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Raman Raghav 2.0: मनोवैज्ञानिक अंधेरे को महसूस करने के लिए देखें यह फिल्‍म

फिल्म का म्यूजिक बेहद दमदार है, वह रमन की निर्ममता को और उभार कर समाने लाता है

नवाजुद्दीन सिद्दीकी फिल्म रमन राघव में। (फोटो- अनुराग कश्यप के ट्विटर अकाउंट से)

दो तरह के अपराध होते हैं। एक जो किसी तात्कालिक वजह से होता है। दूसरा वो होता है जो अपराधी के रग-रग में होता है। वह क्यों होता है इसकी कोई खास वजह नहीं दिखती है। दूसरी तरह के अपराधी किसी की हत्या करने में किसी तरह के मानसिक अपराध बोध से नहीं गुजरते। ऐसे लोगों के मन में वह स्याह कोना हमेशा मौजूदा रहता है जो उनके अंदर की अपराधिक भावना को कर्तव्य की तरह पेश करता है। अगर ऐसे किसी अपराधी के मन की भीतरी तहों से आपको गुजरना है तो अनुराग कश्यप कि फिल्म `रमन राघव2’ देखनी चाहिए। नवाजुद्दीन सिद्दिकी ने इसमें रमन का किरदार निभाया है। जो बिना किसी खास वजह के लोगों की हत्या करता है। उसे ऐसा लगता है कि ऐसा करके वह किसी ईश्वरीय आदेश का पालन कर रहा है। लेकिन अगर आप साइकोलॉजिकल यानी मनोवैज्ञानिक अंधेरे में नहीं उतरना चाहते तो `रमन राघव 2.0’ आपको पसंद नहीं आएगी।

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फिल्म का कैरेक्टर मुंबई में सातवें दशक में कुख्यात हुए सीरियल किलर रमन राघव, जिसे साइको रमन भी कहा गया से प्रेरित है। साइको रमन ने कुल मिलाकर 41हत्याएं की थीं। सभी बिना किसी मकसद के की गई थीं। बिना किसी वजह के। लेकिन निर्देशक अनुराग कश्यप ने साफ कर दिया है कि फिल्म उस साइको रमन का जिंदगीनामा नहीं है। समझ लीजिए कि गुड़ खाकर गुलगुले से परहेज करनेवाली बात है। खैर, जो भी हो तीन बातें इस फिल्म को खास बनाती है। एक तो ये कि अनुराग कश्यप मार्का फिल्म है। जिसमें लोगों के अंधेरे पक्ष ही उभरे हैं और अपराध की मानसिकता का निर्ममता से अध्ययन किया गया। बड़ा अपराधी कौन, जो समाज के निचले धरातल पर रहता है या वह जो पुलिस की वर्दी में भी बेरहम है। क्या दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं? रमन यानी रामन्ना तो पुटपाथ का आदमी है और बिना किसी ठोस वजह के हत्या करता है। यहां तक कि अपनी बहन,बहनोई और भांजे की हत्या भी कर देता है। और राघव (विकी कौशल)? वह एक पुलिस अधिकारी है लेकिन हमेशा ड्रग्स के नशे में रहता है और वह भी बेहद हिंसक है। अपनी प्रेमिका के प्रति उसका व्यवहार असंवेदनशील है। हालांकि अनुराग ने ये भी दिखाया है का राघव संभवत: अपने पिता की वजह से ऐसा हो गया। लेकिन रमन एक जगह उससे कहता भी है कि उन दोनों के बीच कोई खास रिश्ता है। दोनों क्या मनुष्य के अंधेरे बंद कमरे के दो अलग अलग रूप हैं। एक दूसरे के प्रतिरूप हैं।

दूसरी बात ये है कि नवाजुद्दीन सिद्दिकी इसमें अभिनय की उस गहराई में गए हैं जहां किसी चरित्र की भीतरी परतें उजागर होती हैं। ये एक बेहतरीन अभिनेता हैं और इसे कई बार प्रमाणित कर चुके हैं। पर ये फिल्म उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती है। एक ऐसे शख्स का किरदार निभाना कठिन होगा जिसके भीतर अच्छे और बुरे का कोई विवेक नहीं है। किसी तरह का अपराध बोध नहीं है। हालांकि विकी कौशल ने भी अपना किरदार बहुत अच्छे से निभाया है। लेकिन नवाज के सामने वो थोड़े से दब गए हैं। इस फिल्म की तीसरी खास बात इसका म्यूजिक कॉम्पोजिशन है। उसकी वजह से भी नवाज के किरदार की निर्ममता ज्यादा उभरती है। इस फिल्म के गानों- जैसे `बेहुदा’ या `कत्ले आम’ में भी वह निर्वैयक्तिक हिंसा है जो फिल्म के केंद्र में है। ये फिल्म कुछ अध्यायों में विभाजित है। जिसके कारण कहानी ठीक से मुकम्मल नहीं होती और बीच में टूटती रहती है। यही कारण कुछ जगहों पर बोझिल लम्हें दर्शकों को घेरे रहते हैं।

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