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दूसरी नजर: डरते-डरते जो भी किया, उसका स्वागत

यह खेदजनक है कि 30 जनवरी को जब कोरोना के पहले मामले की पुष्टि हुई थी, तब से तैयारी नहीं करना मोदी सरकार की पहचान बन चुकी है। इन तथ्यों पर गौर करें:- सबसे बड़ी नाकामी अपर्याप्त जांच की रही। महामारी विशेषज्ञ और चिकित्सा विशेषज्ञ और ज्यादा जांच को लेकर एकमत थे। जांच, व्यापक स्तर पर जांच, पहचान, पृथक करना और इलाज वक्त की जरूरत थी।

देश के सभी राज्यों को महामारी से निपटने के लिए भारी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।

शुक्रवार 19 मार्च, 2020 को प्रधानमंत्री ने घोषणा की थी कि रविवार 22 मार्च को जनता कर्फ्यू रहेगा। मुझे लगा कि प्रधानमंत्री पहले जायजा ले रहे हैं और कर्फ्यू खत्म होने पर वे किसी न किसी तरह के लॉकडाउन (बंदी) की घोषणा करेंगे। रविवार को कोई घोषणा नहीं की गई। इस बीच, 20 मार्च से 23 मार्च के दौरान कई राज्य सरकारों ने अपने राज्यों के कई हिस्सों में पूर्ण या आंशिक बंदी की घोषणा कर दी। सोमवार (23 मार्च) या मंगलवार (24 मार्च) को ज्यादा कुछ नहीं हुआ, सिवाय इसके कि जांच में संक्रमित निकलने और मरने वालों की संख्या धीरे-धीरे बढ़ती रही।

इटली, स्पेन और ईरान में जो हो रहा था, संभवत: उसकी चेतावनी को देखते हुए ही प्रधानमंत्री 24 मार्च को दोबारा टीवी पर पहुंचे और उस दिन आधी रात से प्रभावी देशव्यापी बंदी का एलान कर दिया। 25 मार्च लगते ही बंदी शुरू हो गई। जब आप इस लेख को पढ़ रहे होंगे, तब यह बंदी पांचवे दिन में प्रवेश कर चुकी होगी। इस देशव्यापी बंदी के लिए न केवल देश तैयार नहीं था, बल्कि केंद्र सरकार भी इसके लिए तैयार नहीं थी। वरना कोई इस तथ्य को कैसे स्पष्ट कर सकता है कि प्रधानमंत्री ने 19 मार्च को जिस आर्थिक कार्यबल की घोषणा की थी, उसका अभी तक गठन नहीं हुआ है?

सरकार तैयार नहीं
यह खेदजनक है कि 30 जनवरी को जब कोरोना के पहले मामले की पुष्टि हुई थी, तब से तैयारी नहीं करना मोदी सरकार की पहचान बन चुकी है। इन तथ्यों पर गौर करें:- सबसे बड़ी नाकामी अपर्याप्त जांच की रही। महामारी विशेषज्ञ और चिकित्सा विशेषज्ञ और ज्यादा जांच को लेकर एकमत थे। जांच, व्यापक स्तर पर जांच, पहचान, पृथक करना और इलाज वक्त की जरूरत थी। लगता है, इस मामले में सरकार नाकाम रही। सबसे ज्यादा (जब मैं लिख रहा हूं) सिर्फ बारह हजार जांच रोजाना की जा रही थीं, जो संक्रमित मरीजों के तेजी से बढ़ते आंकड़ों की भविष्यवाणी कर रही थी। इंडियन काउंसिल आफ मेडिकल रिसर्च (आइसीएमआर) जिस तरह से रंग बदलता रहा, उससे भी ढीलेपन और भ्रम की स्थिति बनती गई। आज की तारीख तक कुछ भी साफ नहीं है।

– जांच में संक्रमित पाए जाने वाले लोगों की संख्या सात सौ चौबीस तक पहुंच जाने और रोजाना देश के अलग-अलग हिस्सों से नए-नए मामले सामने आने के बाद भी आइसीएमआर और स्वास्थ्य मंत्रालय यह दावा करता रहा कि भारत अभी भी दूसरे चरण में ही है और ‘समुदायों के स्तर पर फैलने’ का कोई प्रमाण सामने नहीं आया है। इस दावे को लेकर कुछ महामारी विशेषज्ञों ने संदेह भी व्यक्त किया।

– भारत को सात लाख पीपीई सूट, साठ लाख एन-95 मास्क और एक करोड़ थ्री-प्लाई मास्क की जरूरत है। इस बात का कोई संकेत नहीं है कि आज इनमें से कितने उपलब्ध हैं या बाकी कब तक उपलब्ध हो जाएंगे।

