article about identity and address - तीरंदाजः पहचान और पता - Jansatta
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तीरंदाजः पहचान और पता

हम अपना ‘घर’ उसी जगह को मानते हैं, जहां हमारी यादें बसी हैं- पुश्तैनी यादें। इनके साथ जुड़े हुए हैं ‘अपने’ लोग, जिनकी हमारे मन में एक अलग और विशिष्ट पहचान है। यह पहचान सांस्कृतिक है, जिसके खास मानक बोली, खानपान और पहनावा हैं।

प्रतीकात्मक चित्र

प्रज्ञ हांगकांग में रहता है, पर जब कोई उससे पूछता है कि तुम्हारा ‘घर’ कहां है, तो अमूमन उसके मुंह से निकलता है- इंडिया। सुषेन मुंबई में पिछले तीस साल से रह रहा है, पर पूछने पर वह लखनऊ को अपना ‘घर’ बताता है। इसी तरह गुरिंदर सिंह रहता तो नोएडा में है, पर कहता है कि हम मोरी गेट दिल्ली के बाशिंदे हैं। इन सभी जवाबों में घर का अलग-अलग संदर्भ छिपा हुआ है। जहां विदेश में रहने वाला एक बड़े सांस्कृतिक-सामाजिक भूभाग को अपना ‘घर’ बताता है, तो वहीं देश में रहने वाला शहरों में अंतर करके अपना ‘घर’ इंगित करता है। स्थानीय स्तर पर हम ‘घर’ को इलाके के तौर पर देखते हैं।

पर इन सबमें अंतर जो भी हो, इन जवाबों से हमारा एक भीतरी सत्य प्रकट होता है- जाने-अनजाने में हम कहां रहते हैं और कहां के रहने वाले हैं में फर्क कर देते हैं। हम पहले उस जगह का नाम लेते हैं, जिससे हमारी जड़ें जुड़ी हुई हैं। वैसे प्राचीन समय से लेकर आज तक व्यक्ति, परिवार और समुदाय एक जगह से दूसरी जगह पलायन करते रहे हैं। पलायन के बहुत सारे कारण रहे हैं- जिनमें प्राकृतिक से लेकर राजनीतिक कारण तक शामिल हैं। शायद सबसे पुराना पलायन सिंधु घाटी सभ्यता का है, जहां के लोगों ने अपना बसा-बसाया इलाका प्राकृतिक विभिषिकाओं की वजह से त्याग दिया था।

राजनीतिक और धार्मिक दमन से भी समुदायों का पलायन हुआ है, जैसे यहूदियों का इजराइल से कुछ दो-ढाई हजार साल पहले हुआ था। यहूदी यूरोप से लेकर हिंदुस्तान तक उत्पीड़न की वजह से बिखर गए थे, पर वे जहां भी थे वहां पर अपना सालाना धार्मिक जलसा मानने से पहले दुआ करते थे- अगले साल यरुशलम में। वे ऐसा इसीलिए कहते थे, क्योंकि उनका मानना था कि उनका ‘घर’ यरुशलम, इजराइल में है और वे जहां रह रहे हैं वह उनका अस्थाई पता है।

वैसे, हम अपना ‘घर’ उसी जगह को मानते हैं, जहां हमारी यादें बसी हैं- पुश्तैनी यादें। इनके साथ जुड़े हुए हैं ‘अपने’ लोग, जिनकी हमारे मन में एक अलग और विशिष्ट पहचान है। यह पहचान सांस्कृतिक है, जिसके खास मानक बोली, खानपान और पहनावा है। इनके साथ दर्जनों ऐसी चीजें हैं- जैसे रीति-रिवाजों में स्थानीय पुट- जो हिंदुस्तान में हर अस्सी से सौ किलोमीटर पर ‘घर’ की पहचान बदल देते हैं। जैसे कहने को इलाहबाद और बनारस पूर्वी उत्तर प्रदेश में हैं, पर दोनों शहरों की पहचान अलग-अलग है। अगर कोई इलाहाबादी को बनारसी कह देता है, तो उस पर फौरन एतराज हो जाता है। यह एतराज सिर्फ इन शहरों तक लागू नहीं है, बल्कि पूरे देश के हर इलाके के लिए जायज है।

हममें से ज्यादातर लोग अपना ‘घर’ छोड़ कर बेहतर जिंदगी की तलाश में नए पतों पर आ गए हैं। अच्छे से अच्छे अवसरों की तलाश में, जिनसे आर्थिक और व्यावसायिक उन्नति हो सके। हम अक्सर अपना पता बदलते रहते हैं। गोरखपुर से निकल कर लखनऊ आते हैं, फिर दिल्ली, उसके बाद बंगलुरु आदि। हम हर जगह एक नया पता हासिल करते हैं और आसपास के समाज में घुलमिल जाते हैं। पर हर बार हम अपना सिर्फ पता बदलते हैं, घर वही रहता है।

