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गिरती गुणवत्ता के पीछे

अरस्तू जैसे दार्शनिक ने सदियों पहले कह दिया था कि समृद्धि और संपन्नता के समय में शिक्षा अलंकार बन जाती है, जबकि विपरीत और विपन्न स्थितियों में शिक्षा शरणार्थी हो जाती है। आज हमारी शिक्षा की स्थिति उतनी संपन्न या विपन्न तो नहीं है, फिर भी शिक्षा विपरीत समय को बदल देने की ताकत क्यों नहीं बन रही

Author August 5, 2018 4:08 AM
उच्च शिक्षा किसी भी देश के सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और बौद्धिक विकास की प्रतिनिधि होती है।

वैसे तो प्राथमिक स्कूल से लेकर विश्वविद्यालय तक भारतीय शिक्षा की साख अच्छी नहीं कही जा सकती, मगर उच्च शिक्षा, जिससे देश की बौद्धिक क्षमता, कुशलता और राष्ट्रीय दक्षता स्तर को निर्धारित किया जाता है, वह स्वतंत्रता के इन सत्तर वर्षों से सर्वाधिक अपनी साख के लिए संघर्ष कर रही है। एलड्युअस हक्सले जैसे उपन्यासकार ने 1931 में लिखे अपने उपन्यास ‘द ब्रेव न्यू वर्ल्ड’ में भविष्यवाणी करते हुए कहा था कि आने वाले समय में संख्यात्मक वृद्धि इतनी होगी कि उससे गुणवत्ता और नैतिकता का स्तर गिर जाएगा। ऐसा लगता है कि उच्च शिक्षा के सामने अब एक बड़ा संकट गुणवत्ता और नैतिकता का ही है। महाविद्यालयों के प्राध्यापकों और विश्वविद्यालयों के संकायों में अपने शैक्षिक दायित्व के प्रति उदासीनता और उपेक्षा बढ़ी है। अध्ययन, अध्यापन और शोध की प्रवृत्ति इस कदर घट गई है कि न तो उनका ज्ञान परिपक्व है, न अध्यापन के प्रति ईमानदार रुचि है और शोध की स्थिति तो इतनी दयनीय है कि शोध मात्र प्रायोजित कर्मकांड बन कर रह गए हैं।

अब प्रश्न यह है कि देश में सरकारी क्षेत्र में चार सौ से अधिक विश्वविद्यालयों, इनसे डेढ़ गुना प्राइवेट विश्वविद्यालयों और लगभग बारह हजार कॉलेजों के बावजूद उच्च शिक्षा निम्न स्तर पर क्यों मानी जाती है? सबसे महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है प्राध्यापकों का मानस अब व्यापारिक यानी कमर्शियल तो अधिक हुआ है, पर प्रतिबद्ध या प्रोफेशनल कम। जब निष्ठाएं डगमगा जाती हैं, तो प्रतिष्ठा अपने आप गिरने लगती है। शैक्षिक-कर्म आस्था, निष्ठा और सतत अध्ययन से ज्ञान के विकास का कर्म है। क्या ऐसा अब है?
अरस्तू जैसे दार्शनिक ने सदियों पहले कह दिया था कि समृद्धि और संपन्नता के समय में शिक्षा अलंकार बन जाती है, जबकि विपरीत और विपन्न स्थितियों में शिक्षा शरणार्थी हो जाती है। आज हमारी शिक्षा की स्थिति उतनी संपन्न या विपन्न तो नहीं है, फिर भी शिक्षा विपरीत समय को बदल देने की ताकत क्यों नहीं बन रही है! रस्किन जैसा लेखक-विचारक तो मानता था कि गुणवत्ता कोई आकस्मिक घटना नहीं होती, वह हमेशा ही बौद्धिक प्रयत्नों का परिणाम होती है। यह बात सही साबित हो रही है हमारी उच्च शिक्षा को लेकर, क्योंकि हमारे बौद्धिक-प्रयत्नों में गिरावट आ गई है।

पवन अग्रवाल ने वर्ष 2009 में प्रकाशित अपनी शोधपूर्ण और तथ्यों और आंकड़ों से भरपूर पुस्तक ‘इंडियन हायर एजुकेशन : एनविजनिंग द फ्यूचर’ (भारतीय उच्च शिक्षा-एक भविष्य-दृष्टि) में अनेक कारण गिनाते हुए कहा है कि 1917-1919 के सेडलर आयोग से लेकर 1964-66 के कोठारी आयोग और बाद में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986-92, चट्टोपाध्याय आयोग और समय-समय पर गठित अनेक समितियों ने उच्च शिक्षा को लेकर कारण और चिंता की तो चर्चा की, विस्तार भी खूब हुआ, फिर क्या कारण है कि लगभग दो सौ विश्वविद्यालयों और राष्ट्रीय तकनीकी और चिकित्सा-संस्थानों के सर्वे में हमारी एक भी उच्च शिक्षा की संस्था विश्व-स्तर की नहीं पाई गई? डॉक्टर अग्रवाल ने इसके चार प्रमुख कारण रेखांकित किए हैं। – उच्च शिक्षा में गिरावट का प्रथम कारण हमारे पास आर्थिक क्षेत्र के अनेक स्तरों पर कौशल की कमी या लगभग पर्याप्त अभाव है।

