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दलित विमर्शः फुले-आंबेडकर की विरासत

वर्चस्ववादियों ने फुले-आंबेडकर के बारे में यथासंभव दुष्प्रचार किया। तरह-तरह की अफवाहें फैलाई गर्इं। पूर्वग्रहों का निर्माण किया गया। उन्हें जाति-विशेष का नायक साबित करना इसी अभियान का हिस्सा था। जो जाति उन्मूलन के लिए आजीवन प्रयासरत रहा हो, उसको जाति के दायरे में रखना त्रासद विडंबना नहीं तो और क्या है!

Dr. Babasaheb Ambedkar statue at Savitribai Phule Pune University. Express Photo By Pavan Khengre,09.04.16,Pune.

आधुनिक भारत में सामाजिक क्रांति की कोई भी चर्चा फुले-आंबेडकर के उल्लेख के बिना अधूरी है। दोनों क्रांतिकारी विचारकों की विरासत के नए दावेदार इधर सक्रिय हुए हैं। उनका ध्यान फुले पर कम, आंबेडकर के अधिग्रहण पर ज्यादा है। इस वर्ष का अप्रैल महीना साक्षी बना कि आंबेडकर संबंधी कर्मकांड का ग्राफ काफी ऊपर चला गया है। सामाजिक हिंसा में वृद्धि और आंबेडकर-भक्ति का सहअस्तित्व निश्चय ही विचित्र विडंबना है। वर्चस्व की ताकतें हर समाज में एक-सी होती हैं, लेकिन उनकी कार्य पद्धति में भिन्नता होती है। आंबेडकर की वैचारिकी को विस्थापित कर उनके नाम पर कर्मकांडी उत्सव रोपने में पूंजीवाद और पुरोहितवाद दोनों का हित सधता है। दोनों मिल कर आंबेडकर के दैवीकरण को अंजाम तक पहुंचाने में लगे हुए हैं। यों तो पूंजीवाद ने पुरोहितवाद के साथ पहले से सामंजस्य बैठा लिया था, मगर इस बीच उनके मध्य अभूतपूर्व जुगलबंदी हुई है। इस वक्त आंबेडकरवादी होने का मतलब है कि इस जुगलबंदी और उसके परिणामस्वरूप पसरती जकड़बंदी के विरुद्ध संघर्ष किया जाए।

आंबेडकर महात्मा फुले को अपना गुरु मानते थे। 1946 में प्रकाशित अपनी महत्त्वपूर्ण किताब ‘शूद्र कौन थे?’ फुले को समर्पित करते हुए उन्होंने लिखा था कि फुले ने छोटी जातियों को उच्च वर्णों की दासता के प्रति जागृत किया और इस सिद्धांत का प्रतिपादन किया कि सामाजिक लोकतंत्र की प्राप्ति विदेशी शासन से मुक्ति से अधिक महत्त्वपूर्ण है। अपने तीन गुरुओं- बुद्ध, कबीर, फुले में आंबेडकर की सर्वाधिक नजदीकी फुले से ही दिखती है। यह जानना जरूरी है कि दलित शब्द का नए अर्थ में पहला प्रयोग फुले ने ही किया था। उन्होंने बमुश्किल एकाध बार ‘ब्राह्मणेतर’ शब्द का इस्तेमाल किया। उनका प्रिय शब्द ‘शूद्रातिशूद्र’ (शूद्र और अतिशूद्र) था। उनकी केंद्रीय चिंता अतिशूद्र को लेकर थी। व्यक्ति, समाज और सरकार की हर गतिविधि, पहल और नीति को वे अतिशूद्र अर्थात दलित के कोण से देखते और जांचते थे। आंबेडकर ने उनसे निश्चय ही बहुत कुछ लिया होगा।

