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मौतों की गिनती, गरीबी और कर

महामारी से संबंधित मौतों के सही आंकड़ों को स्वीकार करने के मामले में सरकार की अनिच्छा है, जो सरकारी आंकड़ों से छह से आठ गुना ज्यादा हैं। बजाय इसके सरकार इन अध्ययनों का छिद्रान्वेषण करने में लगी है।

दिल्ली में 15-18 साल के बच्चों का वैक्सीनेशन। (फोटो सोर्स: ANI)

सामान्य जीवन में हम वक्त का हिसाब रखते हैं, पैसे गिनते हैं, खेल, रन और गोल गिनते हैं, हम सफलताओं और नाकामियों पर गौर करते हैं, वोट और सीटें गिनते हैं, आदि-आदि। मौतों की सटीक गिनती को लेकर शर्म की कोई बात नहीं है, लगता है सिवाय इसके कि मृतकों की सही संख्या कितनी होगी। कोरोना महामारी से हर जगह लोग मरे। पर संक्रमण से कितने मौतें हुर्इं, यह सही-सही सिर्फ तभी पता चल सकता था जब हर बीमार व्यक्ति का पता लगाया जाता, उसकी जांच की जाती और जीवित व्यक्ति का इलाज किया जाता, और बीमारी से मरे लोगों का शव-परीक्षण किया जाता। ऐसा उन देशों में संभव हो सकता था, जहां अपेक्षाकृत कम आबादी है और चिकित्सा सुविधाओं के लिहाज से भी जो काफी उन्नत हैं। साल 2020 में भारत के पास दोनों में से ऐसा कुछ नहीं था।

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कितनी मौतें?
विषाणु के कारण पूरे भारत में लोग मरे। और यह एकदम पक्की बात है कि इनमें से सबकी न तो जांच हुई, न इलाज और न ही ये सब लोग अस्पतालों में मरे। हमने देखा कि शवों को या तो नदियों में फेंक दिया गया या किनारों पर छोड़ दिया गया था। असल बात यह थी कि मरने वालों की सही-सही गिनती नहीं हो पाई। हर किसी ने यही स्वीकार किया, सरकार को छोड़ कर, जो निश्चयपूर्वक यह बताती है कि 22 अप्रैल, 2022 की सुबह तक विषाणु से हुई मौतों का आंकड़ा पांच लाख बाईस हजार पैंसठ था।

लगातार होते रहे अध्ययन इन आकंड़ों को खारिज करते रहे हैं। पहला भंडाफोड़ गुजरात में हुआ। सरकार की ओर से जारी किए गए मृत्यु प्रमाणपत्रों का मिलान करते हुए एक अखबार ने यह साबित कर दिया कि महामारी से पूर्व वाले वर्ष की तुलना में महामारी वाले साल में ज्यादा मौतें हुर्इं और यह अंतर बताता है कि ये मौतें सिर्फ विषाणु संक्रमण से हुर्इं। मौतों के आंकड़ों का यह ‘अंतर’ महामारी से संबंधित मौतों के सरकारी आंकड़ों से कहीं ज्यादा बड़ा था। जब दूसरे राज्यों में नगर निगमों में मृत्यु प्रमाणपत्रों और किए गए अंतिम संस्कारों के आंकड़ों का मिलान करके जांच की गई, तो हर बार यही साबित हुआ कि सरकार जितनी मौतों की बात मानने की इच्छुक थी, महामारी के कारण उससे कहीं ज्यादा लोग मारे गए थे।

विज्ञान और सामान्य समझ
यहीं पर विज्ञान आता है। साइंस पत्रिका के जनवरी 2022 के अंक में छपे एक अध्ययन में यह अनुमान लगाया गया कि भारत में महामारी से हुई मौतों का आंकड़ा तीस लाख से ज्यादा था। अप्रैल में लैंसेट में छपे एक अध्ययन में यह अनुमान चालीस लाख का है। एक तीसरा अध्ययन, जिसे विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने प्रायोजित किया और जो अभी छपा नहीं है, उसमें भी यह आंकड़ा चालीस लाख बताया गया है। (दुनिया भर का आंकड़ा नब्बे लाख होने का अनुमान है।)

