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अक्षय ऊर्जा की राह

पर्यावरण संबंधी पेरिस शिखर सम्मेलन में इंटरनेशनल एजेंसी फॉर सोलर टेक्नोलॉजीज ऐंड एप्लीकेशंस (आइएएसटीए) की शुरुआत हुई।

सीमा जावेद

पर्यावरण संबंधी पेरिस शिखर सम्मेलन में इंटरनेशनल एजेंसी फॉर सोलर टेक्नोलॉजीज ऐंड एप्लीकेशंस (आइएएसटीए) की शुरुआत हुई। यह संगठन कर्क और मकर रेखा के बीच उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में स्थित सौ से ज्यादा देशों का एक अनूठा क्लब होगा, जो ऐसे राष्ट्रों को एक मंच पर लाएगा, जिनमें धूप की भरपूर उपलब्धता है। ये सभी देश सौर ऊर्जा के क्षेत्र में मिल कर काम करेंगे। इस प्रयास को वैश्विक स्तर पर ऊर्जा परिदृश्य में एक बड़े बदलाव के रूप में देखा जा रहा है। इससे उष्णकटिबंधीय गांवों और पूरी दुनिया के विभिन्न समुदायों तक किफायती सौर ऊर्जा पहुंचाई जा सकती है।

भारत के अधिकतर हिस्सों में एक वर्ष में ढाई सौ से तीन सौ दिन धूप निकलती है, जिससे प्रतिदिन प्रति वर्गमीटर चार से सात किलोवॉट प्रति घंटे का सौर विकिरण प्राप्त होता है। सूर्य से सीधे प्राप्त होने वाली ऊर्जा की कई विशेषताएं हैं। इनमें इसका अत्यधिक विस्तारित होना, अप्रदूषणकारी और अक्षुण्ण होना प्रमुख हैं। संपूर्ण भारतीय भूभाग पर पांच हजार लाख करोड़ किलोवॉट प्रति घंटा सौर ऊर्जा आती है, जो विश्व की संपूर्ण विद्युत खपत से कई गुना अधिक है।

भारत की अगुआई में आइएसए अनेक विकसित और विकासशील देशों को वैकल्पिक ऊर्जा के रास्ते पर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करने के साथ-साथ उनकी मदद भी कर सकता है। वह इस साल के शुरू में घोषित सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) को हासिल करने के लिए देशों को वित्तीय लागतें कम करने, साझा मानक विकसित करने, जानकारी के आदान-प्रदान को बढ़ावा देने, अनुसंधान और विकास सहयोग तथा प्रौद्योगिकियों के सह-विकास के लिए भी प्रेरित कर सकता है।

साथ ही इससे कम कार्बन उत्सर्जन वाले भविष्य के निर्माण में मदद मिलेगी। अपने अक्षय ऊर्जा कार्यक्रमों के बल पर भारत ने जी-20 में एक ऐसे देश के रूप में जगह बनाई है, जो वास्तव में इस ऊर्जा क्षेत्र में महत्त्वाकांक्षी लक्ष्यों की प्राप्ति पर काम कर रहा है। अक्षय ऊर्जा के मौजूदा कार्यक्रम भारत की सौर प्रणाली में तेजी लाएंगे। सौर ऊर्जा को बढ़ावा देने की योजना के अंतर्गत 2022 तक सौर ऊर्जा का उत्पादन 175 गीगावॉट करने की योजना है। उल्लेखनीय है कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा एक प्रमुख चुनौती, बल्कि देश के संपूर्ण विकास के लिए अपरिहार्य है।

गौरतलब है कि करीब 210 गीगावॉट क्षमता के साथ भारत दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा बिजली उत्पादक देश है और इसकी छियासठ फीसद बिजली का उत्पादन कोयले से होता है। जाहिर है कि बिजली संकट का समाधान दिन-ब-दिन महंगी होती जा रही कोयला दहन वाली प्रौद्योगिकी पर निर्भर रह कर संभव नहीं है। बिजली संकट के टिकाऊ और दीर्घकालिक हल के लिए अक्षय ऊर्जा के स्रोतों का उपयोग एक बेहतर विकल्प के रूप में उभर कर आया है।
भारत 2030 तक कार्बन उत्सर्जन कम करने की योजना पर पहले से काम कर रहा है। 2022 तक 175 गीगावॉट अक्षय ऊर्जा और 2030 तक कुल संचय क्षमता के चालीस प्रतिशत के बराबर गैर-जीवाश्म ऊर्जा उत्पादित करना उसका महत्त्वाकांक्षी उद्देश्य है। प्रमुख औद्योगिक देशों ने कोयले और तेल का परित्याग करने का फैसला किया है। सदी के मध्य तक बिजली के लिए परंपरागत ऊर्जा स्रोतों का इस्तेमाल बंद करना संभव है। इसमें सौर ऊर्जा की निर्णायक भूमिका होगी। ऐसे में भारत इस गठबंधन के स्वाभाविक अगुआ के रूप में उभरा है।

