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प्रसंग- पाठक संख्या की मीनारें

जिस तेजी से भाषा का तकनीकीगत विकास हो रहा है, उससे साफ है कि मौजूदा स्थिति ज्यादा समय तक स्थिर नहीं रह सकती है। इसलिए आने वाले समय के बदलाव को भांपते हुए, जरूरी है कि हिंदी और भारतीय भाषाओं के अखबार अपनी मजबूत स्थिति सुनिश्चित बनाने की दिशा में कदम उठाएं।
Author February 4, 2018 07:59 am
चित्र का इस्‍तेमाल केवल प्रस्‍तुतिकरण के लिए किया गया है।

विनय जायसवाल

भारतीय पाठक सर्वेक्षण के ताजा आंकड़े काफी चौंकाने वाले हैं। दरअसल, पिछले कुछ वर्षों से लगातार ऐसा अनुमान लगाया जा रहा था कि टेलीविजन के बाद आॅनलाइन मीडिया और अब सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव की वजह से अखबारों की पाठक संख्या में तेजी से गिरावट आएगी, लेकिन इस सर्वेक्षण से साफ है कि भारत में अखबारों की बिक्री लगातार बढ़ रही है। 2014 में अखबार के पाठकों की संख्या करीब तीस करोड़ थी, जो अब बढ़ कर करीब इकतालीस करोड़ तक पहुंच गई है। यानी पिछले तीन सालों में ग्यारह करोड़ पाठक बढ़े हैं। यह साफ संकेत है कि लोगों के बीच आज भी छपी हुई खबर के प्रति लगाव और विश्वास बना हुआ है। तीन साल पहले ग्रामीण भारत में अखबारों के पाठक करीब चौदह करोड़ थे, जो अब करीब इक्कीस करोड़ हो गए हैं। इसी तरह शहरों में पाठकों की संख्या करीब पंद्रह करोड़ से बढ़ कर उन्नीस करोड़ हो गई है। जाहिर है कि शहरों की तुलना में गांवों में पाठकों की संख्या तेजी से बढ़ी है। इसे निस्संदेह बढ़ती साक्षरता, शैक्षिक स्तर और जागरूकता का असर कहा जा सकता है। इसमें दो राय नहीं कि आने वाले दिनों में गांवों और छोटे शहरों में पाठकों की संख्या में बढ़ोतरी जारी रह सकती है। इस सर्वेक्षण का एक और सबसे खास आकलन सामने आया है कि सर्वाधिक पाठकों के लिहाज से पहले दस स्थान पर कोई भी अंग्रेजी अखबार नहीं है और अगर पहले बीस अखबारों की सूची देखें तो भी केवल एक अंग्रेजी अखबार अपनी जगह सुनिश्चित कर पाया है। पहले चार स्थानों पर हिंदी के अखबार काबिज हैं। अंग्रेजी के सबसे बड़े पाठक संख्या वाले अखबार टाइम्स आॅफ इंडिया के पाठक डेढ़ करोड़ से भी कम हैं, जबकि तमिल, मराठी, मलयालम, तेलुगु के प्रमुख अखबारों के पाठकों की अलग-अलग संख्या करीब डेढ़ करोड़ से लेकर ढाई करोड़ के बीच है।

अकेले हिंदी पाठकों की संख्या में पिछले तीन साल में करीब पैंतालीस फीसद की बढ़ोतरी हुई है, जो 2014 के करीब बारह करोड़ से बढ़ कर 2017 में करीब अठारह करोड़ हो गई है, जबकि इसी अवधि के दौरान अंग्रेजी अखबारों के पाठकों की संख्या में महज दस फीसद की वृद्धि देखी गई, जो ढाई करोड़ से बढ़ कर 2.8 करोड़ हो गई है। इस तरह भारतीय भाषाओं में केवल हिंदी के पाठकों की संख्या अंग्रेजी के पाठकों से छह गुना अधिक है। अगर सारी भारतीय भाषाओं के पाठकों की संख्या से अंग्रेजी के पाठकों की तुलना की जाए तो अंग्रेजी के पाठकों की संख्या दो-तीन प्रतिशत से अधिक नहीं है। इसका मतलब है कि नब्बे फीसद से भी अधिक लोग भारतीय भाषाओं में खबर पढ़ना पसंद करते हैं। इसके बावजूद आश्चर्य है कि आज भी अंग्रेजी अखबारों के पत्रकारों और संवाददाताओं को ज्यादा सहूलियत, वेतन और प्रतिष्ठा मिलती है। इसके पीछे प्रमुख कारण है कि हिंदी अखबार अपनी पहुंच तो करोड़ों पाठकों तक रखते हैं, लेकिन अपने पत्रकारों को वह माहौल, सुविधा और स्वतंत्रता नहीं देते, जिससे वे अंग्रेजी अखबारों की तरह बड़ी, विशेष और खोजी रिपोर्टिंग कर सकें। हिंदी अखबारों में एक मानसिकता घर कर गई है कि उनका पाठक बड़ी रिपोर्ट और खबर पढ़ेगा ही नहीं। इसके साथ ही कुछ अखबार अनुवाद या एजेंसी की खबरों पर भी बहुत ज्यादा निर्भर होते जा रहे हैं, जिससे अखबार की मौलिकता खत्म होती है।

