डॉ. पतंजलि मिश्र
29 दिन, 148 विधानसभा क्षेत्र, हजारों किलोमीटर की यात्रा, दर्जनों प्रेस वार्ताएं और सैकड़ों स्वागत समारोह। लेकिन एक बड़ा सवाल लगातार खड़ा हो रहा है, क्या स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की गविष्ठि यात्रा वास्तव में गोरक्षा के लिए निकली है, या फिर यह व्यक्तिगत वैचारिक संघर्ष और आत्म प्रतिष्ठा की तुष्टि के अभियान में बदल चुकी है?
गोरक्षा से अधिक वैचारिक संघर्ष में रुचि
गौर करने वाली बात यह है कि यात्रा शुरू होने के बाद से अब तक शायद ही कोई ऐसा दिन गुजरा हो, जब गोरक्षा से अधिक चर्चा किसी विवादास्पद बयान, किसी संत पर टिप्पणी, किसी राजनीतिक दल के साथ मंच साझा करने या किसी नए टकराव की न हुई हो। यही कारण है कि हिन्दू समाज के एक वर्ग में अब अविमुक्तेश्वरानंद की छवि एक ऐसे संन्यासी की बनती जा रही है जो, गोरक्षा से अधिक वैचारिक संघर्ष और राजनीतिक संदेश देने में रुचि रखता है।
भाषा संत की या किसी राजनीतिक कार्यकर्ता की
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि यदि यह यात्रा वास्तव में गोरक्षा के लिए है, तो इसके मंचों पर सबसे अधिक चर्चा गौ नीति की होनी चाहिए थी। लेकिन यात्रा के अधिकांश पड़ावों पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, भाजपा, बुलडोजर कार्रवाई, धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री और अन्य सनातनी चेहरों पर टिप्पणियां अधिक सुनाई दीं। झांसी में उन्होंने धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के दरबारों पर तंज कसा। योगी आदित्यनाथ के गेरुआ वस्त्रों पर टिप्पणी की। बुलडोजर नीति पर हमला बोला। यहां तक कि राजनीतिक भाषा का प्रयोग करते हुए ऐसे शब्दों का इस्तेमाल किया, जिसने कई लोगों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि क्या यह किसी संत की भाषा है या किसी राजनीतिक कार्यकर्ता की?
लोकआस्था को शास्त्रीय कसौटी पर क्यों कस रहे अविमुक्तेश्वरानंद
फतेहपुर में तांबेश्वर महादेव मंदिर का विवाद इस यात्रा का सबसे चर्चित घटनाक्रम बन गया। स्थानीय श्रद्धालुओं के अनुसार अविमुक्तेश्वरानंद मंदिर पहुंचे, लेकिन गर्भगृह में प्रवेश कर पूजा करने से इसलिए इंकार कर दिया क्योंकि वहां संतोषी माता की प्रतिमा स्थापित थी। इसके बाद स्थानीय स्तर पर तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली। लोगों ने सवाल उठाया कि संतोषी माता करोड़ों हिन्दुओं की आस्था का केंद्र हैं। यदि लोकदेवियों और लोकआस्था को शास्त्रीय कसौटी पर खारिज किया जाएगा, तो फिर छठी मइया जैसी लोकआस्था का क्या होगा, जिनकी पूजा केवल बिहार या पूर्वांचल में ही नहीं बल्कि दुनिया के अनेक देशों में बसे भारतीय करते हैं? फतेहपुर में यह विवाद केवल एक मंदिर तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसे स्थानीय आस्था और लोकपरंपरा के अपमान के रूप में देखा गया।
बिना सबूत के झूठे दावों पर उठ रहे सवाल
