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दूसरी नजर: उन्हें चुप्पी तोड़नी होगी

एक ऐसी दुनिया में, जो दूसरे महायुद्ध के बाद लगातार समृद्ध हुई है, गरीब होना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। एक गरीब देश में गरीब होना लोकतंत्र की विफलता है। एक गरीब देश या राज्य में गरीब होना राजनीतिक अभिशाप है।

narendra Modi, Rahul Gandhi, Bihar Assembly Elections 2020, china, india, congress, BJP,Bihar Assembly Elections 2020: कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशान साधा है। (file)

एक ऐसी दुनिया में, जो दूसरे महायुद्ध के बाद लगातार समृद्ध हुई है, गरीब होना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। एक गरीब देश में गरीब होना लोकतंत्र की विफलता है। एक गरीब देश या राज्य में गरीब होना राजनीतिक अभिशाप है। बिहार के औसत नागरिक दुर्भाग्य, लोकतंत्र की विफलता और राजनीतिक अभिशाप के शिकार हैं। अब वहां की जनता के पास एक बेहतर भविष्य बनाने का मौका है, क्योंकि इस महीने से वहां चुनाव शुरू हो रहे हैं। उसके सामने एनडीए (जदयू, भाजपा और एचएएम), महागठबंधन (एलजेडी, कांग्रेस, भाकपा, भाकपा (एम), भाकपा (माले) और लोजपा (पासवान) तथा अन्य छोटी पार्टियों का गठबंधन विकल्प के रूप में मौजूद हैं।

बिहार की गरीबी

कितना गरीब है बिहार? कुछ अनुमापकों पर ध्यान दें। मौजूदा कीमतों में 2019-20 के दौरान भारत की प्रति व्यक्ति कुल आमदनी 1,34,226 रुपए थी, मगर बिहार में यह महज 46,664 रुपए थी- तब यह अखिल भारतीय स्तर पर करीब एक तिहाई और सभी राज्यों के स्तर पर सबसे कम थी। औसत मासिक आय के स्तर पर 3,888 रुपए कमाने वाले औसत बिहारी इतने में न तो पर्याप्त भोजन और वस्त्र जुटा पाते थे और न इज्जत से रहने लायक घर था उसके पास। (भारत में उच्चतम असमानता के पैमाने पर देखें तो औसत से कम आमदनी वालों में बिहारियों का अनुपात सबसे अधिक है।)

वहां किसानों की स्थिति सबसे खराब है। बिहार में उसके कुल प्रस्तावित खर्च का 3.5 प्रतिशत किसानी के लिए आबंटित किया गया है, जबकि सभी राज्यों में यह औसत 7.2 प्रतिशत है। इस तरह यह पूरे देश में सबसे कम है। 42.5 प्रतिशत किसान परिवार कर्ज में डूबे हुए हैं। अगर सीमांत किसानों की संख्या भी इसमें जोड़ लें तो यह संख्या 86.7 प्रतिशत तक पहुंच जाती है। बिहार सरकार ने एएमपीसी कानून को निरस्त कर दिया था और फसल बीमा योजना (पीएमएफबीवाई) अपना ली थी।

फरवरी 2019 में (कोविड से पहले) बेरोजगारी की दर करीब दस फीसद थी, अब युवाओं में यह 55 प्रतिशत तक पहुंच गई है। जिनके पास रोजगार है भी, उनमें से 87 प्रतिशत नियमित और वेतन वाले कामों में नहीं लगे हैं। वहां दो करोड़ परिवारों ने मनरेगा में पंजीकृत कराया था, पर उनमें से केवल 36.5 प्रतिशत को ही काम मिल पाया।

विरासत में मिला धोखा

आजादी के वक्त राज्य में मजबूत प्रशासनिक ढांचा था, ईमानदार तथा तरक्कीपसंद नेता थे और नौकरशाहों का एक फौलादी ढांचा था। गंगा बिहार से होकर बहती है और इसकी वजह से उस वक्त दक्षिण बिहार देश का सबसे ऊपजाऊ इलाका माना जाता था। बिहार की एक सांकेतिक उपलब्धि यह भी थी कि वहां सबसे पहले भूमि सुधार हो गए थे, जमींदारी प्रथा को समाप्त कर दिया गया था और भूमिहीनों को भूमि का आबंटन किया गया था (इस मामले में जम्मू-कश्मीर ही उसका प्रतिद्वंद्वी था)। मिशनरियों ने वहां अच्छी शिक्षा के बीज रोपे थे। वहां, लगभग सभी, बहुत परिश्रमी और लचकदार श्रमिक बल था। (यहां तक कि आज भी विनिर्माण और फसलों की कटाई के मामले में प्रवासी पुरुष बिहारी मजदूरों की ही सबसे अधिक मांग रहती हैं।)
मगर पिछले तीस सालों में यह सब कुछ बड़े नाटकीय ढंग से बदल चुका है।