अगर महामारी से संबंधित मौतों का आंकड़ा तीस से चालीस लाख के बीच का था, तो भारत सरकार को कई आधार पर नाकाम रहने का आरोपी ठहराया जा सकता है। केंद्र में छह साल और राज्यों में कई साल से सत्ता में रहने के बावजूद स्वास्थ्य देखभाल में पर्याप्त निवेश करने में भाजपा सरकारें नाकाम रही हैं। पूर्व में मिलती रहीं चेतावनियों के बावजूद सरकार इस महामारी आपदा का सामना कर पाने के लिए जरा भी तैयार नहीं थी। यात्राओं पर पाबंदी, पूर्णबंदी, कामचलाऊ स्वास्थ्य सेवाएं शुरू करने, टीकों के लिए आर्डर देने आदि जो इसके फैसले थे, उनमें निराशाजनक रूप से देरी की गई।

फिर भी, खतरनाक बात महामारी से संबंधित मौतों के सही आंकड़ों को स्वीकार करने के मामले में सरकार की अनिच्छा है, जो सरकारी आंकड़ों से छह से आठ गुना ज्यादा हैं। बजाय इसके सरकार इन अध्ययनों का छिद्रान्वेषण करने में लगी है। स्वास्थ्य मंत्रालय ने डब्ल्यूएचओ के अध्ययन के ‘तरीके’ को लेकर एतराज जताया है, जिसमें दुनिया भर के विशेषज्ञ शामिल रहे हैं!

अध्ययन की कार्यविधि को एक तरफ रख देते हैं और सामान्य समझ से भी देखते हैं। भारत में 2019 में छह लाख चौंसठ हजार तीन सौ उनहत्तर गांव थे। यह मानते हुए कि बीस फीसद गांव बहुत दूरदराज के इलाकों में हैं, इसलिए वहां संक्रमण नहीं फैला होगा (जो एक गलत पूर्वानुमान है) तो पांच लाख गांव बचते हैं। अगर औसत रूप से हर गांव में विषाणु से दो लोग भी मरे होंगे (जो बेहद कम अनुमान है) तो मृतकों का आंकड़ा दस लाख बनता है। फिर इसमें कस्बों और शहरों (शहरी आबादी पैंतीस फीसद है) में हुई मौतों को भी जोड़ लें, तो भी यह आंकड़ा पंद्रह लाख तक पहुंच जाएगा।

गरीबी और कर
एक और गिनती ने विवाद खड़ा कर दिया है, हालांकि इसके नतीजों से सरकार खुश है। विश्व बैंक के एक दस्तावेज में कहा गया है कि भारत में गरीबी साढ़े बाईस फीसद (2011) से घट कर 10.2 फीसद (2019) पर आ गई, जो 12.3 फीसद की गिरावट है और ग्रामीण क्षेत्रों में यह नतीजा और बेहतर रहा, जिसमें गरीबी में गिरावट की दर 14.7 फीसद रही। मैं इस बात से सहमत हूं कि गरीबी कम हुई है, लेकिन इसमें कई बातें हैं।

पहली, यह अध्ययन 2019 में रोक दिया गया था और इसमें महामारी से हुई तबाही पर गौर नहीं किया गया। दूसरा, यह कि मार्च 2020 के बाद सारे संकेतक नीचे चले गए थे और अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी ने 2020 से तेईस करोड़ लोगों के गरीबी में जाने का अनुमान लगाया था। इसलिए 2019 तक की उपलब्धियां इसमें से खत्म हो जाती हैं। तीसरा, नकारात्मक संकेतकों से हम अभी बाहर नहीं आ पाए हैं, बड़ी संख्या में जो रोजगार चले गए थे, वे वापस नहीं आए हैं, परिवारों पर जो कर्ज बढ़ गया था, उसमें भी कोई कमी नहीं आई है, और रोजगार के नए अवसरों की अब भी भारी कमी है। एक और गिनती को लेकर विवाद है।

वाशिंगटन में वित्तमंत्री ने दावा किया कि अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए हम जो राजस्व खर्च कर रहे हैं वह लोगों पर कर लगा कर वापस नहीं लाया जा सकता। किसी पर कोविड कर नहीं लगाया गया। यह लंबा-चौड़ा दावा बताता है कि केंद्र सरकार ने 2020-21 और 2021-22 के दौरान सिर्फ ईंधन पर करों से ही आठ लाख सोलह हजार एक सौ छब्बीस करोड़ रुपए भर लिए थे और तेल कंपनियों ने बहत्तर हजार पांच सौ इकतीस करोड़ रुपए (भारी-भरकम मुनाफे के लिए शुक्रिया) से सरकारी खजाना भर दिया।

यह मानने में शर्म की कोई बात नहीं कि कोविड से हुई मौतों का आंकड़ा अनुमानों से काफी कम है, गरीबी में कमी की बात का प्रचार ज्यादा है और करों की मार की बात कहीं नहीं हो रही।

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