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दूसरी नजरः चुनावी साल में बड़ा सवाल

महीनों से आंकड़ों के ऊपर-नीचे होने का सिलसिला जारी है। इसलिए तिमाही या छमाही के खत्म होने पर किसी भी नतीजे से पहुंचने से पहले अर्थशास्त्री और विश्लेषक हमेशा रुझान को देखते हैं।

Author September 16, 2018 3:39 AM
एनडीए सरकार के सत्ता में आने के ठीक बाद जून, 2014 में कच्चे तेल के दाम 109 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल थे।

महीनों से आंकड़ों के ऊपर-नीचे होने का सिलसिला जारी है। इसलिए तिमाही या छमाही के खत्म होने पर किसी भी नतीजे से पहुंचने से पहले अर्थशास्त्री और विश्लेषक हमेशा रुझान को देखते हैं। अगर मध्यावधि आंकड़ों पर नजर डालें तो लगता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था की वृहद आर्थिक स्थिरता की नींवें कमजोर पड़ने लगी हैं। यह रुझान बदल भी सकता है, और एक सजग व चिंतित नागरिक होने के नाते मैं उम्मीद करता हूं कि ऐसा होगा। दरअसल, चिंता के जो कारण बने हुए हैं, उन पर हम गौर करते हैं। पहला कारण है कच्चे तेल की कीमतें। इसमें कोई संदेह नहीं कि शुरू के सालों में सरकार खजाना का भरता चला गया था। एनडीए सरकार के सत्ता में आने के ठीक बाद जून, 2014 में कच्चे तेल के दाम 109 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल थे।

जुलाई के बाद से इसमें गिरावट आनी शुरू हो गई और जनवरी 2015 तक तो ये 46.6 डॉलर प्रति बैरल तक आ गए थे। जनवरी 2015 से अक्तूबर 2017 तक (मई और जून 2015 को छोड़ कर) कच्चे तेल के दाम कभी भी 60 डॉलर के ऊपर नहीं गए थे। ये वाकई अविश्वसनीय रूप से सबसे कम दाम थे। यह अकेला ऐसा बड़ा कारण था जिसने वृहद आर्थिक संकेतकों को दुरुस्त करने में भूमिका निभाई थी। ऐसे में कच्चे तेल के दाम में गिरावट के साथ अगर पेट्रोल, डीजल और एलपीजी के दाम भी घटाए जाते तो उपभोक्ताओं को निश्चित रूप से इसका फायदा मिलता। पर सरकार ने ऐसा कुछ नहीं किया, बल्कि पेट्रोलियम पदार्थों पर कर बढ़ा कर घरेलू उपभोक्ताओं और कारोबारियों को कम दाम से होने वाले लाभों से वंचित कर दिया। इसका नतीजा यह हुआ है कि सरकार का राजस्व तेल पर निर्भर हो चुका है और राजस्व जुटाने के आसान तरीके अपनाने की सरकार की कोई इच्छा नजर नहीं आ रही। पेट्रोल, डीजल और एलपीजी के रोजाना बढ़ते दामों को लेकर लोगों में गुस्सा बढ़ता जा रहा है।

वित्तीय योजना का अभाव

मेरे अनुमान के अनुसार (जो मैंने 14 जनवरी, 2016 को इंडियन एक्सप्रेस में लिखा था) बारह महीने (दिसंबर 2014 से नवंबर 2015) के दौरान खर्च बचत और अतिरिक्त राजस्व मिला कर सरकार को एक लाख चालीस हजार करोड़ का भारी-भरकम खजाना मिला था। इसके बाद आगामी दो सालों (2016 और 2017) में भी खजाना इसी तरह भरता रहता। लेकिन सरकार कोई भी ठोस वित्तीय योजना नहीं बना पाई। एनडीए सरकार के चार साल में वित्तीय घाटा 4.1, 3.9, 3.5 और 3.5 फीसद रहा और 2018-19 में यह 3.3 फीसद रहने का अनुमान है। मेरा मानना है कि 3.3 फीसद का अनुमान इस पूर्वानुमान पर आधारित है कि कच्चे तेल के दाम 70 डॉलर से नीचे रहेंगे। लेकिन ऐसा लगता नहीं है और ब्रेंट के दाम अस्सी डॉलर के करीब है। इसलिए तनाव का पहला कारण वित्तीय घाटा है।