इनमें से पंद्रह साल बिहार नीतीश कुमार के हाथों में रहा है (इनमें से खुद को दंडित करने के लिए 278 दिन उन्होंने स्वत: अवकाश लिया था)। वहां सारी बीमारियों की जड़ निहायत खराब कानून-व्यवस्था है। 2011-12 और 2018-19 में बिहार का जीडीपी औसत 6.6 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा था, जबकि पूरे भारत का औसत 7.73 प्रतिशत था। 2005 से 2019 के बीच वहां का सार्वजनिक कर्ज 43,183 करोड़ रुपए से बढ़ कर 161,980 रुपए हो गया था। सीएजी की एक रिपोर्ट के मुताबिक ली गई उधारी का करीब पचासी प्रतिशत पैसा ब्याज और मूलधन चुकाने में गया। अब थोड़े से संसाधनों, थोड़ी उधार ली गई पूंजी और खंडहर हो चुके प्रशासनिक ढांचे के बीच वहां बहुत कम पूंजी खर्च और बहुत कम नई नियमित नौकरियां उपलब्ध हो पाती हैं।

इसी का नतीजा है कि वहां गरीबी बढ़ रही है। नीति आयोग की जांच रपटों के मुताबिक अब राज्य में बेरोजगारी की दर बढ़ कर पचपन फीसद तक पहुंच चुकी है (2018-19)। तो फिर गरीब बिहारी क्या करे? वह दूसरे राज्यों में पलायन करता है, प्राय: अपने परिवार के साथ। उनमें से कोई भी उस त्रासदी को नहीं भूल पाया है, जब 24 मार्च, 2020 को अचानक पूर्णबंदी लागू कर दी गई तो लाखों मजदूरों को बेघरी और भुखमरी से बचने के लिए बिहार के अपने गांव-घर लौटने के लिए सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलना पड़ा था। उनकी एक ही आर्त पुकार थी कि ‘अगर हमारी किस्मत में मौत ही बदा है, तो हमें अपने संबंधियों और घरवालों के बीच मरने दो।’

अक्षमता अस्वीकार

अब तो यह अच्छी तरह स्पष्ट है कि बिहार की जनता या तो नीतीश कुमार के पक्ष में वोट डालेगी या उनके विरोध में। नीतीश कुमार जेपी आंदोलन से निकले समाजवादी रुझान वाले नेता रहे हैं। माना जाता रहा है कि वे पूरी तरह सेक्युलर मिजाज के आदमी हैं और उन्होंने नरेंद्र मोदी के उभार को रोकने के लिए खुल कर विरोध किया था। जब वे पहली बार मुख्यमंत्री बने, तो लगा कि वे कानून-व्यवस्था को पटरी पर लाने वाले हैं और विकास के प्रति पूरी तरह समर्पित हैं।

मगर जुलाई 2017 में सब कुछ बदल गया, जब उन्होंने नरेंद्र मोदी का विरोध छोड़ दिया, राजद के साथ मिल कर बनाई गठबंधन सरकार भंग कर दी और भाजपा से हाथ मिला कर मुख्यमंत्री पद पर बने रहे, इस वक्त वे एनडीए सरकार के सिरमौर हैं। उसके बाद से लगातार देखा गया कि वे खुद को अपने पद पर बनाए रखने के लिए जनता के साथ कम और श्रीमान मोदी के साथ अधिक खड़े नजर आते हैं। अगर उन्होंने बिहार को अर्थव्यवस्था की सीढ़ी पर कुछ पायदान ऊपर उठाया होता, तो शायद ये सब बातें क्षम्य भी होतीं। मगर देश के स्तर पर यह राज्य लुढ़कता ही गया है।

नीतीश कुमार कानून-व्यवस्था को लेकर कोई गर्वोक्ति नहीं कर सकते। 2005 से 2019 के बीच राज्य में संज्ञेय अपराधों की संख्या 157 फीसद की दर से बढ़ी हुई दर्ज की गई। हर दिन औसतन महिलाओं के खिलाफ इक्यावन, दलितों के खिलाफ अठारह अपराध दर्ज होते हैं और हर रोज चार मामले बलात्कार के होते हैं।

गरीबी और बढ़ते अपराध ने बिहार की जनता को मूक बना दिया है। उन्हें खुद चुप्पी तोड़नी होगी और अगर सरकार सक्षम और सम्मानजनक व्यवस्था देने में अक्षम साबित हुई है तो अपने मताधिकार से उसे बदल कर किसी दूसरे दल या गठबंधन को यह जिम्मेदारी सौंपनी होगी। वोट के जरिए नकार देने का भय मतदाता की सबसे बड़ी ताकत होती है। इसका समय शुरू होता है 2020 से।

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