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Panga Movie Review, Ratings: हर कीमत पर सपने पूरे करो, चुनौतियों से ‘पंगा’ लेना सिखाती है कंगना रनौत की फिल्म

Panga Movie Review, Rating, Release: फिल्म इस मूल विचार पर केंद्रित है कि क्या एक औरत शादी और बच्चे होने के बाद फिर से नई जिंदगी शुरू कर सकती है? और ये भी क्या बच्चा और पति भी इस औरत की मदद कर सकते है?

Panga Movie Review फिल्म पंगा में कंगना रनौत

Panga Movie Review, Rating, and Release: पहला दृश्य कुछ इस तरह से शुरू होता है। पति और पत्नी सोए हुए हैं। सोए-सोए पत्नी अपने पति को लात मारती हैं। फिर मारती ही जाती है। हालांकि वो नींद में बेसुध है। पति लात खाकर जागता है और फिर सो जाता है। फिर लात खाकर जागता है। यही सिलसिला चलता रहता है। पत्नी है जया निगम यानी कंगना रानौत। पति है प्रशांत यानी जस्सी गिल। जया को लात मारने की ये आदत इसलिए हैं कि वो कभी कबड्डी की खिलाड़ी रही है।

हालांकि ये खेल खेलना वो कब की छोड़ चुकी है। उसकी शादी हो चुकी है और एक बच्चे की मां भी है। भोपाल में हबीबगंज स्टेशन पर पर यात्रियों को टिकट देने में सारा समय गुजरता है। ये नौकरी भी उसे कबड्डी की राष्ट्रीय खिलाड़ी होने की वजह से मिली थी। जिंदगी गुजरती रहती है और तभी भोपाल आती है उसकी पुरानी दोस्त मीनू (ऋचा चड्ढा) जो अभी भी कबड्डी में छोटी उम्र की लड़कियों को कोचिंग देती रहती है। और फिर जया के दिल में चाहत पैदा होती है फिर से कबड्डी खेले और राष्ट्रीय स्तर पर पहुंचे।

क्या ऐसा हो सकता है? आखिर जया एक बच्चे की मां है और पारिवारिक जिंदगी है। इन सबके के साथ फिर से कबड्डी कबड्डी? पंगा एक खेल फिल्म है लेकिन साथ ही ये पारिवारिक भी है। निर्देशक अश्विनी अय्यर तिवारी ने इसे एक मोटिवेशनल यानी प्रेरणादायी फिल्म के रूप में भी बनाया है। फिल्म इस मूल विचार पर केंद्रित है कि क्या एक औरत शादी और बच्चे होने के बाद फिर से नई जिंदगी शुरू कर सकती है? और ये भी क्या बच्चा और पति भी इस औरत की मदद कर सकते है?

फिल्म में कुछ जगहों को छोड़ दें तो वो चिक- चिक भी नहीं है जो ऐसे परिवार में दिखती है जहां कोई औरत फिर से खिलाड़िन बनना चाहती है। बल्कि इसमें में बच्चा आदि (यज्ञ भसीन) ही अपनी मां को कहता है कि सेरना विलियम्स और कुछ दूसरी महिला खिलाड़ियों की तरह फिर से खेलना शुरू कर सकती है।  कंगना रानौत ने एक ऐसी औरत के जज्बात को बेहतरीन तरीके से सामने लाया है जो कई तरह के अतंर्द्वंद्व से गुजरती है- फिर से कबड्डी खेलना शुरू करे या नहीं क्योंकि बच्चा कमजोर है और उसकी देखभाल भी करनी है।

पति पर कितना भार डाले। और जब वो कबड्डी के मैदान में फिर से जाती है तो टीम की कप्तान उसे पंसद नहीं करती और कुछ मैचों में उसे खेलने का मौका भी नहीं मिलता और बेंच पर बैठना पड़ता है – सब्सीच्यूट के रूप में। यहां भी उसे अपने मन के भीतर चलनेवाले झंझावातों को संभालना पड़ता है। फिर भी वो आत्म नियंत्रण बनाए रखती है। ऋचा चड्ढा की फिल्म में सपोर्टिव यानी सहयोगी वाली भूमिका है मगर वे कई जगहों पर अपने चुटीले संवादों से फिल्म को जिंदादिल बनाए रखती हैं।

पंगा एक नारीवादी फिल्म है, लेकिन ये पहलू आक्रामक तरीके से आया नहीं है बल्कि एक वैसे विचार के रूप में उभरा है जो आज की जरूरत की तरह है। आखिर क्यों हमेशा कोई औरत अपने सपनों को हमेशा के लिए कुचल दे। उसे भी तो अपनी जिंदगी भरपूर तरीके से जीने का मौका मिलना चाहिए। ये फिल्म शायद कबड्डी के खेल को और विशेषकर महिला कबड्डी के खेल को च्यवनप्राश दे दे। अभी तक तो न महिला कबड्डी की तरफ मीडिया का ध्यान जाता है और न प्रशासकों का। `पंगा’ कुछ हद तक इस सोच को बदलेगी।

पंगा स्टार रेटिंग्स : (3 1/2 *)
निर्देशक– अश्विनी अय्यर तिवारी
कलाकार- कंगना रनौत, ऋचा चड्ढा, नीना गुप्ता, जस्सी गिल, यज्ञ भसीन

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