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रंगमंच: हिंदी रंगमंच का लोकतांत्रिक चेहरा

ऐसा माना जा रहा है कि इस समय देश में जहां-जहां भी रंगमंच का शिक्षण-प्रशिक्षण हो रहा है, उनमें राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय नई दिल्ली को छोड़ दें, तो मध्यप्रदेश नाट्य विद्यालय ने खुद को सर्वश्रेष्ठ साबित किया है। इसका ताजा उदाहरण पिछले दिनों भोपाल में संपन्न आठवें दीक्षांत समारोह में मंचित चार नाटक हैं।

Author Published on: August 25, 2019 3:09 AM

अजित राय

मध्यप्रदेश नाट्य विद्यालय भोपाल में यह एक अच्छी परंपरा है कि सत्र की समाप्ति पर होने वाले दीक्षांत समारोह में जाने वाले विद्यार्थी नए विद्यार्थियों का स्वागत करते हैं। पिछले एक साल में प्रशिक्षण के दौरान जो भी चार-पांच नाट्य प्रस्तुतियां तैयार होती हैं, उनका दोबारा प्रर्दशन किया जाता है। इस अवसर पर बड़ी संख्या में मध्यप्रदेश में काम करने वाले रंगकर्मी, देश के जाने माने रंग निर्देशक और नाट्य समीक्षक भी परस्पर संवाद करते हैं। यहां का माहौल जितना जीवंत, आत्मीय और उर्जा से भरा रहता है, उतना कहीं और कम ही देखा जाता है। नाट्य समारोह तो अब सैकड़ों होने लगे हैं, पर मध्यप्रदेश नाट्य विद्यालय के दीक्षांत समारोह के दौरान पिछले आठ सालों से जैसे एक से बढ़ कर एक नाटकों का मंचन होता रहा है, वह चकित करने वाला है। इसकी सबसे बड़ी वजह यहां के विद्यार्थियों की रचनात्मक ऊर्जा और एक साल का सघन प्रशिक्षण है।

ऐसा माना जा रहा है कि इस समय देश में जहां-जहां भी रंगमंच का शिक्षण-प्रशिक्षण हो रहा है, उनमें राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय नई दिल्ली को छोड़ दें, तो मध्यप्रदेश नाट्य विद्यालय ने खुद को सर्वश्रेष्ठ साबित किया है। इसका ताजा उदाहरण पिछले दिनों भोपाल में संपन्न आठवें दीक्षांत समारोह में मंचित चार नाटक हैं। ये नाटक है अरुण पाण्डेय (जबलपुर) लिखित-निर्देशित बुंदेलखंड के लोक कवि ईसुरी की रचनाओं पर आधारित ‘हंसा करले किलोल’, सूर्य मोहन कुलश्रेष्ठ निर्देशित प्रथम विश्व युद्ध की पृष्ठभूमि पर वेदा राकेश द्वारा अनूदित इरविन शा का ‘बरी द डेड’(1936), बापी बोस निर्देशित और रांगेय राघव द्वारा अनूदित विलियम शेक्सपियर का मशहूर नाटक ‘वेनिस का सौदागर’ तथा हरिशंकर परसाई की रचनाओं पर देवेंद्र राज अंकुर निर्देशित ‘परसाई के संग प्रेम के तीन रंग’। मध्यप्रदेश नाट्य विद्यालय के संस्थापक निदेशक संजय उपाध्याय के बाद वर्तमान निदेशक और देश के सुप्रसिद्ध अभिनेता आलोक चटर्जी इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।

वरिष्ठ रंगकर्मी और राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के पूर्व निदेशक देवेंद्र राज अंकुर की नई प्रस्तुति ‘परसाई के संग, प्रेम के तीन रंग’ कई मायनों में महत्त्वपूर्ण है। इसके आधार पर भारतीय रंगमंच में अंकुर शैली के लगभग सभी सौंदर्यशास्त्रीय आयामों को समझा जा सकता है। मुंबई की मंडली ‘अंक’ (दिनेश ठाकुर-प्रीता माथुर) के साथ वे कुछ साल पहले भी परसाई की रचना ‘एक लड़की पांच दीवाने’ पर नाटक कर चुके हैं। यह भी कम दिलचस्प नहीं है कि इधर हिंदी इलाके में हरिशंकर परसाई की रचनाओं के प्रति रंगमंचीय रूझान कुछ ज्यादा ही बढ़ा है।

