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पी. चिदंबरम का कॉलम दूसरी नज़र : आहत मन की स्वीकारोक्ति

आखिरकार सच्चाई सामने आ ही गई। केंद्र सरकार की दशा पर लिखी टिप्पणी के साथ मैंने यह स्तंभ जनवरी 2015 में शुरू किया था। लेकिन साल के अंत में मूल्यांकन की जहमत मुझे नहीं उठानी पड़ रही है..

Author नई दिल्ली | Updated: December 27, 2015 8:47 AM
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। (पीटीआई फाइल फोटो)

आखिरकार सच्चाई सामने आ ही गई। केंद्र सरकार की दशा पर लिखी टिप्पणी के साथ मैंने यह स्तंभ जनवरी 2015 में शुरू किया था। लेकिन साल के अंत में मूल्यांकन की जहमत मुझे नहीं उठानी पड़ रही है। यह काम वित्त मंत्रालय के एक महकमे ने बड़े सराहनीय ढंग से कर दिया है। शुक्र है कि हमने उन्हें सालाना आर्थिक समीक्षा और छमाही आर्थिक समीक्षा पेश करने की स्वायत्तता और आजादी दे रखी है।

पिछले हफ्ते पेश की गई वर्ष 2015-16 की मध्यावधि समीक्षा में बहुत सारे ऐसे कबूलनामे हैं जो नरेंद्र मोदी सरकार के काम के बारे में तमाम विद्वत्तापूर्ण टिप्पणियों के मुकाबले कहीं बेहतर ढंग से बताते हैं। कुछ कबूलनामे इस प्रकार हैं:

यूपीए के दौरान की बुलंदी:

‘‘हमने इस विश्लेषण में तीन दौर को लिया है: तेजी के साल, 2004-05 से 2011-12; 2014-15; और 2015-16 की पहली छमाही। पिछले साल से तुलना करने पर इस साल की खास बात यह मालूम होती है कि अभी भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती का आधार निजी खपत और सरकारी निवेश है। यह जीडीपी में उछाल के उन वर्षों से विपरीत स्थिति है, जब मांग के सभी चार घटक अर्थव्यवस्था को ताकत दे रहे थे।’’

यह स्वीकार किया गया है कि निजी निवेश और निर्यात में हम बुरी तरह पिछड़ रहे हैं। यह कार के दो पहियों पर दौड़ने जैसी हालत है।

इसी सिलसिले में एक और स्वीकारोक्ति है: ‘‘तेजी के सालों में निर्यात ने मांग में 1.9 फीसद का इजाफा किया था, जबकि 2015-16 में निर्यात में गिरावट आई है (-1.1 फीसद की)। इसी तरह निजी निवेश में 3.2 फीसद की बढ़ोतरी हुई थी, जबकि मौजूदा साल में सिर्फ एक फीसद की बढ़ोतरी हुई है।’’

निजी क्षेत्र की चिंताजनक स्थिति:

निजी क्षेत्र की बहुत खस्ता हालत है, जबकि इस समय ऐसी सरकार है जिसकी छवि कारोबार-हितैषी की है और समझा जाता है कि उसे बड़ी पूंजी और बड़े व्यापारिक घरानों का समर्थन प्राप्त है। मध्यावधि समीक्षा स्वीकार करती है, ‘‘निजी निवेश कमजोर क्यों न होगा? कॉरपोरेट आय-व्यय बुरी तरह लड़खड़ाया हुआ है… ‘वेटेड एवरेज इंटरेस्ट कवर रेशियो’ सितंबर 2014 में 2.5 था, जो गिर कर सितंबर 2015 में 2.3 पर पहुंच गया।

ऋणग्रस्तता में बढ़ोतरी कंपनियों के वित्तीय प्रदर्शन (ईबीआईडीटीए) के अनुपात में ऋण में बढ़ोतरी को सूचित करती है, जो कि समान अवधि में 2.8 से 2.9 पर पहुंच गई। कर चुकाने के बाद कॉरपोरेट क्षेत्र का मुनाफा 2014 के मुकाबले 2015 में कुल मिलाकर फीका रहा। नतीजतन, पूंजीगत व्यय जीडीपी के 5.4 फीसद से 5.2 फीसद पर आ गया।’’

कई और भेद खोलने वाले संकेतक हैं। इस साल जनवरी से सितंबर के दरम्यान, पिछले साल की समान अवधि की तुलना में, कंपनियों की कुल बिक्री में 5.3 फीसद की गिरावट आई। मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र की हालत ज्यादा खराब है, जिसकी कुल बिक्री में बारह फीसद की कमी दर्ज हुई है। गैर-खाद्य ऋण की गति 8.3 फीसद है, जो कि बीस सालों में सबसे धीमी रफ्तार है। औद्योगिक ऋण की वृद्धि दर 4.6 फीसद है, जबकि मझोले उद्यमों को मिलने वाले कर्ज में 9.1 फीसद की सिकुड़न आई है।

