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खोया हुआ स्वर्ग फिर हासिल होगा

हमारे निकटतम पड़ोसी श्रीलंका के लिए इससे अच्छा समय और नहीं हो सकता, जहां सब कुछ खुशनुमा लग रहा है।

Author पी चिदंबरम | Published on: October 25, 2015 11:03 AM

हमारे निकटतम पड़ोसी श्रीलंका के लिए इससे अच्छा समय और नहीं हो सकता, जहां सब कुछ खुशनुमा लग रहा है। 1947 से पहले, हमारे लिए पड़ोसी देश का मतलब श्रीलंका से होता था, और कुछ दूर बर्मा से। पाकिस्तान और बांग्लादेश बाद में पड़ोसी बने। भूटान से हमारा मामूली संपर्क था, जवाहरलाल नेहरू की उस प्रसिद्ध भूटान यात्रा से पहले, जिसमें वे टट्टू पर सवार होकर कई दिन घूमे थे। नेपाल दुनिया से उदासीन राजतंत्र था।
श्रीलंका से खास जुड़ाव
हमारा श्रीलंका से हमेशा खास जुड़ाव रहा है। श्रीलंका की तमिलभाषी जनता के साथ तमिलनाडु के लोगों के घनिष्ठ पारिवारिक और कारोबारी संबंध रहे हैं। इससे वहां एक समय व्यापार खूब फला-फूला; हिंदू और मुसलिम, दोनों समुदायों के व्यापारियों ने कोलंबो में बंदरगाह के निकट दुकानें खोलीं। सड़कों पर उसके निशान अब भी दिखते हैं।
श्रीलंका के उत्तर और उत्तर पूर्वी क्षेत्र में तमिल आबादी रहती है। फिर, हजारों तमिल चाय बागानों में काम करते हैं। जाफना के सुशिक्षित, सुसंस्कृत तमिल श्रीलंकाई समाज के स्तंभ समझे जाते थे, खासकर कोलंबो में।
इस देश पर पहले पुर्तगालियों ने, फिर डच लोगों ने, फिर अंग्रेजों ने कब्जा किया। अंग्रेज इसे स्वर्णद्वीप या स्वर्ग कहते थे। पहले के औपनिवेशिक हुक्मरानों की बनिस्बत अंग्रेज कुछ हद तक उदार थे और उन्होंने रेलवे, डाकघर, स्थायी नागरिक सेवा और न्यायिक व्यवस्था की शुरुआत की।
श्रीलंका 1948 में स्वाधीन हुआ। प्रथम प्रधानमंत्री डीएस सेनानायके बुद्धिमान और दूरदर्शी नेता थे। कहा जाता है कि प्रधानमंत्री रहते हुए वे कभी विदेश यात्रा पर नहीं गए। उनके पुत्र डुडले सेनानायके उनके उत्तराधिकारी बने। दोनों ने इस बात के लिए अगाध प्रयास किए कि श्रीलंका बहुलतावादी समाज बने, जहां सभी नागरिक बराबर हों। सभी धर्मों का समान आदर किया जाए। सिंहला. तमिल और अंग्रेजी, ये तीन आधिकारिक भाषाएं घोषित की गर्इं, और साइनबोर्ड तथा नामपट््ट समेत सभी आधिकारिक कामकाज और कारोबार इन तीन भाषाओं में होते रहे हैं।
तीन दशक बेकार गए
संकुचित दृष्टि वाले राजनीतिकों ने बर्बादी को न्योता दिया। ‘केवल सिंहला’ नीति ने इसकी शुरुआत की। फूटपरस्ती की आग क्या भड़की, फिर अनेक तत्त्वों ने इसकी लपटों को हवा दी। इस आग में श्रीलंका लगभग तीस वर्षों तक झुलसता रहा।
यहां इतिहास में जाने की कोई जरूरत नहीं है, खासकर हाल के इतिहास में। आंतरिक टकराव का क्रूर और रक्तरंजित अंत हुआ। मानव अधिकारों और अंतरराष्ट्रीय नियम-कायदों का बेतहाशा उल्लंघन हुआ। ऐसे बहुत-से मामलों की शिनाख्त हो चुकी है, पर बहुत-से मामलों की बाकी है।
महिंदा राजपक्षे ने सोचा था कि वे हमेशा ऐसे राष्ट्रपति के रूप में याद किए जाएंगे जिसने ‘लिबरेशन टाइगर्स आॅफ तमिल ईलम’ (लिट््टे) को नेस्तनाबूद कर दिया- और दोबारा चुन लिए जाएंगे। लेकिन वे गलत साबित हुए।