यात्रा के दौरान बार-बार यह आरोप भी लगाया गया कि वर्तमान सरकार गोरक्षा में विफल है, गोवंश बेचा जा रहा है और गोमांस का व्यापार बढ़ रहा है। लेकिन इन आरोपों के समर्थन में कोई ठोस तथ्य, आधिकारिक आंकड़े या प्रमाण सार्वजनिक रूप से सामने नहीं रखे गए। यह वही उत्तर प्रदेश है जहां पिछले वर्षों में हजारों गौ-आश्रय स्थल बनाए गए, गो-तस्करी के खिलाफ विशेष अभियान चलाए गए और गोवंश संरक्षण को लेकर लगातार सरकारी योजनाएं लागू की गईं। सरकार की नीतियों की आलोचना लोकतांत्रिक अधिकार हो सकती है, लेकिन बिना तथ्यात्मक आधार के व्यापक आरोप लगाना एक संत की गरिमा के अनुरूप माना जाएगा या नहीं, यह प्रश्न लगातार उठ रहा है।
कांग्रेस-सपा नेटवर्क के सहारे चल रही यात्रा
इस यात्रा का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष इसका राजनीतिक चरित्र है। 29 दिनों में जिन 148 विधानसभा क्षेत्रों तक यात्रा पहुंची, वहां का पैटर्न देखने पर एक दिलचस्प तस्वीर उभरती है। कांग्रेस और सपा नेता पूरे कार्यक्रम के प्रमुख संचालक के रूप में सामने आ रहे हैं। एक के बाद एक पड़ावों पर कांग्रेस और समाजवादी पार्टी से जुड़े नेताओं की उपस्थिति ने यह धारणा मजबूत की कि यात्रा का संगठनात्मक ढांचा विपक्षी राजनीतिक नेटवर्क के सहारे आगे बढ़ रहा है।
मुस्लिमों को बना रहे गोरक्ष का नया चेहरा
यहीं सबसे बड़ा विरोधाभास दिखाई देता है। जिन दलों पर दशकों तक हिन्दुत्व विरोधी राजनीति, तुष्टिकरण और सनातन विरोधी रुख के आरोप लगते रहे, उन्हीं दलों के नेताओं को यात्रा के मंचों पर प्रमुख स्थान मिलता दिखाई दे रहा है। कई स्थानों पर मुस्लिम संगठनों और मुस्लिम नेताओं से मुलाकातों को भी प्रमुखता दी गई। सवाल यह नहीं है कि किसी समुदाय से संवाद क्यों किया गया। सवाल यह है कि क्या वही मुस्लिम नेतृत्व, जो गोहत्या और गोमांस के प्रश्न पर कभी सार्वजनिक रूप से कठोर रुख अपनाते नहीं दिखाई देता, अचानक गोरक्षा का नया चेहरा बन गया है? यही कारण है कि हिन्दू समाज के एक वर्ग में यह धारणा बन रही है कि यात्रा में वास्तविक गोसेवकों से अधिक राजनीतिक उपयोगिता रखने वाले चेहरों को महत्व दिया जा रहा है।
समाधान नहीं, केवल राजनीतिक और वैचारिक टकराव
बुंदेलखंड, पूर्वांचल और मध्य उत्तर प्रदेश के अनेक जिलों में एक और प्रतिक्रिया सामने आई। लोगों का कहना था कि यदि गौ-रक्षा ही लक्ष्य है, तो यात्रा को गोशालाओं के मॉडल, छुट्टा पशुओं की समस्या के समाधान, किसानों की फसल सुरक्षा और समाज आधारित गोपालन की योजनाओं पर चर्चा करनी चाहिए थी। लेकिन यात्रा के मंचों से अधिकतर समय राजनीतिक टिप्पणियों, सरकार विरोधी वक्तव्यों और वैचारिक टकराव में व्यतीत होता दिखाई दिया। परिणाम यह हुआ कि कई स्थानों पर जनभागीदारी सीमित रही और यात्रा स्थानीय राजनीतिक कार्यकर्ताओं तथा समर्थकों तक सिमटती हुई नजर आई।
(लेखक इलाहाबाद विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं। राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर लेखन करते हैं।यह उनके निजी विचार हैं। लेख में प्रस्तुत तथ्यों और आंकड़ों के लिए लेखक जिम्मेदार हैं। जनसत्ता का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।)
