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पुस्तकायन : स्त्री मुक्ति का बिगुल

कर्मेंदु शिशिर भारतीय नवजागरण के ऐसे कई इलाके हैं, जिन पर हिंदी में काम नहीं हुए। ऐसे कई पक्ष और व्यक्तित्व हैं, जिन पर बेहतर तरीके से काम करने की जरूरत है। यह सुखद है कि पूर्वा भारद्वाज ने स्त्री नवजागरण की महान नेत्री पंडिता रमाबाई पर एकाग्र होकर काम किया। उनकी भय नाही खेद […]

कर्मेंदु शिशिर

भारतीय नवजागरण के ऐसे कई इलाके हैं, जिन पर हिंदी में काम नहीं हुए। ऐसे कई पक्ष और व्यक्तित्व हैं, जिन पर बेहतर तरीके से काम करने की जरूरत है। यह सुखद है कि पूर्वा भारद्वाज ने स्त्री नवजागरण की महान नेत्री पंडिता रमाबाई पर एकाग्र होकर काम किया। उनकी भय नाही खेद नाही पुस्तक पहली निगाह में ही अपनी मोहक प्रस्तुति से थोड़ी विस्मित करती है। परिशिष्ट में शामिल तस्वीरें, पत्रों और दस्तावेजों का दुर्लभ संग्रह पुस्तक को मूल्यवान और संग्रहणीय बना देता है।

पूर्वा अपनी लंबी अनुसंधान यात्रा के दौरान दुर्गम इलाकों में भटकी हैं। पंडिता रमाबाई की और उन पर लिखी हिंदी, मराठी, बांग्ला और अंगरेजी की तमाम पुस्तकों के अलावा उन्होंने उनसे संबंधित दस्तावेजों और पत्रों की भी गहरी छानबीन की है। वे उनसे जुड़ी जगहों और संस्थानों तक गई हैं और तत्कालीन पत्र-पत्रिकाओं से उत्खनन कर पक्ष-विपक्ष में छपी तमाम सामग्री को राई-रत्ती खंगाला है। बावजूद इसके, उनकी पुस्तक में संदर्भ और उद्धरण का एक भी उदाहरण नहीं है। यहां तक कि वे बौद्धिक विचार-विमर्श के प्रचलित प्रपंचों तक से भी परहेज कर गई हैं, जबकि इसकी जगह-जगह गुंजाइश थी। खासतौर से रमाबाई ने जब ईसाई धर्म स्वीकार किया तो इसकी बड़ी तीखी और व्यापक प्रतिक्रिया हुई। लेकिन वहां भी वे पूरी तरह निर्द्वंद्व, शांत, सहज और संतुष्ट नहीं रह पातीं। ईसाई धर्म की भी अपनी रूढ़ियां थीं, विभिन्न पंथों के अंतर्विरोध थे, वहां भी स्त्रियों के प्रति विभेद भरा संकीर्ण सोच था। वे अपनी आशंकाओं, आलोचनाओं और सवालों को लेकर सबसे उलझती रहीं, बावजूद उनको अपने निर्णय को लेकर खेद नहीं था।
रचनात्मक स्तर पर रमाबाई की आत्मकथात्मक शैली में पूरी जीवन-गाथा इस सूझ से लिखी गई है कि उनके संघर्ष के साथ वे सारे विचार-विमर्श भी शामिल हो जाते हैं।

शोध की भूमिका सिर्फ यथार्थ की तलाश, तथ्यों और घटनाओं की प्रामाणिकता तक सीमित है। जाहिर है, ऐसा करते हुए तत्कालीन समय-संदर्भों की अनदेखी नहीं की जा सकती। इसलिए लेखिका ने काल, परिवेश, घटना या चरित्रों की पृष्ठभूमि के लिए जरूरी अध्यायों के साथ संबंधित सामग्री भी अलग से टांक दी है। इससे वाकई पाठकीय सहूलियत बन जाती है। इस क्रम में सावित्री बाई, आनंदी बाई जोशी के साथ खुद रमाबाई के धर्मांतरण संबंधी पत्र अत्यंत दुर्लभ दस्तावेज ही हैं। ज्योतिबा फुले अकेले व्यक्ति थे, जिन्होंने रमाबाई के धर्मांतरण के समर्थन में लिखा। रख्मा बाई, जो अपने पति से अलगाव की कानूनी लड़ाई लड़ीं। ब्रह्म समाज, आर्य समाज या प्रार्थना समाज उस दौर की महत्त्वपूर्ण संस्थाएं थीं।

