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दूसरी नजर: कृषि कानून- विकल्प नहीं, सिर्फ हल्ला

मोदी सरकार के नए नियम वैकल्पिक किसान बाजारों का सृजन नहीं करते। इसके उलट, निजी प्रबंधों को सुनिश्चित करने के लिए कारपोरेट सहित निजी व्यापारियों को इजाजत देकर और विवादों के समाधान की प्रक्रिया को और पेचीदा तथा नौकरशाही के हवाले करते हुए सरकार ने किसानों के लिए और मुश्किलें पैदा कर दी हैं।

लोकतंत्र का यह तकाजा है कि यह सभी के सहमति और विचार-विमर्श से ही चले।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर कृषिमंत्री, वित्तमंत्री, नीति आयोग के सीईओ तक और भाजपा के अध्यक्ष से लेकर भाजपा के प्रवक्ता तक सब एक ही राग अलाप रहे हैं। इनका तर्क है कि किसान कृषि उपज बाजार समिति (एपीएमसी) से ‘बंधे’ हुए थे और अब उनके पास अपनी उपज को एपीएमसी से बाहर जाकर बेचने का विकल्प मौजूद है। बेशक, अपने तर्क के समर्थन में वे कोई डाटा पेश नहीं करेंगे।
इन्फोसिस के सह-संस्थापक नारायण मूर्ति ने कहा बताते हैं कि ‘हम ईश्वर में भरोसा रखते हैं। बाकी किसी भी चीज के लिए आंकड़े लाइए।’

अकाट्य आंकड़े
आंकड़े क्या कहते हैं? ये बताते हैं कि
– छियासी फीसद छोटे किसान हैं, जिनके पास दो एकड़ से भी कम जोत है,
– कृषि जनगणना के मुताबिक किसानों की जोत बंटती जा रही है। 2010-11 में किसानों की संख्या तेरह करोड़ अस्सी लाख थी, जो 2015-16 में बढ़ कर चौदह करोड़ साठ लाख हो गई थी,
– छोटे किसानों के पास बिक्री के लिए बहुत ही कम अनाज बच पाता है, फिर भी वे धान या गेहूं के कुछ बोरे अपना कर्ज चुकाने या तात्कालिक घरेलू जरूरतों को पूरा करने के लिए बेच देते हैं,
– सिर्फ छह फीसद किसान ऐसे हैं जो अपनी उपज एपीएमसी बाजार मंडी में बेचते हैं, बाकी चौरानबे फीसद एपीएमसी के बाहर ही बेचते हैं, ज्यादातर स्थानीय व्यापारियों या सहकारी समितियों या प्रसंस्करण इकाइयों को,

– केरल और चंडीगढ़ को छोड़ कर किसी भी केंद्र शासित प्रदेश और पूर्वोत्तर के कुछ राज्यों में एपीएमसी नहीं है। बिहार ने कुछ साल पहले राज्य के एपीएमसी कानून के रद्द कर दिया था। इन राज्यों में एपीएमसी के बाहर कृषि उत्पाद बाजारों ने जगह ले ली,

– एपीएमसी की संख्या राज्यों में अलग-अलग है। हरियाणा में एक सौ छह, तो पंजाब में एक सौ पैंतालीस और तमिलनाडु में दो सौ तिरासी। जबकि पंजाब और हरियाणा में होने वाले सत्तर फीसद गेहूं और धान की खरीद सरकारी एजेंसियां (ज्यादातर भारतीय खाद्य निगम) करती हैं, 2019-20 में तमिलनाडु में एपीएमसी का सारी फसलों का कारोबार सिर्फ 129.76 करोड़ रुपए रहा था, और
– महाराष्ट्र में औसतन एक किसान को एपीएमसी बाजार तलाशने के लिए पच्चीस किलोमीटर तक का सफर करना पड़ता है।

यथास्थिति को मजबूत करना
चाहे किसी राज्य में एपीएमसी हो या नहीं और चाहे एपीएमसी पास हो या दूर, हकीकत यह है कि अनियंत्रित व्यवस्था में चौरानबे फीसद किसानों के पास अपनी फसलों को एपीएमसी के बाहर बेचने के अलावा कोई चारा नहीं है।

प्रधानमंत्री से लेकर प्रवक्ताओं में से कोई भी यह स्पष्ट नहीं करेगा कि किसानों को एपीएमसी और बिचौलियों के बीच बंधा हुआ क्यों दिखाया जा रहा है, जबकि तथ्य यह है कि चौरानबे फीसद किसान तो पहले ही इस व्यवस्था से बाहर हैं। इसलिए यह तर्क कि नया कृषि कानून किसान को बेहतर विकल्प मुहैया कराता है, जैसा कि पहले नहीं था, खामियों भरा तर्क है और आंकड़े इसे खारिज कर देते हैं। असल में नया कृषि कानून अपनी सारी खामियों के साथ यथास्थिति को बनाए रखने वाला है।