ऊर्जा अर्थशास्त्र और वित्तीय विश्लेषण के लिए संस्थान (आइइइएफए) की ताजा रिपोर्ट समेत अनेक अध्ययनों से यह जाहिर होता है कि भारत की अक्षय ऊर्जा संबंधी योजनाएं अच्छी प्रगति कर रही हैं। सौर ऊर्जा के क्षेत्र में काम करने वाले अनेक वैश्विक और भारतीय पक्षों ने इस साल भारत में अपनी बड़ी परियोजनाएं लगाने की घोषणाएं की हैं। डच बैंक के अनुमान के मुताबिक 2019-20 तक सौर ऊर्जा में होने वाला निवेश कोयला क्षेत्र में संभावित निवेश को पछाड़ देगा। वैश्विक निवेशकों ने पैंतीस अरब डॉलर के निवेश का इरादा जाहिर किया है।

अब तक भारत में ज्यादातर विदेशी निवेश निजी स्रोतों से आया है। केवल पचास करोड़ अमेरिकी डॉलर आधिकारिक माध्यमों, बहु-पक्षीय और द्विपक्षीय वित्तीय एजेंसियों के जरिए आए हैं। आइएफसी ने वर्ष 2015 में भारतीय अक्षय ऊर्जा विकास एजेंसी (आइआरइडीए) और पीटीसी इंडिया फाइनेंशियल सर्विसेज के साथ भारत में अक्षय ऊर्जा परियोजनाओं के वित्तपोषण में मदद के लिए एक समझौता किया है। जुलाई-जून को वित्तीय वर्ष मानने वाली आइएफसी ने इस वर्ष अक्षय ऊर्जा परियोजनाओं में अन्य निवेशकों से कर्ज और इक्विटी समेत तैंतीस करोड़ डॉलर से ज्यादा धन जुटाया है। आगे भी निवेश की यही रफ्तार रही, तो 2015-22 तक भारत में अक्षय ऊर्जा के क्षेत्र में करीब ढाई अरब डॉलर के निवेश की उम्मीद है।

वित्तपोषण के अलावा प्रौद्योगिकी भी सौर क्षमता में अभिवृद्धि की योजनाओं के लिए एक ऐसी चुनौती है, जो भारत के 175 गीगावॉट के लक्ष्य तक पहुंचने के अभियान को पटरी से उतार सकती है। कम गुणवत्ता वाली प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल से सौर ऊर्जा उत्पादकों की न सिर्फ उत्पादन लागत बढ़ सकती है, बल्कि वित्तपोषक का विश्वास भी डगमगा सकता है।

एक बेहतर जलवायु समझौते के लिए दो अपेक्षाएं हैं। पहला यह कि इसे पर्यावरण को लेकर दूरंदेशी होना पड़ेगा। मतलब यह कि विश्व को कार्बन उत्सर्जन में इतनी कमी लानी होगी, जिससे कि तापमान औद्योगिक काल के पूर्व तापमान से दो डिग्री सेल्सियस (कुछ के अनुसार डेढ़ डिग्री) से अधिक न बढ़े। वैश्विक उत्सर्जन एक वर्ष में करीब पचास अरब टन बढ़ रहा है। इस उत्सर्जन को वातावरण में सोखने का बचा हुआ ‘स्थान’ अगले तीन दशक में ही भर जाएगा।

कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने के साथ-साथ दक्षिण को अधिक धन और तकनीक के हस्तांतरण की पहल करनी होगी, जिससे वह कम कार्बन उत्सर्जन वाली विकास की राह पर चल सके। पर दक्षिण के देश इस बात पर जोर दे रहे हैं कि इस सिद्धांत को नए समझौते के केंद्र में रखा जाए। लेकिन उत्तरी देशों का तर्क है कि अब दुनिया बदल गई है और सभी देशों (अत्यंत अल्पविकसित देशों को छोड़ कर) के साथ एक तरह का बर्ताव किया जाए। एक ऐसी पद्धति निर्मित की जाए, जिससे सभी देश वर्तमान या भविष्य में उत्सर्जन घटाने के लिए एक तरह के वादे करें।
विकासशील देशों का तर्क है कि सारा बोझ उत्तर के बजाय दक्षिण पर डाल देना चाहिए और वर्तमान में उपलब्ध सस्ती तेल आधारित प्रणाली से हट कर नवीकरणीय ऊर्जा और अन्य नई तकनीकों के आधार पर खुद को रूपांतरित किया जाए। पर यह अत्यंत खर्चीला काम है। इस माध्यम से निवेश में बढ़ोतरी से निजी पक्षों के प्रयासों में और तेजी आएगी और भारत में हरित ऊर्जा अपनाने की कोशिशों को भी बल मिलेगा।
हाल के महीनों में भारत में अक्षय ऊर्जा के क्षेत्र में निवेश की कई बड़ी घोषणाएं हुई हैं। इनमें अनेक कंपनियां शामिल हैं। विदेशी कंपनियों ने करीब सौ अरब डॉलर के निवेश का इरादा जाहिर किया है। बाजार में कर्ज के नए विकल्प यानी ग्रीन बांड की संभावनाएं भी हैं। मगर अभी चुनौतियां कम नहीं हंै। ऐसे में विकसित देशों को 2020 तक हर साल सौ अरब डॉलर का योगदान करने की प्रतिबद्धता निभानी चाहिए।

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