मगर दोनों में कुछ उल्लेखनीय भिन्नताएं भी दिखाई पड़ती हैं। फुले मानते थे कि आर्य बाहर के थे और उन्होंने हमलावर के रूप में भारत में प्रवेश किया था। आंबेडकर इस मान्यता में विश्वास नहीं करते थे। ‘रेस’ (नस्ल) के सिद्धांत से उनकी स्पष्ट असहमति थी। फुले नास्तिक नहीं थे। वे एक सर्वव्यापी निराकार ईश्वर में यकीन रखते थे। इसके विपरीत आंबेडकर का ईश्वर में कतई विश्वास नहीं था। हां, धर्म समाज के लिए आवश्यक है, इसमें दोनों की सहमति थी। एक नैतिक संहिता के रूप में, समता, प्रेम, न्याय जैसे मूल्यों के समुच्चय के रूप में धर्म इन्हें मान्य था। दोनों ही जाति का उन्मूलन चाहते थे।

नए समाज के निर्माण के लिए उन्होंने शिक्षा, खासकर स्त्री शिक्षा पर बहुत बल दिया। दोनों ने ही अपनी जीवनसंगिनी को शिक्षित करने की कोशिश की। फुले इसमें सफल रहे, जबकि आंबेडकर परिस्थितिगत बाध्यताओं के चलते कंडा पाथ कर किसी तरह गृहस्थी चलाने वाली रमाबाई को अक्षर ज्ञान नहीं दे सके। दोनों स्त्री को दासी समझने वाली मानसिकता का पुरजोर विरोध करते रहे। उन्होंने स्त्री को मनुष्य का दर्जा दिया। उन्हें ‘व्यक्ति’ माना। फुले के समकालीन बालगंगाधर तिलक मानते थे कि शिक्षा स्त्रियों को ‘संशयात्मा’ बना देगी। आदर्श बिखर जाएंगे और परिवार टूट जाएंगे। फुले का कहना था कि सभी प्राणियों में मनुष्य श्रेष्ठ है और मनुष्यों में स्त्री। उन्होंने यह भी कहा कि सारे धर्मग्रंथ पुरुषों ने लिखे हैं। इनमें पुरुषों के अधिकार तो सुरक्षित रखे गए हैं, लेकिन स्त्रियों के साथ पक्षपात किया गया है। अगर कोई विदुषी धर्मग्रंथ लिखती तो उसमें स्त्रियों के अधिकारों की रक्षा होने पर भी पुरुषों के अधिकारों के साथ पक्षपात न किया गया होता। उन्होंने पुरुषों से पूछा कि क्या वे यह सहन करेंगे कि उनकी तरह कोई स्त्री दो-तीन पुरुषों को घर में रखे? अगर स्त्रियों का यह आचरण उचित नहीं है तो बहुपत्नी वाले पुरुषों का आचरण उचित कैसे कहा जा सकता है? फुले की तर्क पद्धति और तेवर का गहरा असर ताराबाई शिंदे लिखित ऐतिहासिक निबंध ‘स्त्री-पुरुष तुलना’ पर देखा जा सकता है।

वर्चस्ववादियों ने फुले-आंबेडकर के बारे में यथासंभव दुष्प्रचार किया। तरह-तरह की अफवाहें फैलाई गर्इं। पूर्वग्रहों का निर्माण किया गया। इन सबके लिए खासी उर्वर जमीन पहले से उपलब्ध थी! उन्हें जाति-विशेष का नायक साबित करना इसी अभियान का हिस्सा था। जो जाति उन्मूलन के लिए आजीवन प्रयासरत रहा हो, उसको जाति के दायरे में रखना त्रासद विडंबना नहीं तो और क्या है! समूचे समाज की मुक्ति के लिए काम करने वाले इन चिंतकों को जातिवादी साबित करने के सुनियोजित उद्यम के अंतर्गत यह भी प्रसारित किया गया कि ये लोग ब्राह्मणद्वेषी थे। इनके जीवन पर तनिक-सी निगाह डालने भर से यह आरोप निर्मूल सिद्ध हो जाता है।