देवेन्द्र राज अंकुर वैसे तो पिछले करीब पचास सालों से कहानियों-उपन्यासों का मंचन करते रहे हैं और उन्होंने भारतीय रंगमंच में ‘कहानी का रंगमंच’ का पुनराविष्कार कर एक नई विधा को ही स्थापित कर दिया है, पर पिछले दो सालों से उनकी प्रस्तुतियों में एक नई चमक और ताजगी आई है। उन्होंने पहले पचास साल की हिंदी कहानी पर ‘आधी सदी’ नाम से विलक्षण प्रस्तुति करके अपने उन आलोचकों का मुंह बंद कर दिया, जो कहने लगे थे कि ‘अब अंकुर जी का कहानी का रंगमंच थकने लगा है, या अब इसे खांची में उठा कर घूरे पर फेंक देना चाहिए।’ जिस कुशलता से उनके अभिनेताओं ने ‘उसने कहा था’(चंद्रधर शर्मा गुलेरी), ‘पाजेब’ ( जैनेंद्र कुमार), ‘परदा’ (यशपाल) और ‘चीफ की दावत’ (भीष्म साहनी) को मंच पर खेला, वह बेमिसाल है। हर कहानी में जहां कोई भी चरित्र, कोई भी अभिनेता निभाने को स्वतंत्र है, फिर भी हर अभिनेता अपनी स्पष्ट छाप छोड़ जाता है। यहां तक कि ‘पाजेब’ में छोटे बच्चे की भूमिका में पहली बार प्रकाश झा जैसे अब-तक अलक्षित अभिनेता भी दर्शकों की यादों में बने रह जाते हैं। इसी तरह हाल ही में उन्होंने महात्मा गांधी की आत्मकथा ‘सत्य के प्रयोग’ का प्रभावशाली मंचन करके सबको चौंका दिया। गांधीजी की चिर-परिचित आत्मकथा भी इतनी रोचक हो सकती है और बिना किसी तामझाम के भी प्रकाश संयोजन से दृश्य बनाए जा सकते हैं, यह प्रस्तुति इसका प्रमाण है।

‘परसाई के संग प्रेम के तीन रंग’ में अंकुर जी ने अपनी चिर-परिचित प्रस्तुति प्रक्रिया अपनाते हुए कहानियों के चयन का जिम्मा अभिनेताओं पर ही छोड़ दिया और पढ़ने के दौरान जो तीन आलेख अंतिम रूप में निकल कर आए, उन्हें तीन समूहों में बांट कर अभिनेताओं को खुल कर खेलने की आजादी दी, बजाय इसके कि वे खुद कोई बना-बनाया ढांचा थोपते, जैसा कि दूसरे निर्देशक आमतौर पर करते हैं। ये कहानियां हैं- ‘प्रेमियों की वापसी’, ‘घेरे के भीतर’ और ‘एक फिल्म कथा’। हरिशंकर परसाई का गद्य अपने आप में इतना असरदार है कि खुद-ब-खुद नाटकीय स्थितियां बनती चली जाती हैं। अभिनेता या निर्देशक को अलग से कुछ करने की जरूरत नहीं पड़ती। मंच पर अभिनेता अपनी देह-भाषा और देह-गतियों तथा संवाद अदायगी की अदा (वाचिक) से दृश्य बनाते हैं। इसमें परसाई के आलेख की रवानगी से भी काफी मदद मिलती है।

पहली रचना ‘प्रेमियों की वापसी’ में एक युवक और युवती इसलिए आत्महत्या कर लेते हैं कि भारतीय समाज में प्रेम करना लगातार असंभव होता जा रहा है। वे सांसारिक बंधनों से मुक्त होकर स्वर्ग से प्रेम की संभावना तलाशने जाते हैं। पर यह क्या वहां तो और अच्छा मारामारी और पाखंड है और घबरा कर वे वापस मृत्युलोक में लौटना चाहते हैं। दूसरी रचना ‘घेरे के भीतर’ में एक पत्नी अपने पति से नियमित रूप से पिट कर भी इसलिए खुश है कि अब उसके पति को दूसरी औरत के बारे में सोचने की भी फुरसत नहीं। अंतिम रचना ‘एक फिल्म कथा’ सचमुच हास्यास्पद फिल्मी घटनाओं से भरी हुई है, जिसमें एक अमीर युवक एक गरीब लड़की के इश्क में पागल है।

