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द लिजेंड ऑफ माइकल मिश्रा रिव्यू: फिल्म में लीजेंड जैसा कुछ भी नहीं, असरदार नहीं दिखे अरशद

The Legend of Michael Mishra Movie Review: करीब दो घंटे की फिल्म के पहले हिस्से में माइकल की कहानी सुनाई जाती कि किस तरह वह लीजेंड बना

The legend of mic michael mishra

The Legend of Michael Mishra movie cast: Arshad Warsi, Aditi Rao Hydari, Boman Irani

The Legend of Michael Mishra movie director: Manish Jha

अगर आपको ऐसा अपहरणकर्ता देखना है जो चेहरे मोहरे से जोकर लगता है तो द लीजेंड ऑफ माइकल मिश्रा’ देखिए। अर्शद वारसी इसमें पहले माइकल नाम के अपहरणकर्ता बनते हैं। बाद में इस माइकल को इश्किया की बीमारी लग जाती है। पर इश्क में पड़ा ये शख्स भी जोकर ही लगता है कोई दीवाना नहीं। फिल्म के निर्देशक मनीष झा का तर्क होगा कि भाई के कॉमडी फिल्म हैं। तर्क कुछ कुछ वाजिब है लेकिन सवाल भी उठेगा न कि एक खूंखार अपराधी को इश्क का दीवाना बनता दिखाने के लिए दर्शक के सामने कुछ तो विश्वसनीयता होनी चाहिए। वो कहीं नहीं है।

विश्वसनीयता की इसी कमी की वजह से फिल्म का रोमांटिक पहलू भी कमजोर है। अदिति राव हैदरी ने पटना की एक लड़की वर्षा शुक्ला की भूमिका निभाई है। (वैसे लगभग पूरी फिल्म बिहार केंद्रित है।) वर्षा को गाने का शौक है पर अंग्रेजी कमजोर है। किशोरावस्था के दिनों में माइकल ने वर्षा को देखा था और देखते ही प्यार हो गया है। पर उसके बाद माइकेल पुलिस से भागता ही रहा और वर्षा को ढूंढता ही रहा। जब उसे वर्षा मिली तो माइकल शातिर अपराधी बन चुका होता है। लेकिन जब इश्क का चक्कर चल जाता है तो बड़ा से बड़ा अपराधी शेर से मेमना बन जाता है। माइकल के साथ भी वही हुआ। वह भी मेमना बनना चाहता है पर अदालत ऐसा करने दे तब न? और इस बीच वर्षा मुंबई पहुंचकर स्टार बन जाती है और माइकेल भैरव घाटी नाम के काला पानी कहे जानेवाले जेल में सजा काटने चला जाता है। क्या माइकल और वर्षा फिर मिल पाएंगे?

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फिल्म बिहार की पृष्ठभूमि में बनी है इसलिए लहजा भी थोड़ा थोड़ा बिहारी है। ये अलग बात है कि अर्शद किसी कोने से बिहारी अंदाज नहीं दिखा पाते। कायोजे ईरानी ने हाफ पैंट नाम के एक शख्स की भूमिका निभाई है जो माइकल का खास आदमी है। कुछ कुछ वैसा ही जैसा मुन्नाभाई एमबीबीएस’ में सर्किट की भूमिका थी। बोमन ईरानी कथावाचक है और माइकल मिश्रा के नाम पर बने ढाबे में मैनेजर हैं। ये ढाबा भी बिहार में है लेकिन बोमन का चरित्र भी किसी बिहारी जैसा नहीं लगता। फिल्म उस ढाबे की तरह है जिसका नाम तो अनारकली होता है लेकिन जहां कोई कली नहीं मिलती।

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