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बाख़बर : सड़कों पर नाचती सतरंगी क्रांति

एक अंगरेजी चैनल ने ‘सोशल रिवोल्यूशन’ करवा दिया। दूसरे ने ‘समलिंगियों की फतह’ करवा दी। तीसरे ने इसे ‘धारा तीन सौ सतहत्तर को नया जीवनदान मिलता’ दिखाया!

Author नई दिल्ली | Updated: February 7, 2016 12:38 AM
चित्र का इस्तेमाल सिर्फ प्रतीक के तौर पर किया गया है।

एक अंगरेजी चैनल ने ‘सोशल रिवोल्यूशन’ करवा दिया। दूसरे ने ‘समलिंगियों की फतह’ करवा दी। तीसरे ने इसे ‘धारा तीन सौ सतहत्तर को नया जीवनदान मिलता’ दिखाया! सीनों में युवतियां युवतियों के साथ नाच रही थीं। युवक युवकों के साथ नाच रहे थे। एक के गाल पर पचरंगी लकीरें थीं, तो दूसरे ने पंखवाला मुकुट पहना था, तीसरे के सिर पर बाल नहीं थे। यानी कुछ लिहाज बाकी था, वरना ऐसे मौके पर लिपट-चिपट, चुंबन-चाटी वाली एडल्ट पिक्चर बन जाती। ऐसी थिरकती सेक्स चर्चाएं सबसे ज्यादा बिकती हैं।

चैनल इसे सेक्स की मुक्ति कह रहे थे और उनको नाचता-गाता दिखा रहे थे। एंकर खुद कम उल्लसित नहीं थे। इनके खिलाफ एक ओर चर्च के मथाई साब थे, दूसरी ओर एक सनातनी था, तीसरी ओर एक मौलवी साहब थे। मथाई ने कहा कि समलिंगी होना एक मानसिक विकार है, तो एक बेहद रिसर्च भरा जवाब इस हेकड़ी से दिया गया कि मथाई साहब ही मानसिक रूप से पिछड़े लगने लगे। धर्म की रक्षा के लिए क्या-क्या नहीं झेलना पड़ता- मथाईजी, मौलवीजी और सनातनीजी ने सब इल्जाम सहे! वे सेक्स शब्द से ही खतरे में आ गए थे। तिस पर सामने नाचती थी सतरंगी नई सामाजिक क्रांति! समलिंगी क्रांति! एलजीबीटी क्रांति!

तीन दिन तक बजने वाली क्रांति इंद्रधनुषी देह को ही अपना परदा बनाती थी। नाचने वालों की देह रंगों का अखाड़ा बनी थी। कहीं किसी ने अपने गाल पर रंग लपेटे हैं, कहीं किसी ने बालों को ही सतरंगा किया हुआ है। कहीं किसी के कपड़े पर, कहीं किसी के दुपट्टे पर, कहीं किसी के निक्कर पर, कहीं माथे पर रंग बिखरे हैं और सेक्समुक्ति की सारी व्याख्या अंगरेजी में दौड़ती है।
ऐसी चर्चाएं घर के भीतर घुस कर सारी सेक्स वर्जनाओं को तोड़ती रहती हैं। ऐसी चर्चाएं आती रहीं तो एक दिन अपना टीवी एलजीबीटी क्रांति करवा के रहेगा।

सीएनएन आइबीएन पर एंकर समलिंगी जीवन के पक्ष में हांके जा रहा था। उसका मुकाबला दूसरे एंकरों से था, जो दिखाने पर तुले थे कि सतरंगे इंद्रधनुषी क्रांति वाले एलजीबीटी टाइप के प्रति किसकी हमदर्दी ज्यादा है?

टाइम्स नाउ पर एक ‘गे’ यानी समलिंगी सेक्स जीवन जीने वाले ने बताया कि दो करोड़ लोग ‘गे’ हैं, जो समलिंगी सेक्स पसंद करते हैं, जबकि समलिंगत्व को कानून में अपराध माना जाता है। इसके बरक्स चैनल पर एक लाइन में लिखा आता रहा कि दो दशमलव पांच लाख समलिंगी हैं। एंकर ने यह भी बताया कि ऐसे सेक्स को अपराध बताने वाला कानून अठारह सौ सोलह में बना था और यह दो हजार सोलह है। कानून को खत्म कर देना चाहिए, वक्त का तकाजा है।