फुले ने 1848 के उत्तरार्ध में अपने घर पर पहला स्कूल ब्राह्मण लड़कियों को शिक्षा देने के लिए खोला था। परंपरावादियों के घोर विरोध के दबाव में आकर जब उन्हें अपने पैत्रिक घर से बाहर निकाला गया तो उन्होंने जुलाई 1851 में पुणे के अण्णासाहब चिपलूणकर के घर पर पुन: यह स्कूल खोला। उनके मित्र चिपलूणकर ब्राह्मण ही थे। सावित्रीबाई को पढ़ाने के लिए उन्होंने परांजपे से कहा था। ये भी ब्राह्मण ही थे। इसके साथ फुले ने अछूतों के लिए भी स्कूल खोला। 1868 में अपने घर का हौज दलितों को मुहैया कराया। सती प्रथा सवर्ण परिवारों का रोग था। फुले ने इस प्रथा के विरुद्ध संघर्ष छेड़ा। ब्राह्मण विधवाओं की दशा अत्यंत चिंताजनक थी।

उनका मुंडन करवा कर उन पर अनगिनत प्रतिबंध लादे जाते थे। फुले ने नाइयों का संगठन बना कर विधवाओं का मुंडन बंद कराने की कोशिश की। 1863 में उन्होंने अपने मकान को ‘बालहत्या प्रतिबंधक गृह’ में बदल दिया। जन्मना ब्राह्मण लेकिन ब्राह्मण मानसिकता की तीव्रतम भर्त्सना करने वाले ‘लोकहितवादी’ गोपालराव देशमुख ने लिखा था कि विधवा विवाह पर रोक होने से पुणे और उसके आसपास दो-तीन हजार बच्चों की हत्या की जाती है। लोकहितवादी का सम्मान करने वाले फुले के प्रयास से इन हत्याओं की संख्या में कमी आई। उनके बालहत्या प्रतिबंधक गृह में आने वाली स्त्रियों की पहचान और प्रसूति की प्रक्रिया गोपनीय रखी जाती थी। फुले दंपत्ति का अपना कोई बच्चा नहीं था। उन्होंने यशवंत नामक जिस बच्चे को पाला और अपना उत्तराधिकारी घोषित किया वह एक ब्राह्मणी की कोख से था।

आंबेडकर के शुभेच्छुओं और निकट मित्रों में जन्मना ब्राह्मणों की संख्या पर्याप्त थी। उनके द्वारा स्थापित ‘बहिष्कृत हितकारिणी सभा’ की कार्यकारिणी इसकी साक्षी है। 1927 में महाड सत्याग्रह के दौरान मनुस्मृति दहन का प्रस्ताव ग.नी. सहस्रबुद्धे का था। सहस्रबुद्धे पुणे के ब्राह्मण थे। प्रस्ताव के अगले दिन आंबेडकर ने इसे अपनी स्वीकृति दी थी। फुले-आंबेडकर पर एक आक्षेप यह लगाया जाता है कि वे अंगरेजी शासन के हिमायती थे। यह बात समझ से परे है कि स्वाधीनता के लिए संघर्ष करने वाले पराधीनता के पक्ष में कैसे खड़े हो सकते हैं! ब्रिटिश साम्राज्यवाद का चरित्र आंबेडकर ने अपने डीफिल के शोधप्रबंध में ही उजागर कर दिया था। वे कहा करते थे कि अंगरेज अछूतों के कल्याणार्थ नहीं आए हैं। फुले के बारे में यह तथ्य कम लोगों को मालूम है कि मराठी के ‘दीनबंधु’ नामक अखबार में उनके ग्रंथ ‘किसान का कोड़ा’ का प्रकाशन दो अध्यायों के बाद रोक दिया गया था, क्योंकि इसमें फुले ने अंगरेजी शासन पर भी जबरदस्त कोड़े लगाए हैं। ग्रंथ लिखने के पचासी वर्ष बाद 1967 में यह छप सका था।

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