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इंसानी फितरत के कई रूप: ‘राय’ फिल्म की समीक्षा

Ray Movie Review: बंगाल और भारत के अप्रतिम फिल्मकार और कथाकार सत्यजीत राय की जन्मशती शुरू हो गई है। इसी मौके पर उनकी चार कहानियों को लेकर बनी और संकलित फिल्म है 'राय'।

राय फिल्म की समीक्षा (फोटो सोर्स- इंडियन एक्सप्रेस)

Ray Movie Review: बंगाल और भारत के अप्रतिम फिल्मकार और कथाकार सत्यजीत राय की जन्मशती शुरू हो गई है। इसी मौके पर उनकी चार कहानियों को लेकर बनी और संकलित फिल्म है ‘रे’। यानी चार छोटी फिल्मों का संकलन जो नेटफ्लिक्स पर रिलीज हुई हैं। ये चार हैं – ‘फॉरगेट मी नॉट’, बहुरूपिया (नि- सृजित मुखर्जी), ‘स्पॉटलाइट’ (नि- वासन बाला) और ‘हंगामा हैं क्यों बरपा’ (नि-अभिषेक चौबे)। यानी चार कहानियों के तीन निर्देशक। यहां ये भी याद रखने लायक है कि ये सत्यजीत राय की कहानियों के हूबबू फिल्मांकन नहीं हैं और उनको बदलते समय के मुताबिक रूपांतरित किया गया है।

‘फॉरगेट मी नॉट’ इप्सित नायर (अली फजल) एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है जो अचानक भूलने लगता है और इस वजह से उसका वजूद बदल जाता है। अपनी ही कंपनी में और अपने ही घर में उसकी हैसियत बदलने लगती है। वो कई लोगों को पहचान नहीं पाता और ऐसे में उसकी सामाजिक साख समाप्त होने लगती है और वो मनोवैज्ञानिक ग्रंथियों का शिकार हो जाता है।

‘बहुरूपिया’ में इंद्राशीष शाह (केके मेनन) एक सामान्य मेकअप कलाकार है और जब अचानक उसके पास पैसा आता है तो अपना भेष बदलकर अपराध करने लगता है। मेकअप के कारण लोग उसे पहचान नहीं पाते कि ये कौन शख्स है और वो अपने को खुदा समझने लगता है।

‘स्पॉटलाइट’ में विक्रम अरोरा, (हर्षवर्धन कपूर) बॉलीवुड का एक स्टार है लेकिन प्रशंसकों से लेकर फिल्म निर्माताओं के बीच उसका व्यक्तित्व दीदी (राधिका मदान) की नाम एक साध्वी के सामने दबने लगता है। वो कई तरह के तनावों का शिकार हो जाता है।

‘हंगामा है क्यों बरपा’ मुसाफिर अली (मनोज वाजपेयी) नाम के एक शायर और बेग (गजराज राव) के एक पूर्व पहलवान की कहानी है जो क्लेपिटोमेनिया नाम की बीमारी के शिकार है। ये एक ऐसी बीमारी है जिसमें आदमी आदतन दूसरों की छोटी मोटी चीज चोरी कर लेता है।

वैसे तो चारो फिल्में राय की कहानी से प्रेरित हैं लेकन ‘बहुरूपिया’ और ‘हंगामा है क्यों बरपा’ ज्यादा कारगर ढंग से बनी हैं। बाकी दोनो मनोविज्ञान की गलियों मे उलझ गई हैं। ‘बहुरूपिया’ आदमी के भीतर बसी उस प्रवृत्ति को सामने लाती है जिसमें लोग थोड़ा सा ही पैसा या ताकत पाते छल कपट करने लगते हैं नकली चेहरा अपना लेते हैं। फिर लाल कोशिश के बावजूद उनका नकली चेहरा उतरता नहीं है। फिर वही नकली चेहरा उसकी स्थायी पहचान बन जाती हैं। ‘हंगामा है क्यों बरपा’ में उर्दूशायरी और गजल गायकी का खूबसूरत इस्तेमाल है और साथ ही इंसान के भीतर देर से आने वाले एहसास का भी जिसके तहत आप जो चीजें गलत करते हैं वो आगे चलकर आपकी आत्मा पर बोझ बन जाती है।

‘बहुरूपिया’ और ‘हंगामा है क्यों बरपा’ इंसानी फितरत के ही दो रूप हैं और ये भी संकेत करते हैं कि सत्यजीत राय ने अपनी कहानियों में किस तरह मनुष्य के भीतर निहित दो या भिन्न तरह के मनोभावों को पकड़ा था।

राय (3&1/2*)

निर्देशक– सृजित मुखर्जी, अभिषेक चौबे, वासन बाला

कलाकार– हर्ष वर्धन कपूर, आकांक्षा रंजन कपूर, चंदन रॉय सान्याल, राधिका मेनन, केके मेनन, बिदिता बाला, रजत शर्मा, अली फजल श्वेता बसु प्रसाद, मनोज वाजपेयी, गजराज राव

 

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