दूसरा कारण यह कि, हर महीने निर्यात आयात से भी कम होता जा रहा है। इससे व्यापार खाते का घाटा बढ़ रहा है, जो कि गैर-मामूली नहीं है। हालांकि निर्यात की दर, आयात दर से काफी कम है, पर इसे सुधारा जा सकता था। लेकिन इसके लिए कोई भी उचित कदम नहीं उठाया गया। कारोबारी निर्यात पिछले चार साल से 310 अरब डॉलर से नीचे बना हुआ है। इसका कुल मिला कर असर यह हुआ है कि चालू खाते का घाटा बढ़ता ही चला गया। 2017-18 में 1.87 फीसद था, जो 2018-19 के अंत तक ढाई से तीन फीसद तक हो जाएगा। चिंता का यह दूसरा कारण है।

तीसरा यह कि उभरते बाजारों से आने वाले कारोबारी भी मुंह फेर चुके हैं और वैश्विक निवेशक अपने पोर्टफोलियो पर फिर से विचार करते दिख रहे हैं। अमेरिका में ब्याज दरें मजबूत हो रही हैं, विदेशी निवेशक पैसा निकाल रहे हैं, और इसका नतीजा यह हो रहा है कि भारत से विदेशी निवेशक जा रहे हैं। इस साल विदेशी निवेशक इक्विटी, डेट और हाइब्रिड फंड सहित 47891 करोड़ रुपए निकाल चुके हैं। हालांकि यह कहना जल्दबाजी होगी, लेकिन संभावना है कि 2008-09 (जो वैश्विक मंदी का वक्त था) के बाद विदेशी निवेशकों द्वारा 2018-19 में सबसे ज्यादा पैसा निकाला जाएगा।

रुपए में गिरावट

चौथा कारण यह कि इन वजहों से रुपया लगातार कमजोर पड़ता जा रहा है। इस साल डॉलर के मुकाबले रुपए के परिवर्तनीय मूल्य में 12.65 फीसद तक की गिरावट आ चुकी है। चार दिन पहले सरकार ने बयान जारी कर कहा है कि ‘रुपया और नीचे न चला जाए, यह सुनिश्चित करने के लिए सरकार और आरबीआइ हरसंभव कदम उठाएगा।’ ऐसे आश्वासनों से निवेशकों और विश्लेषकों का भरोसा टूटता है, न कि उनमें कोई उम्मीद बंधती है। निवेशक और विश्लेषक एफडी, चालू खाते का घाटा, बांड मूल्य निवेश पर प्राप्ति जैसे आंकड़ों पर नजरें गढ़ाए रखते हैं। ‘सुनिश्चित करने के लिए सब कुछ करेंगे…’ ऐसे भरोसे के बावजूद आरबीआइ सिर्फ यही कर सकता है कि डॉलर बेचना शुरू कर दे, ताकि रुपए के अवमूल्यन रोका जा सके। लेकिन इस तरह के दखल की उसकी भी अपनी सीमाएं हैं।

पिछले एक साल में, दस साल की अवधि वाले सरकारी बांड पर प्राप्ति 1.5 फीसद बढ़ी है। जैसा कि मैंने लिखता हूं, प्राप्ति 8.13 फीसद तक पहुंच चुकी है। यह दर भारत में निवेश के जोखिम का संकेत देती है। अगर रुपए की गिरावट को भी इसमें शामिल कर लिया जाए, तो यह दर बताती है कि देश में वृहद-आर्थिक स्थिरता को लेकर बाजारों में चिंता का आलम है।

ध्यान देना जरूरी

आखिरी शब्द अक्तूबर में आने वाली आरबीआइ की मौद्रिक नीति में सुनने को मिल सकता है। अगर आरबीआइ फिर से रेपो रेट बढ़ाता है तो इसका साफ मतलब यही होगा कि आरबीआइ भी वृहद आर्थिक स्थिरता को लेकर परेशान तो है। ऊपर बताए कारणों में अप्रत्याशित कुछ भी नहीं है। 1997, 2008 और 2013 में हालांकि दूसरी वजहों से हम ऐसे हालात का सामना कर चुके हैं। ऐसी विकट परिस्थिति में सेंसेक्स का थोड़ा-सा ऊपर चले जाना, या एक दिन में बांड पर प्राप्ति में कमी आ जाना, आइआइपी में ‘मंदी’, या सीपीआइ (उपभोक्ता मूल्य सूचकांक) में हल्की-सी गिरावट से खुश नहीं होना चाहिए। आंकड़ों का गिरना-चढ़ना तो खेल है जिसका जिक्र मैं पहले ही कर चुका हूं। बजाय इसके सरकार को निवेश बढ़ाने, बैंक कर्ज बढ़ाने (खासतौर से उद्योगों को) और खर्च पर सख्त नियंत्रण रखने पर ध्यान देना चाहिए। क्या यह बड़ा सवाल नहीं है?

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