रमाबाई के जीवन में जैसी घटनाबहुलता और आकस्मिक संयोगों की बहुतायत है, उसमें लेखिका के लिए कल्पनात्मक उड़ान की पर्याप्त गुंजाइश थी। बावजूद इसके लेखिका ने ऐसा नहीं किया और बड़ी सावधानी से अंत तक संयम और संतुलन कायम रख कर भाषा की गति को सम पर ही बनाए रखा। अगर वे उपन्यास वाले मोह में पड़तीं तो हल्का विचलन भी पूरी जीवन-गाथा को संदिग्ध बना देती।

रमाबाई के जन्म से अंत तक की जीवन-गाथा को लेखिका ने दस भागों में रखा है। उसने शुरू से ही यह सतर्कता बनाए रखी है कि उनके जीवन से जुड़ी अफवाहें, गलतफहमियां या मत-मतांतर स्वत: साफ होते जाएं। अपनी ओर से कुछ न बोलना पड़े, बस उनके जीवन की मूल वास्तविकता यथातथ्य प्रस्तुत हो जाए। पिता की विद्वत्ता और निर्धनता के बीच भारी फांक थी, जो जीवन के अंत तक बनी रही। अनंत डोंगरे शास्त्री का पांडित्य उनकी धार्मिक रूढ़िप्रियता और स्त्री-शिक्षा का प्रगतिशील सोच हठीले द्वंद्व वाला था।

स्त्री-शिक्षा की मनाही को लेकर अनंत शास्त्री से शास्त्रार्थ में पराजित पंडित सभा अपनी मनमानी से बाज नहीं आई और उन्हें जंगल में झोपड़ी डाल कर रहना पड़ा। भूख और गरीबी के उस कठिन दौर में भी उन्होंने पत्नी और बेटी को पंडित बना कर ही दम लिया। अनंत शास्त्री की स्त्री-शिक्षा वाली प्रगतिशीलता भी उनको धार्मिक रूढ़ि से डिगा नहीं पाई और दान या भिक्षा में कुछ न लेने का हठ पूरे परिवार को जल-समाधि के निर्णय तक ले गया।
अनाथ रमाबाई और भाई श्रीनिवास किशोरवय में भी कोई निश्चित और स्थिर आश्रय की तलाश नहीं करते। आखिर कौन-सी तड़प थी, जो रमाबाई को भटकाती रही और वे भाई के साथ खाली हाथ उत्तर भारत के पहाड़ी इलाकों की ओर गर्इं। लेखिका ने बड़े करीने से उत्तराखंड में सप्तर्षियों वाली पहाड़ी के तैरने वाले प्रसंग में अदीठ पाखंड को खोला है।

बंगाल पहुंच कर रमाबाई बिल्कुल एक नई भूमिका में सामने आती हैं। उनमें स्त्री नवजागरण की नेत्री की पहली झलक दिखाई देती है। जीवन-प्रसंगों के इन अध्यायों में पाठक साफ महसूस करता है कि महाराष्ट्र की तुलना में बंगाल का नवजागरण ज्यादा खुला और विकसित था। यहां रमाबाई को स्त्री मुक्ति की ज्यादा संभावना दिखी। विद्वानों के बीच उनके पांडित्य की परीक्षा, ‘पंडिता’ की उपाधि, ब्रह्म समाज का साहचर्य, केशवचंद्र सेन के स्नेह-भाजन और जगह-जगह स्त्री-मुक्ति संबंधी उनका उद्बोधन।

