्यमंत्री को बर्खास्त किया गया, जैसे इंदिरा गांधी ने फारूख अब्दुल्ला और एनटी रामराव को बर्खास्त किया था। उस समय तो किसी ने नहीं कहा था कि लोकतंत्र खतरे में है।

लोकतंत्र की वास्तव में सेक्युलर राजनेताओं और सेक्युलर पत्रकारों को इतनी चिंता होती तो इस बात पर ध्यान दिलाते कि कर्नाटक में परिणाम चाहे जो भी आए हों, आए तो लोकतांत्रिक तरीके से थे। सो, उनका विरोध हिंसा से करना गलत था, क्योंकि लोकतंत्र को असली खतरा तब होता है जब चुनाव प्रक्रिया को हिंसा द्वारा रोका जाता है। ऐसा पिछले सप्ताह तब हुआ जब कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने येदियुरप्पा के काफिले पर हमला किया बंगलुरू में, जब वे शपथ लेने जा रहे थे राजभवन। लोकतंत्र को खतरा तब भी हुआ जब पश्चिम बंगाल के पंचायत चुनावों के दौरान मतदान बक्सों को हिंसक गुंडों ने उखाड़ कर झीलों में फेंक दिया और जब हथियारबंद गुंडों ने मतदाताओं को वोट डालने से रोका था लाठियों के बल पर। सो, सवाल कांग्रेस अध्यक्ष से यह है कि उस समय आप क्यों नहीं कुछ बोले? क्यों नहीं आपको इस हिंसा में खतरा दिखा लोकतंत्र को?

लोकतंत्र का मजाक अगर उड़ा है कर्नाटक चुनावों के बाद, तो सिर्फ इसलिए कि दो राजनीतिक दल, जो एक-दूसरे के जानी दुश्मन थे कल तक, अब इकट्ठा हुए हैं सिर्फ सत्ता की भूख के मारे। ऐसा करके उन्होंने साबित किया है कि विचारधारा और नैतिकता की जगह कम होती जा रही है भारतीय राजनीति में। साबित यह भी हुआ है कि राहुल गांधी के इतने बुरे दिन आ गए हैं कर्नाटक में कांग्रेस की हार के बाद कि वे ऐसे व्यक्ति को भी मुख्यमंत्री बनाने को तैयार हैं, जो कल तक उनका दुश्मन था। कांग्रेस प्रवक्ता खुल कर कहते फिर रहे हैं कि यह सब हो रहा है सिर्फ भारतीय जनता पार्टी को रोकने के लिए? कैसा लोकतंत्र है यह?

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