ग्रामीण दुर्दशा के कारण:

मध्यावधि समीक्षा स्वीकार करती है, ‘‘ग्रामीण मेहनताने में इजाफा और न्यूनतम समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी- जो कि कीमतें चढ़ने के अहम कारक हैं- ठहराव के शिकार हैं।’’ दोनों को सरकार के सोच-विचार और नीतिगत निर्णयों से बाहर कर दिया गया है। फिर, कमजोर मानसून ने किसानों की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं। जैसा कि विश्लेषण इंगित करता है, ‘‘रबी सीजन के ताजा आंकड़े बताते हैं कि पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले इस बार बुआई का रकबा घटा है; लगातार चार सीजन से कम बारिश के चलते उत्पादकता पर पड़े संभावित प्रतिकूल प्रभाव को जोड़ कर देखें तो इस वित्तवर्ष में कृषि पैदावार में गिरावट का अंदेशा और बढ़ जाता है।’’ फिर इसे किसानों की आत्महत्या की घटनाओं से जोड़ कर देखें। यह स्थिति कृषि क्षेत्र के लिए एक सुसंगत नीति के अभाव की देन है, जो बताती है कि ग्रामीण भारत में क्यों इतनी पीड़ा और नाराजगी है।

रोजगार के वादे का क्या हुआ: 

ज्यादातर लोगों और परिवारों के मन में सबसे प्रमुख सवाल यही है कि रोजगार कहां हैं। इस साल अप्रैल से जून के बीच हुआ छब्बीसवीं तिमाही रोजगार सर्वे बताता है कि मैन्युफैक्चरिंग और निर्यात-उन्मुख क्षेत्रों में रोजगार-सृजन का आंकड़ा, पिछली तिमाही की तुलना में, तैंतालीस हजार कम हो गया। छह सालों में यह सबसे बुरा प्रदर्शन है। पिछले साल की उसी तिमाही में इन क्षेत्रों में रोजगार-सृजन का आंकड़ा एक लाख बयासी हजार था। मध्यावधि समीक्षा रोजगार-सृजन के मसले पर खामोश है। यह खामोशी ही सच्चाई की स्वीकारोक्ति है।

राजकोषीय घाटे से जुड़ी चुनौती:

सबसे परेशान करने वाली स्वीकारोक्ति यह है कि ‘‘बजट में जताए गए अनुमान के बरक्स जीडीपी में कमी राजकोषीय घाटे को जीडीपी के 3.9 फीसद तक लाने के लक्ष्य को बहुत मुश्किल बना देगी। उम्मीद से धीमी जीडीपी वृद्धि दर (8.2 फीसद बनाम बजट में अनुमानित 11.5 फीसद) अपने आप में लक्ष्य को 0.2 फीसद और और ऊपर कर देगी।’’

इसके बावजूद मुझे उम्मीद है कि सरकार इस साल 3.9 फीसद के लक्ष्य को पा लेगी, पर अगले वित्तवर्ष में क्या होगा? एक बुरी स्थिति आने का अंदेशा मंडरा रहा है: ‘‘अगर सरकार राजकोषीय मजबूती की ही फिक्र में रहेगी, तो मांग में कमी आ सकती है। इन धारणाओं के चलते, वृद्धि दर को गति तभी मिलेगी जब आपूर्ति के मोर्चे पर सुधार हो। संभावित मांग के विश्लेषण पर आधारित अगले साल जीडीपी की वास्तविक वृद्धि इस साल की तुलना में कुछ खास होने की संभावना नहीं है।’’ जाहिर है, हमें चेता दिया गया है।

अच्छे दिन दूर हैं: 

चूंकि दूसरी तिमाही में जीडीपी वृद्धि दर केवल छह फीसद थी, 2015-16 में जीडीपी के 8.2 फीसद पर रहने की उम्मीद हवाई ही कही जाएगी। इस साल वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर सात से साढ़े सात फीसद के बीच रहने का अनुमान है, जो कि अब तक बांधी गई उम्मीदों से काफी कम है। समझदारी दिखाते हुए मध्यावधि समीक्षा ने 2016-17 की बाबत जीडीपी को लेकर कोई दावा नहीं किया है, और न इस बात की डींग हांकी है कि आठ फीसद से ऊपर की वृद्धि दर हासिल कर ली जाएगी!
अच्छे दिन की घंटियां खामोश हो गई हैं।

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