फिर वे अपने प्रदेश महाराष्ट्र आ जाती हैं। पूना में प्रार्थना समाज से जुड़ाव और स्त्री शिक्षा संबंधी भावी योजनाओं को लेकर महाराष्ट्र के सुधारकों में गहरी उत्सुकता वे महसूस करती हैं। पक्ष-विपक्ष की प्रतिक्रिया के बीच हंटर कमीशन में स्त्री-शिक्षा संबंधी उनके उत्तर की बड़ी चर्चा रही। वे महाराष्ट्र में जगह-जगह भाषण देती और स्त्री-शिक्षा के प्रति जागरूकता पैदा करतीं। इसी दौरान वे पूना की ईसाई मिशनरी से जुड़ीं। उनके भीतर इंग्लैंड यात्रा और मेडिकल शिक्षा का विचार पनपा। विधवा और उस पर अकेले समुद्र पार यात्रा! यह हिंदू धर्म के प्रति सीधा विद्रोह था। इस बीच उन्होंने ‘स्त्री-धर्म-नीति’ पुस्तक लिखी, जिसकी बिक्री के पैसे इस यात्रा में बड़े काम आए।

इंग्लैंड आकर उनके ईसाई बनने और इस धर्म की जड़ताओं को लेकर हमेशा किसी न किसी से उलझने के सिलसिले में रमाबाई की स्वाधीन चेतना का विकास पाठक महसूस करता है। खासकर बेटी को लेकर सिस्टर से उनकी खींचतान वाला प्रसंग विशेष महत्त्वपूर्ण है। वे पढ़ाई के बीच ही अमेरिका गर्इं, तो उन्हें इंग्लैंड की ईसाई धर्म वाली संकीर्णता और चुभी। वैसे वहां भी स्त्रियों को सीमित आजादी है, काले लोगों के प्रति घृणा है। मनुष्य या जीव मात्र के प्रति ईसाई धर्म की समानता वाली बात पाखंड है।

अमेरिका में उनकी सक्रियता ने उनको बड़ी भूमिका में ला खड़ा किया और उन्होंने भारतीय स्त्रियों की मुक्ति के लिए कुछ ठोस करने का संकल्प लिया। ‘द हाई कास्ट हिंदू वुमन’ में उन्होंने स्त्रियों की दुर्दशा का जो चित्र खींचा उससे उन पर विदेश में भारत की छवि बिगाड़ने का आरोप लगा। बिना विचलित हुए उन्होंने रख्मा बाई के मामले में अपनी आवाज महारानी विक्टोरिया तक पहुंचाने की कोशिश की। उनके सवाल इतने तीखे थे कि भारत ही नहीं, ब्रिटेन में भी लोग तिलमिला उठे।

वे एक विद्रोही नेत्री बन गई थीं। अमेरिका से मिले पैसों से पहले बंबई और फिर पूना में उन्होंने ‘शारदा-सदन’ की स्थापना की और बेसहारा, विधवा और परित्यक्त स्त्रियों के लिए मुक्ति के द्वार खोले। अकाल में उनके राहत कार्य की दुश्मनों ने भी तारीफ की। जीवन भर संघर्ष करती वीरांगना का खुद का जीवन कितना दारुण था इसका अंदाजा 1921 में इनकी बिटिया मनोरमा की मौत से लगाया जा सकता है। 5 अप्रैल 1922 को उनका भी देहावसान हो गया।

पुस्तक समाप्त करते हुए पाठक स्त्री-मुक्ति के इस लंबे संघर्ष में एक वीरांगना के पराक्रम से ही नहीं, एक युग की तमाम हलचलों, अंतर्विरोधों और बदलावों से भी रूबरू होता है। लेखिका की सफलता इस बात में है कि उसने भारतीय नवजागरण की इस महान नेत्री के जीवन को इस तरह प्रस्तुत किया है कि उसके बनने, विकसित होने और एक क्रांतिकारी व्यक्तित्व में रूपांतरित होने की पूरी प्रक्रिया, परिवेश और समय प्रत्यक्ष सजीव हो उठता है।

भय नाही खेद नाही: पूर्वा भारद्वाज, दिप्ता भोग; निरंतर (जेंडर और शिक्षा का संदर्भ केंद्र), बी-64, दूसरी मंजिल, सर्वोदय इनक्लेव, नई दिल्ली; 400 रुपए।

 

 

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