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Shikara Movie Review, Ratings : कश्मीरी पंडितों का छलकता दर्द बयां करती ‘शिकारा’

Shikara Movie Review, Rating, Release : ये प्रेम कहानी तीस साल पहले कश्मीर से पंडितों के विस्थापन की पृष्ठभूमि में दिखाई गई है। ये विस्थापन 1990 में हुआ था जब लगभग चार लाख कश्मीरी पंडितों को घर छोड़कर भागना पड़ा था। इसके तीस साल पूरे होने पर देश के कई हिस्सों में कार्यक्रम हो रहे हैं।

Shikara Movie Review:शिकारा फिल्म का पोस्टर

Shikara Movie Review, Rating, Release: जो लोग कश्मीर की मौजूदा हालत देखने के लिए `शिकारा’ देखने जाएंगे उनको निऱाशा होगी। ये फिल्म राजनीति कहानी से अधिक एक प्रेम कहानी है। और ये प्रेम कहानी तीस साल पहले कश्मीर से पंडितों के विस्थापन की पृष्ठभूमि में दिखाई गई है। ये विस्थापन 1990 में हुआ था जब लगभग चार लाख कश्मीरी पंडितों को घर छोड़कर भागना पड़ा था। इसके तीस साल पूरे होने पर देश के कई हिस्सों में कार्यक्रम हो रहे हैं।

अखबारों से लेकर टीवी चैनलों में उसे याद किया जा रहा है। पिछले साल धारा 370 हटने और जम्मू और कश्मीर राज्य को दो प्रशासनिक हिस्सों में बांट दिए जाने के बाद कश्मीर का मसला एक नए सांचे में ढल गया है। ऐसे में `शिकारा’ से अलग अलग लोगों की अलग-अलग आशाएं थीं। पर विधु विनोद चोपड़ा कश्मीर से जुड़े विवादास्पद राजनैतिक मसलों से बच बचा कर निकल गए हैं और एक संतुलित कहानी रच डाली है। ये एक तरह से अच्छी बात भी है क्योंकि विवाद का कहीं अंत नहीं होता।

हां, फिल्म की शुरुआत में वो राजनैतिक पृष्ठभूमि भी है जब कश्मीर, खासकर श्रीनगर में पाकिस्तान समर्थिक आतंकवाद जन्म ले रहा था। उस समय घाटी में पाकिस्तान की तत्कालीन प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टों के भाषण टीवी पर दिखते थे जिनमें वे कश्मीर के मुसलिमों को भड़काती थीं। बेनजीर वैसे तो लोकतांत्रिक छवि बनाए ऱखती थीं मगर अपने पिता जुल्कीकार अली भुट्टों की तरह वे भी जेहादी मानसिकता तो भड़काती थीं।

बहरहाल, फिल्म में ये दिखाया गया है बनजीर के उसी भड़काऊ ललकारों के बीच उसी कश्मीरी पंडित शिव कुमार धर (आदिल खान) और उसकी पत्नी शांति धर (सादिया) को अन्य पंडित परिवारों के साथ रातोरात अपना घर छोड़ना पड़ता है और जम्मू के शरणार्थी शिविर में लंबे समय तक जिंदगी बितानी पड़ती है। चोपड़ा ने इस फिल्म का एक बड़ा हिस्सा जम्मू के शरणार्थी कैंपों में शूट किया है। इस कारण शरणार्थी जीवन की प्रामाणिकता इसमे आ गई है। कश्मीर के भी कुछ वास्तविक लोकेशन हैं।

ये फिल्म एक रूपक या मेटाफर भी है। वो मेटाफर है विस्थापित कश्मीरी पंडितों के घर लौटने का। शिव कुमार धर अंत में अकेले अपने गांव वाले घर में लौटता है। वो तय करता है कि वहीं रहकर बच्चों को पढाएगा। वो समाज तो जोड़ने की बात करता है। विस्थापित कश्मीरी पंडितों की एक आकांक्षा घर यानी कश्मीर लौटने की है। हालांकि वास्तविक के धरातल पर अब ऐसा होना आसान नहीं है। कई तो देश के अलग अलग हिस्सों में बस गए हैं और कई अभी भी जम्मू के शरणार्थीं कैंपों में हैं। क्या वे लौट पाएंगे? पता नहीं क्या होगा, पर चोपड़ा ने उस स्वप्न को अपनी फिल्म में दिखाने की कोशिश की है।

आदिल खान और सादिया बड़े स्टार नहीं है लेकिन अपनी अपनी भूमिकाओं में वे दिल को छूते हैं और उस कोमलता को स्पर्श करते हैं जो एक सामान्य परिवार में होती हैं। । `शिकारा’ राहुल पंडिता की किताब `अवर मून हैज ब्लड क्लौट्स’ से प्रेरित है। कश्मीर हिंदी फिल्मों का स्थायी विषय रहा है और आगे भी उस पर फिल्में बनती रहेंगी।

Shikara निर्देशक– विधु विनोद चोपड़ा
Shikara कलाकार– आदिल खान, सादिया

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