मैं किसानों को बेहतर विकल्प उपलब्ध कराने का समर्थन करता हूं (हर किसी को हर वक्त मूर्ख बनाना, जनसत्ता, 27 सितंबर, 2020)। आखिरकार, मेरा यह भी मानना है कि एपीएमसी को खत्म किया जाना जरूरी है, क्योंकि ये व्यापार संबंधी प्रतिबंध हैं, हालांकि किसानों के एक वर्ग को सुरक्षा जाल मुहैया कराने में इन्होंने बड़ा अच्छा काम किया है। इसका कारण यह है कि एपीएमसी पूर्णरूप से उचित बाजार नहीं है और इससे सभी किसानों का काम नहीं चलता, साथ ही वह बहुत ज्यादा किराया भी वसूलता है और कुछ मामलों में तो यह पूरी तरह से व्यापारियों और बिचौलियों के नियंत्रण में है।

लेकिन एपीएमसी को धीरे-धीरे खत्म किए जाने के पहले किसानों को उपयुक्त विकल्प उपलब्ध कराना जरूरी है। यह विकल्प सिर्फ हजारों बड़े गांवों और छोटे कस्बों में मौजूद बहु वैकल्पिक बाजार ही हो सकते हैं, जिन तक किसानों की आसानी से पहुंच हो सकती है और वस्तुओं के वजन और दाम पर राज्य सरकारों का कम ही नियंत्रण होता है।

किसान इन वैकल्पिक बाजारों तक पहुंच सकते हैं और फसल बेच सकते हैं, खरीद एजेंसियां और निजी व्यापारी किसानों से उपज खरीद सकते हैं, लेकिन दाम अधिसूचित न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से कम नहीं होने चाहिए। इस प्रकार किसानों का बड़ा हिस्सा एमएसपी पर उपज बेच सकेगा या उसे अपनी उपज का बेहतर मूल्य मिल सकेगा, जो अभी नहीं है। झूठ बोल कर डराया जा रहा है कि अगर एमएसपी की कानूनी गारंटी है तो इसके तहत इसका उल्लंघन करने वाले व्यापारियों का पता लगा कर उन पर मुकदमा चलाया जाएगा और जेल भेजा जाएगा। यह बकवास है। कानूनी गारंटी किसान बाजारों की सीमा में होने वाली बिक्री और खरीद पर ही लागू होगी।

मोदी सरकार के नए नियम वैकल्पिक किसान बाजारों का सृजन नहीं करते। इसके उलट, निजी प्रबंधों को सुनिश्चित करने के लिए कारपोरेट सहित निजी व्यापारियों को इजाजत देकर और विवादों के समाधान की प्रक्रिया को और पेचीदा तथा नौकरशाही के हवाले करते हुए सरकार ने किसानों के लिए और मुश्किलें पैदा कर दी हैं। इसके अलावा, अगर एपीएमसी के बाहर एक बार निजी अनियंत्रित कारोबारी को वैधता प्रदान कर दी गई तो व्यापारियों के लिए अपने को एपीएमसी से अलग करने के लिए यह एक शक्तिशाली प्रोत्साहन होगा।

राज्यों को बनाने दें कानून
फसलों की पैदावार, बाजार योग्य अधिशेष और व्यापारियों के व्यवहार को लेकर हर राज्य अपने में अनूठा है। कृषि उपज के कारोबार से संबंधित कानून राज्यों को बनाने दिए जाएं। पंजाब मॉडल हो सकता है और बिहार को भी मॉडल बना सकते हैं।

राज्य सरकारें, किसान और राज्य के लोगों को तय करने दें कि उनके राज्य के लिए सबसे बेहतर क्या हो सकता है। यही सही मायनों में सच्चा संघवाद होगा। इस पर संसद में बने कानून, जो कि यकीनन संविधान की राज्य सूची में आते हैं, को हर राज्य में कैसे लागू किया जा सकता है, इस पर हमेशा से संदेह रहा है।

जिस फुर्ती से संसद में अध्यादेश लाए गए और फिर बिना किसी उचित बहस या परामर्श के कानून बना कर उन्हें लागू कर दिया गया, और जिस पर कोई मत विभाजन भी नहीं कराया गया, जिसकी कि मांग की गई थी, उसकी गहराई से जांच की जरूरत है। इन विवादस्पद कानूनों को लागू करने की सरकार की सही मंशा भी संदेह के घेरे में है।

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