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The Sky Is Pink Movie Review and Rating: अपने के बिछुड़ने का दर्द है ‘द स्काई इज पिंक’

The Sky Is Pink Movie Review and Rating: आशा को एक गंभीर लाइलाज बीमारी थी फिर भी उस उम्र तक उसने एक भरपूर जिंदगी जी। वो एक मोटिवेशनल स्पीकर थीं और जिंदगी को सकारात्मकता से जीने का संदेश देती थीं।

The Sky Is Pink फिल्म के एक सीन में फरहान अख्तर और प्रियंका चोपड़ा

The Sky Is Pink Movie Review and Rating:: आज से चार साल पहले यानी 2015 में दिल्ली से सटे गुड़गांव यानी आज के गुरुग्राम की रहने वालीं अठारह साल आशा चौधरी का निधन हुआ था। आशा को एक गंभीर लाइलाज बीमारी थी फिर भी उस उम्र तक उसने एक भरपूर जिंदगी जी। वो एक मोटिवेशनल स्पीकर थीं और जिंदगी को सकारात्मकता से जीने का संदेश देती थीं। उनकी एक किताब भी प्रकाशित हुई है-`माई लिटिल एफीमेनीज’ नाम से। निर्देशक शोनाली बोस की ये फिल्म उन्हीं के जीवन पर आधारित है।

बेशक आशा की कहानी प्रेरणादायी है। पर सोचने की बात है कि क्या फिल्म भी वैसी ही है? इसका जवाब है- कुछ हद तक। असल में लंबी खींच जाने की वजह से फिल्म कुछ जगहों पर बोर भी करती है। अगर निर्देशक ने इसे थोड़ा चुस्त किया होता तो शायद ये फिल्म कुछ बेहतर हो जाती है। आशा का किरदार जायरा वसीम ने निभाया है। फरहान अख्तर ने आशा के पिता नीरेन चौधरी की। प्रियंका चोपड़ा इसमें आशा मां अदिति चौधरी बनी हैं और रोहित सराफ आशा के भाई। फिल्म में आशा चौधरी का परिवार दिल्ली के चांदनी चौक में रहता है। आशा को रेयर इम्यून डिफिसिएंसी सिंड्रोम नाम की बीमारी हो जाती है जो एक तरह से लाइलाज है।

इस बीमारी में मनुष्य की प्रतिरोधक क्षमता खत्म हो जाती है। हालांकि आशा के लंबे समय तक जीवित रहने की संभावना कम है फिर भी उसके माता पिता उसका इलाज कराने लंदन जाते हैं। फिल्म का काफी हिस्सा फ्लैशबेक के सहारे आगे-पीछे होता रहता है। आशा की कहानी के साथ-साथ नीरेन और अदिति के प्रेम और विवाह के आरंभिक दिन भी इसमें हें। आशा की एक बहन भी थी तान्या। वो भी बहुत कम उम्र में चल बसी थी। ये सारे प्रसंग फिल्म में गुंथे हुए हैं।

इसमें संदेह नहीं कि ये फिल्म एक परिवार की जिंदगी में आने वाले खुशी और गम के लल्हों को दिखाती है। साथ ही इसमें एक जीवन दर्शन यानी फिलोसिफी भी है। वो है परेशानियों और कठिनाइयों के बावजदू जिंदगी को जीने का जज्बे को रेखांकित करना। फिल्म में दर्द और पीड़ा दो स्तरों पर है। एक तो आशा को ये मालूम है कि उसे अब ज्यादा जीना नहीं है और दूसरे माता-पिता के स्तर पर, जिनको भी ज्ञात है कि बेटी अब बचनेवाली नहीं है। फिर भी जीवन संभावनाओं के सहारे चलता है और यही इस फिल्म के मूल में है।

ये सब तो हुआ फिल्म का वैचारिक पहलू। निर्देशक ने इसे कई जगहों पर हल्का-फुल्का भी रखा है और इसमें हंसी और गुदगुदी के लिए भी कई अवसर हैं। लेकिन बीमारी पर केंद्रित होने के कारण कुछ जगहों पर जरूरत से ज्यादा संजीदगी दिखती है। जहां तक अभिनय का सवाल है, इसमें फरहान और प्रियंका एक ऐसे दंपति के रूप में आए हैं जो अपनी संतान की खुशी के लिए बहुत कुछ दांव पर लगाने के लिए तैयार हैं। पर इसी का दूसरा पहलू ये भी है कि दोनो- यानी प्रियंका और फरहान अब फिल्मी दुनिया में माता-पिता की भूमिकाओं में स्टीरियोटाइप हो सकते हैं। फरहान के लिए तो वैसे भी हीरो के रूप में बॉलीवुड में कोई संभावना नहीं बची है इसलिए उनको पिता, चाचा या ताऊ के रोल ही मिलेंगे। हालांकि इस फिल्म मे प्रियंका के साथ उनके रोमांटिक सीन भी हैं पर वे भरती के लगते हैं। प्रियंका भी अब अमेरिका जा बसी है शादी करके। इसलिए उनके लिए भी इसी तरह की भूमिकाएं बची हैं। जायरा का अभिनय बेहतरीन है लेकिन अब वे भी बॉलीवुड को अलविदा कर चुकी हैं। यही इस फिल्म की कमजोरी है क्योंकि विदा होते लोग दुख तो देते हैं पर नेपथ्य में भी चले जाते हैं।

द स्काई इज पिंक (2और 1/2 *)

निर्देशक– शोनाली बोस

कलाकार– फरहान अख्तर. प्रियंका चोपड़ा, जायरा वसीम, रोहित सराफ

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