इन तीनों रचनाओं में आलेख की रवानगी के साथ अभिनेताओं का कुशल बर्ताव शुरू से अंत तक प्रस्तुति को बांधे रहता है, कहीं भी फिसलने नहीं देता। अभिनय पक्ष पर यहां विस्तार से चर्चा इसलिए संभव नहीं है कि पच्चीस अभिनेताओं की टीम को (आठ-आठ और नौ) तीन समूहों में बांट कर इसे खेला गया है। सूत्रधार और चरित्र आपस में बदलते रहते हैं। कोई भी अभिनेता किसी एक चरित्र से बंधा हुआ नहीं है, इसलिए किसी एक के बारे में कोई टिप्पणी नहीं की जा सकती। यही रंगमंच की अंकुर शैली है।

अरुण पांडेय के निर्देशन में बुंदेलखंड के लोक कवि ईसुरी की रचनाओं पर आधारित नाटक ‘हंसा करले किलोल’ अपने आलेख में जबरदस्त भटकाव के बावजूद अभिनेताओं की कुशलता से अच्छा बन पड़ा है। मिथक, इतिहास और वीरता की भूल-भूलैया अक्सर निर्देशक को भटका देती है। इस नाटक को छतरपुर में आयोजित बुंदेलखंड भ्रमणशील कार्यशाला में तैयार किया गया है। 1857 के विद्रोह से भी पहले की पृष्ठभूमि में एक मृदंगिया और बेड़नी नर्तकी की प्रेमकथा और अंग्रेजों से आजादी की जंग के ताने-बाने में बुंदेलखंड की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से परिचित कराने की कोशिश की गई है।

सूर्यमोहन कुलश्रेष्ठ ने अपने युद्ध विरोधी नाटक ‘बरी द डेड’ में एक पुराने आलेख को नए कलेवर में प्रासंगिक बनाया है। इस नाटक में युद्ध में मारे गए सैनिक अचानक जीवित होकर खुद को दफन होने से इनकार कर देते हैं। उन्हें मनाने के लिए पहले तो सेना के अधिकारी डराते-धमकाते है, फिर इमोशनल ब्लैक मेलिंग का सहारा लेते हैं। फिर भी बात नहीं बनती तो सेना के अधिकारी मृत सैनिकों के जीवित बची बीबियों, प्रेमिकाओं, मांओं और रिश्तेदारों को लाते हैं। अकालमृत्यु के शिकार हुए अधिकतर सैनिक अपनी अधूरी और उस जिंदगी का सपना देखते हैं, जो वे जी नहीं पाए और युद्ध में मारे गए। अभिनय इसलिए सशक्त है कि हर सैनिक अपने किरदार में धीरे-धीरे मनुष्य में बदलता है।

बापी बोस निर्देशित ‘वेनिस का सौदागर’ एक भव्य प्रस्तुति है, जिसमें सेट डिजाइन से लेकर प्रकाश संयोजन और वस्त्र सज्जा सब कुछ ‘स्पेक्टेकुलर’ है। शाईलाक की भूमिका में अखंड शर्मा आकर्षित करते हैं। मंच पर सेट बदलने में भी नाटकीयता रखी गई है। वैसे भी बापी बोस अपनी भव्य प्रस्तुतियों के लिए जाने जाते हैं। ‘दिल्ली चलो’ से लेकर ‘परम पुरुष’ तक उन्होंने की बेहतरीन प्रस्तुतियां दी हैं। उन्होंने आरती यादव (पोर्शिया) और प्रियदर्शिनी पूजा (नैरिसा) से बहुत उम्दा काम करवाया है। मध्यप्रदेश नाट्य विद्यालय के कलाकार इस बात के लिए भी बधाई के पात्र हैं कि उन्होंने केवल एक दिन की तैयारी में चार चार नाटक एक के बाद एक खेला। अभिनेताओं में ऐसी ताजगीभरी उर्जा कम देखने को मिलती है। अभिनेताओं के एक ही समूह के साथ चार अलग-अलग शैलियों के नाटकों का मंचन हिंदी रंगमंच में विविधतापूर्ण और लोकतांत्रिक दृश्यावली रचता है।

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