हिंदी और भारतीय भाषा के अखबारों को चाहिए कि वे अपने इतने बड़े पाठक वर्ग को अपना दायित्व समझें और अपनी भूमिका बढ़ाएं तथा अपने रिपोर्टर और लेखकों का विकास करें, जिससे हिंदी और भारतीय भाषा के पाठकों को अंग्रेजी अखबारों का मुंह न देखना पड़े। ज्यादातर हिंदी अखबार व्यवसाय संबंधी खबरों को उस तरह से कवर नहीं करते, जिस तरह अंग्रेजी अखबार। यही कारण है कि हिंदी के अच्छे पाठक कारोबारी खबरों के लिए अंग्रेजी के अखबार पढ़ना पसंद करते हैं। ऐसा नहीं कि वे ऐसा स्वेच्छा से करते हैं, बल्कि विकल्प न होने की वजह से करते हैं। कारोबार के कुछ हिंदी अखबार निकलते हैं, लेकिन वे भी अंग्रेजी के केवल हिंदी संस्करण बन कर रह गए हैं। ऐसे में जरूरी हो गया है कि पत्रकारिता का नेतृत्व दो-तीन फीसद पाठक वाला अंग्रेजी मीडिया न करके नब्बे फीसद से अधिक पाठक रखने वाले भारतीय भाषा के अखबार करें। नहीं तो जिस तरह अंग्रेजी माध्यम के स्कूल गांव-गांव में खुल रहे हैं, उससे आने वाले समय में भारतीय भाषा के पाठकों में जारी वृद्धि को थमते देर नहीं लगेगी।

आज के अखबारों को भी यह तय करना है कि वह भविष्य की पीढ़ी किस भाषा में तैयार करना चाहते हैं। आज संख्या भारतीय भाषाओं के साथ है और अगर पूरी क्षमता और गुणवत्ता के साथ वह इस मुहिम में लग गई, तो वह दिन दूर नहीं, जब अंग्रेजी पाठक भी खबरों और रिपोर्टों के लिए हिंदी अखबारों की ओर देखेंगे। इसके लिए आमूल-चूल बदलाव की जरूरत है। यह इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि आॅनलाइन मीडिया भले भारतीय भाषाओं के पाठकों को प्रभावित नहीं कर पाया हो, लेकिन वह रफ्तार पकड़ रहा है। केवल शहरों की करीब पचास लाख आबादी खबरों को आॅनलाइन पढ़ती है। इसी के साथ यह भी जानना महत्त्वपूर्ण है कि इस देश में सोशल मीडिया का इस्तेमाल करने वाली आबादी बीस करोड़ से ऊपर पहुंच चुकी है और देश की लगभग पचास करोड़ आबादी इंटरनेट का इस्तेमाल करती है। इसलिए यह समझने में जरा भी मुश्किल नहीं होनी चाहिए कि जैसे-जैसे जागरूकता बढ़ेगी वैसे-वैसे लोगों के पास खबरों के लिए आॅनलाइन मीडिया की ओर रुख करने का विकल्प खुला रहेगा।

यह भी देखना जरूरी है कि अगर सभी मीडिया की पहुंच की तुलना की जाए तो आज भी सबसे अधिक पहुंच वाला मीडिया टेलीविजन है, जिसकी पचहत्तर फीसद हिस्सेदारी है। इसके बाद अखबार की उनतालीस फीसद, इंटरनेट और रेडियो में से प्रत्येक की उन्नीस-उन्नीस प्रतिशत और पत्रिकाओं की पांच फीसद हिस्सेदारी है, जबकि सिनेमा तीन फीसद तक अपनी भागीदारी रखता है। इसलिए अखबारों को टेलीविजन, आॅनलाइन मीडिया और सोशल मीडिया समेत रेडियो, सभी से बड़ी चुनौती है। भारतीय भाषा के पाठकों के लिए इंटरनेट और सोशल मीडिया अभी-अभी सुविधाजनक हुए हैं और इस क्षेत्र में तेजी से विकास हो रहा है। शायद यह भी एक कारण है कि भारतीय भाषाभाषी अब भी अखबारों पर ज्यादा निर्भर हैं और नए साक्षर होने वाले भारतीय भाषाभाषी भी अखबारों पर अनिवार्य रूप से निर्भर रह जाते हैं, लेकिन जिस तेजी से भाषा का तकनीकीगत विकास हो रहा है, उससे साफ है कि मौजूदा स्थिति ज्यादा समय तक स्थिर नहीं रह सकती है। इसलिए आने वाले समय के बदलाव को भांपते हुए, जरूरी है कि हिंदी और भारतीय भाषाओं के अखबार अपनी मजबूत स्थिति सुनिश्चित बनाने की दिशा में कदम उठाएं।

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