बहुत सारे लोग ऐसे भी हैं, जिनकी पुश्तैनी जड़ें तो कहीं दूर हैं, पर वे स्थाई तौर पर बस कहीं और गए हैं। दूसरे शब्दों में, लोग अक्सर उसी शहर में बस जाते हैं, जहां उन्होंने अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा व्यावसायिक हिस्सा व्यतीत किया होता है। पर वे अपना वास्तविक घर पुश्तैनी जगह को ही बताते रहते हैं, जो कि उनकी असल पहचान है। हां, उनके बच्चों ने अगर बचपन नई रिहाइश में बिताया है, तो हो सकता है वे अपना ‘घर’ इस नए पते को मानने लगें, पर अमूमन ऐसा होता नहीं है, क्योंकि भौगौलिक और सांस्कृतिक पहचान कभी बदल नहीं सकती है। हम जहां के हैं, पुश्त-दर-पुश्त, वहीं के रहेंगे।

पश्चिमी भूभाग में भी ऐसा ही है, पर हमसे बहुत कम है। इसका एक बड़ा कारण है कि वहां आंचलिक विविधता उतनी नहीं है, जितनी हिंदुस्तान में है। कमोबेश, पश्चिमी देशों में संस्कृति लगभग एक जैसी है- खानपान, रहन-सहन, रीति-रिवाज आदि में बहुत फर्क नहीं है और इसीलिए उनका पता ही उनका घर है। उनका ‘घर’ का अहसास सामाजिक और सांस्कृतिक ताने-बाने में नहीं गुंथा हुआ है। वह उनकी निजी यादों से जुड़ा हुआ है। ऐसे में पश्चिमी देशों के लोग उस जगह को घर कहते हैं, जहां पर उनका बचपन बीता था या फिर जहां पर वे अपनी जवानी में लंबे समय तक रहे थे। उनके लिए घर एक निजी अनुभूति है, जबकि हमारे लिए ‘घर’ एक पूरा सामुदायिक माहौल है।

इस अनुभूति के चलते बहुत सारे पश्चिमी देशों के मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि उनके देशों में घर और पते के बीच कोई फर्क नहीं है। आप जहां भी रह रहे हैं, वही आपका घर है और अगर आप किसी और घर की बात करते हैं, तो वह एक रूमानी कल्पना मात्र है। यह कल्पना ठीक वैसे ही है जैसे हम पुराने दिन याद करके भावुक हो जाते हैं और उनसे अपने को फिर से जोड़ने की कोशिश करते हैं। इस कोशिश का कोई ठोस वजूद नहीं होता है, क्योंकि हमारी तरह हमारी जड़ें भी चलायमान होती हैं।

पश्चिमी देशों के किसी भी मकान में अगर हम जाते हैं, तो देखते हैं कि लगभग सभी चीजें, जो उसमें रखी या सजी हुई हैं, व्यक्ति विशेष से संबंधित हैं। वे तस्वीरें भी हो सकती हैं, कलाकृतियां भी और रसोई का समान भी। पर हमारे यहां ऐसा नहीं है। मकान के भीतर घुसते ही हमारा पहला तार्रुफ उसकी आंचलिक संस्कृति से होता है। यह संस्कृति मकान को घर के लक्षण देती है और हर तरफ विद्यमान होती है। उसको देखने से, अनुभव करने से या फिर सिर्फ सूंघने से हमें पता चल जाता है कि व्यक्ति कहां का रहने वाला है- उसका घर कहां है। वास्तव में, आंचलिक सामुदायिक संस्कृति ही व्यक्ति की पहचान है। इस पहचान से साथ वह चलायमान भी है और स्थिर भी, क्योंकि उसकी जड़ें उसकी मिट्टी के अंतर्मन में जमी-बसी हुई हैं।

अपना ‘घर’ होना सबके लिए जरूरी है, क्योंकि जहां पते हमारी गतिशीलता की ओर इंगित करते हैं, वहीं घर हमारी परिवर्तनीयता को ठहराव देता है। वह हमको पुश्त-दर-पुश्त एक विशिष्ट पहचान देता और व्यक्ति को समुदाय से बांधता है। इन्हीं घरों की वजह से हिंदुस्तान में विविधता है, उसमें वह रंग और महक है, जिससे उसका इंद्रधनुषीय वैभव सारी दुनिया में फैला हुआ है।

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