– प्रतिबंध की मांग के बावजूद जीवन रक्षक उपकरण (वेंटीलेटर), श्वास संबंधी उपकरणों और सैनेटाइजरों के निर्यात पर प्रतिबंध 24 मार्च को ही लगाया गया।
– आपूर्ति का काम अभी तक बाधित है। ज्यादातर किराना दुकानें इसलिए बंद हो गई हैं कि सामान की आपूर्ति बंद हो गई है। कई मामलों में तो दुकानों में काम करने वालों को वहां तक पहुंचने ही नहीं दिया जा रहा।

– दिल दहला देने वाली ऐसी तस्वीरें आ रही हैं जिनमें छोटे बच्चे कहते दिख रहे हैं कि उस दिन उन्होंने कुछ भी नहीं खाया था, क्योंकि घर में खाने को कुछ भी नहीं था और राजस्थान, बिहार या उत्तर प्रदेश में पैदल अपने घरों को लौटते प्रवासी मजदूर रास्ते में फंसे पड़े हैं। इससे स्पष्ट है कि सरकार ने इन सबको इनके भाग्य भरोसे छोड़ दिया था।
– इसमें कोई संदेह नहीं कि राज्य सरकारों के नियंत्रण में पुलिस को कोई स्पष्ट निर्देश नहीं थे। कई जगहों पर पुलिस ने सामान पहुंचाने वालों और खरीदारी कर रहे लोगों को पीटा। बंदी का कथित उल्लंघन करने वालों पर पुलिस लाठीचार्ज और बिना कानूनी अधिकार के असामान्य सजा देने के वायरल हुए वीडियो भौंचक कर देने वाले हैं।

बिना तैयारी के योजना
सबसे भारी चूक पूर्ण बंदी के एलान के साथ ही गरीबों, बंटाईदारी पर खेती करने वाले किसानों, खेतिहर मजदूरों, दिहाड़ी मजदूरों, स्वरोजगार वालों, एमएसएमई स्वामियों की आजीविका को बचाने में नाकाम रहने की है। दूसरी ओर उस समूह को भी असहाय छोड़ दिया गया है, जिनमें नियोक्ता (जिन पर वेतन देने की जिम्मेदारी है), कर दाता और मासिक किस्त चुकाने वाले शामिल हैं।

सरकार के समक्ष कई सुझाव थे, लेकिन 26 मार्च तक सरकार कांपती रही। वित्त मंत्री ने जिस वित्तीय कार्य योजना (एफएपी) का एलान किया, वे आधे-अधूरे थे और उनमें कहीं कोई व्यापकता नहीं थी। एफएपी गरीब तबके के कई वर्गों को पर्याप्त खाद्य मुहैया कराएगा, लेकिन उनकी जेब में पैसा जाए, इसके लिए एफएपी जरा पर्याप्त नहीं है। बदतर तो यह कि गरीब और वंचित तबके के कुछ हिस्सों की तो एकदम से अनदेखी कर दी गई है, जैसे- बंटाई पर खेती करने वाले किसान, मनरेगा में काम करने वाले जो बिना मनरेगा के काम के होंगे, निराश्रित और बेघर, पुरुष जनधन खाताधारक, नौकरी से छंटनी कर निकाले गए लोग आदि। इसके अलावा, कर भुगतान की समयसीमा बढ़ाने, मासिक किस्तों की समयसीमा स्थगित करने, जीएसटी दरों में कटौती आदि जैसी वैध मांगों और समस्याओं का कोई रास्ता नहीं निकाला गया है। यह वित्तीय कार्य योजना उम्मीदों से काफी कम है। मैंने इस योजना के बारे में सचेत करते हुए इसका स्वागत किया है।

नेतृत्व की जरूरत
वैसे तो वित्तमंत्री ने दावा किया है कि सरकार की योजना एक लाख सत्तर हजार करोड़ रुपए की है, मेरा अनुमान है कि जो नगदी लाभार्थियों के खातों में हस्तांतरित की जानी है, वह साठ हजार करोड़ रुपए अतिरिक्त होगी और चालीस हजार करोड़ का अनाज और दालें अलग से। यह खर्चा जरूरी है, लेकिन पर्याप्त नहीं है। अगले कुछ घंटों या दिनों में एफएपी के दूसरे भाग की जरूरत होगी।

ज्यादातर लोग इस भ्रम में जी रहे हैं कि चीन, स्पेन, इटली या अन्य देशों की तरह भारत प्रभावित नहीं होगा। मुझे डर है कि भारत अपवाद नहीं है। हर देश की तरह भारत में भी बड़े पैमाने पर तबाही होगी। इसके अलावा, इस वक्त हम सिर्फ लोगों की जिंदगी, स्वास्थ्य और रोजी-रोटी बचाने की चिंताओं में लगे हैं। इससे भी बड़े सवाल अर्थव्यवस्था, रोजगार और आय के हैं। एक गिरती अर्थव्यवस्था और नीचे जाएगी, लोग और ज्यादा तबाह होंगे, ज्यादा दुखदायी हालात बनेंगे। सरकार को अपनी हिचकिचाहट छोड़ कर अपवादस्वरूप ठोस और निर्णायक नेतृत्व देना चाहिए।

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