– जातिगत आरक्षण के आधार पर उच्च शिक्षा की प्रतिष्ठित संस्थाओं में श्रेष्ठ अध्यापकों की भर्ती की समस्या है, जिससे न्यायपूर्ण नीति को बल तो मिला, सभी क्षेत्रों के लोगों को अवसर मिलने से संख्यात्मक संस्थाओं का विस्तार हुआ, लेकिन अनेक योग्य पात्र कोटा-प्रणाली के कारण उचित अवसरों से वंचित हो गए। आरक्षित वर्ग से भी पर्याप्त लोग नहीं मिल पाए। – जो संस्थागत वृद्धि हुई और कुशल मानवीय और भौतिक संसाधनों के कारण जो विकास की लहर प्रारंभ में पैदा हुई थी, उसे जारी रखने में हम कामयाब नहीं हुए और शैक्षिक विकास की गाति को कायम न रख सके, न ही स्वस्थ प्रतियोगिता से उच्च शिक्षा का स्तर तय कर पाए।

– चौथा महत्त्वपूर्ण कारण यह रहा है कि उच्च शिक्षा की मांग के अनुरूप हम कदम से कदम मिला कर नहीं चल सके और स्कूल स्तर पर मध्यवर्ग के छात्रों की संख्या में जो तेजी से वृद्धि हुई उसे उच्च शिक्षा ठीक से नियोजित करके संभाल नहीं सकी।
उच्च शिक्षा का स्तर ऊंचा उठाने के लिए वर्ष 1990 में सुकुमारन रिपोर्ट भी पेश की गई थी, जिसमें नैक, एनबीए, एनसीटीई, डीईसी, आईसीएआर आदि के प्रावधानों के साथ लगभग एक हजार बिंदुओं पर प्राइवेट और सरकारी संस्थाओं की व्यावसायिक गुणवत्ता (प्रोफेशनल क्वालिटी) को लेकर आकलन होना था। मगर यह प्रयास भी पूरी तरह सफल नहीं हुआ। संस्थाओं के पंजीकरण और मान्यीकरण के लिए जो गुणवत्ता बिंदु तय किए गए थे, उन्हें राजनीतिक हस्तक्षेपों और निजी क्षेत्र की शैक्षिक व्यापकता से उत्पन्न भ्रष्टाचार ने रद्दी की टोकरी में डाल दिया। डेल्फी के एक अध्ययन के अनुसार शोध-प्रक्रिया, समग्रता के साथ नवाचार, मान्यीकरण, औचित्य, अकादमिक लेखा-जोखा, प्रवीणता-आकलन आदि उपाय बताए गए थे, लेकिन उच्च शिक्षा संस्थाओं के शक्तिशाली आंतरिक राजनीतिक प्रतिरोध से ये उपाय भी ठीक से कारगर सिद्ध नहीं हुए।

उच्च शिक्षा किसी भी देश के सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और बौद्धिक विकास की प्रतिनिधि होती है। वह नवाचारों, प्रयोगों, उच्च-अध्ययनों, शोधों, आविष्कारों की ऐसी पहचान बनती है कि जिससे उसकी विश्वव्यापी प्रतिष्ठा बनती है। 1946-48 में डॉ. राधा कृष्णन आयोग ने उच्च शिक्षा को भारतीय ज्ञान परंपरा और सांस्कृतिक और बौद्धिक उत्कर्ष की शिक्षा बनाने के साथ भाषा तथा लोक-संस्कृति के संरक्षण की बात भी कही थी। 1964-66 में कोठारी आयोग ने शिक्षा का मूल केंद्र राष्ट्रीय उत्पादकता मान कर उच्च शिक्षा के विस्तार, निजी विश्वविद्यालय और निजी तथा सरकारी स्वायत्त कॉलेजों की सिफारिश की थी। शिक्षा नीति ने भी उच्च शिक्षा को उत्कृष्टता और शोध से ऊंचा उठाने की बात कही थी।

इतना सब होते हुए भी अगर उच्च शिक्षा की साख गिरी है, निजी संस्थाओं का विस्फोट हुआ है, तकनीकी और प्रौद्योगिकी संसाधनों ने शिक्षा को ज्ञानात्मक से सूचनात्मक बना दिया है, तो देश के समूचे बौद्धिक और शिक्षाविद वर्ग को सोचना होगा कि आखिर कमी क्या है कि आजादी के बाद हम एक भी सीवी रमण नहीं पैदा कर सके! और तो और, रामानुजन, शांतिस्वरूप भटनागर, मेघनाद साहा, होमी भाभा की कोटि का न वैज्ञानिक दे सके, न आजादी के आंदोलन के दौरान की वह संघर्षशील और बौद्धिक चेतना संपन्न पीढ़ी दे सके, जो अब हमारे लिए केवल अतीत बन कर रह गई है और हम वर्तमान की चौखट पर बैठ कर उच्च शिक्षा के निम्न-स्तर पर आंसू बहा रहे हैं।

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