जाफना और त्रिंकोमाली प्रांतों में लोगों ने मुख्यमंत्रियों के रूप में उदार तमिल नेताओं को चुना; और अप्रत्याशित यह कि प्राय: चर्चा से दूर रहने वाले, महिंदा राजपक्षे के एक पूर्व मंत्री को नया राष्ट्रपति चुन लिया गया और एक अनुभवी राजनेता ने प्रधानमंत्री पद की जिम्मेदारी संभाली। नए राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरीसेना अपनी विनम्रता और ईमानदारी के लिए जाने जाते हैं। रानिल विक्रमसिंघे पहले दो बार प्रधानमंत्री रह चुके हैं और जिम्मेदारी उठाने में सक्षम तथा सूझ-बूझ वाले शख्स माने जाते हैं। यह नई बात है कि राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री दो भिन्न पार्टियों (एसएलएफपी और यूएनपी) के हैं, जिन्होंने पिछला चुनाव एक दूसरे के खिलाफ लड़ा था।
खुशनुमा तस्वीर
किसी ने यह सोचा भी नहीं होगा कि 2015 में श्रीलंका में ये तीन महत्त्वपूर्ण घटनाएं घटित होंगी: एक, कि एसएलएफपी और यूएनपी मिल कर एक महा साझा सरकार बनाएंगी, इसके बावजूद कि एसएलएफपी के एक हिस्से को यह रास नहीं आएगा। दो, कि टकराव का निर्णायक अंत हो जाएगा, अंगारे पूरी तरह बुझ जाएंगे, और तमिल लोग, जिन्होंने सबसे ज्यादा तकलीफें झेलीं, एकीकृत श्रीलंका में ही समान नागरिक के तौर पर अपना भविष्य तलाशेंगे। तीन, कि दो पूर्ण रूप से वैध प्रांतीय सरकारों के मुखिया के तौर पर तमिल आबादी उदारवादी नेताओं को चुनेगी।
श्रीलंका के निकटतम पड़ोसी के तौर पर भारत को क्या करना चाहिए?
शुक्र है कि जो योजनाएं यूपीए सरकार के समय बनीं और शुरू की गर्इं, उन्हें राजग सरकार ने जारी रखा है। इनमें पचास हजार घरों के निर्माण की महत्त्वाकांक्षी योजना भी शामिल है। यह काबिले-तारीफ है कि सरकार ने वहां उच्चायोग और वाणिज्य दूतावास में उसी टीम को बनाए रखा है। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद की पिछली बैठक में स्वीकार किए गए प्रस्ताव को भारत के समर्थन की व्यापक सराहना हुई थी। भारत को इस पर कायम रहना चाहिए।
*आवास-निर्माण भारत का महत्त्वाकांक्षी कार्यक्रम है। विस्थापितों के लिए और चाय बागान के उन कामगारों के लिए भी, जो दशकों से गृहयुद्ध से प्रभावित रहे हैं, भारत को और भी ज्यादा घरों के निर्माण की पेशकश करनी चाहिए।
*उत्तरी और पूर्वी, दोनों प्रांतों की सरकारों के सामने भारत को परियोजनाओं के प्रस्ताव रखने चाहिए और उन्हें इस बात के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए कि वे साझा लक्ष्यों के लिए भी काम करें।
*भारत को यह पेशकश करनी चाहिए कि वह नए संविधान के निर्माण में- जो कि नई सरकार का वादा है- तकनीकी मदद कर सकता है, अगर इसकी जरूरत महसूस की जाए।
*भारत-श्रीलंका समझौते और खासकर प्रांतीय सरकारों को अधिकारों के हस्तांतरण के क्रियान्वयन में भारत को अपने नैतिक अधिकार का उपयोग करना चाहिए।
*भारत को श्रीलंका की सरकार और वहां की संसद को इस बात के लिए प्रेरित करना चाहिए कि वे संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के प्रस्ताव पर अमल का रास्ता निकालें।
*इस सब से भी अहम बात यह है कि भारत को श्रीलंका से घनिष्ठ संपर्क बनाए रखना चाहिए। मई 2014 के बाद कोई मंत्री वहां नहीं गया, केवल प्रधानमंत्री गए! यूपीए सरकार के समय भी इसी तरह की ढिलाई थी। प्रधानमंत्री को हर महीने किसी न किसी मंत्री को श्रीलंका भेजना चाहिए, इस सख्त निर्देश के साथ कि वे भ्रमण करें, सबकी बात सुनें और रिपोर्ट दें (और कोई ऐसी बात न कहें जो बेवक्त या बेतुकी हो)।

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