एंकर जिस तरह बहस के एक-एक एंगिल के बारे में पूछते जाते थे और जिस आत्मविश्वास से वक्ता-प्रवक्ता सेक्स के अधिकार पर चर्चा करते जाते थे, आंकड़े देते जाते थे, उससे लगता था कि जिनको हम रोजाना चर्चा में बैठा देखते हैं उनमें से कुछ तो पहले से ही क्रांतिकारी हैं, बाकी के चर्चा के बाद देखे जाएंगे। और जमाना सड़कों पर बिकने वाले पीले रंग के सचित्र कोकशास्त्र से बहुत आगे निकल गया है।

सीएनएनआइबीएन के एंकर ने जिज्ञासा की कि क्या समलिंगी सेक्स कुछ बड़े लोगों का ही शौक है, तो थरूर ने जवाब दिया कि मैं तो अब तक सहे जा रहा हूं। लोग तोहमत लगाते रहे हैं मुझ पर कि इस तरह की सेक्स की समस्या के अलावा देश में कोई दूसरी समस्याएं नहीं हैं? मैं एक बिल लाना चाहता था, क्योंकि धारा तीन सौ सतहत्तर कहती है कि आदमी और औरत के बीच ही सेक्स उचित है और बाकी का सेक्स अपराध है।

इन बहसों की एक सिफत यह रही कि ऐसी दो बहसों में ‘अलीगढ़’ नामक फिल्म बराबर चर्चा में रही, जिसमें मनोज वाजपेयी ने अलीगढ़ विश्वविद्यालय के समलिंगी प्रोफेसर सिरास का रोल किया। रोल करते ही वे विषय के एक्सपर्ट मान लिए गए!
एनडीटीवी की कूड़ा चर्चा तो एंकर के कंट्रोल से उसी तरह बाहर रही, जिस तरह कूड़ा सरकारों के बस से बाहर रहा। वह चाहती रही कि कूड़ा साफ हो, लेकिन सत्ता पक्ष के नेता कहते थे कि कूड़े के लिए सत्ता पक्ष नहीं, विपक्ष जिम्मेदार है। एक बिजनेस वुमन बोलीं कि कूड़े के बारे में सबको शिक्षा दी जानी चाहिए। एक सिटी प्लानर बोला कि हम तो तकनीशियन हैं, हम बता सकते हैं कि क्या किया जाना चाहिए, लेकिन करना आपको है। एक कूड़ा बीनने वाले, एक साफ करने वाले को भी बुला लीजिए कभी। जब वह बोलेगा तो बाकी साफ हो जाएंगे।

इतने में कैमरों की नजर में बंगलुरू की सड़क पर एक तंजानियाई युवती के साथ छेड़खानी करते लोगों की कहानी आ गई कि किस तरह उसे नंगा करके दौड़ाया, गाड़ी में आग लगा दी। अब कैमरे के पास कहानी थी और जलती गाड़ी थी और शहर का पुलिस अफसर था, जो वही कह रहा था जो ऐसे अवसर पर सटीक लगता है।

इंडिया टुडे के राजदीप ने अफ्रीकी एसोसियेशन के प्रवक्ता से पूछा कि क्या आपको भारत की पुलिस पर भरोसा है। उसने कहा कि भरोसा तो है, लेकिन उसने युवती की शिकायत क्यों नहीं लिखी? और पूछ लो भरोसा!

अनुपम खेर अपनी खबर के साथ दो-तीन दिन जमे रहे। कराची लिटफेस्ट के लिए पाक का वीजा मना करना, फिर कहना अप्लाई ही नहीं किया, फिर कहना कि अब आ जाइए और अनुपम का कहना कि अब नहीं आ सकेंगे। इस एपीसोड से इस बार पाकिस्तान इंटॉलरेंट नजर आया, लेकिन उसे कंडेम करने वाले गायब रहे।

हां एक उम्दा बहस टाइम्स नाउ पर आई, जिसमें हाजी अली दरगाह के ट्रस्टियों और इस्लाम की एक्सपर्ट दो-तीन मुसलमान महिलाओं ने मौलवियों और मुफ्तियों की खाट खड़ी कर दी। इस्लाम की उनकी व्याख्याओं को प्रश्नांकित किया और अपनी व्याख्याओं से उसे नए अर्थ दिए। यह एक सुनने-देखने काबिल बहस थी। इस्लाम के स्त्री अधिकार संबंधी कुछ पहलू पहली बार इस खुलेपन से सामने आए!

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