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सचिन अ बिलियन ड्रीम्स Review: किंवदंती बनने की राह

सचिन तेंदुलकर भारतीय क्रिकेट के किंवदंती पुरुष हैं। किंवदंतियां अकसर बढ़ती ही रहती हैं और उनके सिलसिले को आगे बढ़ाने के प्रयास भी होते रहते हैं।

सचिन तेंदुलकर भारतीय क्रिकेट के किंवदंती पुरुष हैं। किंवदंतियां अकसर बढ़ती ही रहती हैं और उनके सिलसिले को आगे बढ़ाने के प्रयास भी होते रहते हैं। यह फिल्म भी उसी प्रयास की एक कड़ी है। सचिन भारतीय क्रिकेट के इतिहास में एक ऐसे नक्षत्र की तरह उदित हुए जिसके प्रकाश से पूरा विश्व चकाचौंध होता रहा। पर उस नक्षत्र की दूसरी वास्तविकताएं क्या थी, घर में वह कैसे रहा और परिवार के साथ उसके कैसे संबंध रहे? ये जानने की उत्सुकताएं भी लोगों में बनी रहती हंै। लोग जितना जानते हैं उससे संतुष्ट नहीं होते। वैसे भी एक व्यक्ति की कहानी पूरी तरह कभी जानी नहीं जाती। अगर वह शख्स सचिन तेंदुलकर जैसा जन-जन के मन में बसा हुआ है तो उत्सुकताएं बढ़ती जाती हैं। ‘सचिन : अ बिलियन ड्रीम्स’ की खूबी यही है कि कई उत्सुकताओं का उत्तर भी देती है और नई उत्सुकताएं पैदा भी करती हैं। यह एक बायोपिक यानी जीवनीपरक फीचर फिल्म नहीं बल्कि डॉकूड्रामा है जिसमें सचिन खुद अपनी कथा कहते भी मौजूद हैं।

सचिन को मैदान में लगातार शतक ठोंकते और रन पे रन बनाते देखा गया है। लेकिन इस फिल्म में आप उनके निजी जीवन से रूबरू होते हैं। कुछ-कुछ उनके माध्यम से और ज्यादातर उनकी पत्नी अंजलि तेंदुलकर के माध्यम से। सचिन ने भारतीय क्रिकेट को लगभग चौबीस साल दिए। उनको जैसा लंबा खेल जीवन मिला और यश किसी और क्रिकेटर को नहीं मिला। उनके करियर में कई तरह के उतार-चढ़ाव आए। भारतीय क्रिकेट मैच फिक्सिंग जैसे विवादों में भी फंसा। कोच के रूप में ग्रेग चैपल का कार्यकाल भी झंझटों से भरा रहा। खुद सचिन को कप्तान पद से हटना पड़ा। ऐसे कई मामलों में सचिन की राय और भूमिका क्या रही, उससे भी हम यहां परिचित होते हैं। हां, कुछ मसलों पर सचिन की राय दो टूक नहीं है। यह उनकी शैली और विवादों से दूर रहने की प्रवृत्ति रही है। यह सब इस फिल्म में है।

ड्रेसिंग रूम में उनके साथी रहे वीरेंद्र सहवाग, हरभजन सिंह और महेंद्र सिंह धोनी जैसे खिलाड़ियों की नजर में सचिन कैसे हैं, यह भी इस फिल्म में है। एक किंवदंती पुरुष संयोग या भाग्य भर से शीर्ष पर नहीं पहुंचता। उसके पीछे मेहनत और निष्ठा रहती है। विनोद कांबली और सचिन तेंदुलकर ने साथ-साथ क्रिकेट खेलना शुरू किया। दोनों बेहद प्रतिभाशाली थे। वह क्या चीज थी जिसने कांबली को ऊंचे शिखर पर पहुंचने से रोका और सचिन को पहुंचाया? इस सवाल का जवाब भी यहां है।
पर ऐसी फिल्में कुछ-कुछ महिमामंडन भी हो जाती है और इस फिल्म के साथ भी ये हुआ है। क्रिकेट प्रशंसकों का एक वर्ग ऐसा भी रहा है, जो यह मानता है कि बाद के बरसों में कई ऐसे मौके आए जब सचिन वक्त की मांग पर खरे नहीं उतरे और ऐसे समय कई मैचों में आउट हो गए, जब उनकी ज्यादा जरूरत थी। फिल्म में इस पहलू को नहीं छुआ गया है। फिर भी कई वजहों से फिल्म का मह्त्व हैं। सचिन ने सिर्फ दशर्कों या खेलप्रेमियों को नहीं बल्कि भारतीय क्रिकेट की कई पीढ़ियों को प्रेरणा दी है और उनको बड़ा खिलाड़ी बनने का हौसला दिया है। उन्होंने जहां भारतीय क्रिकेट को छोड़ा था, वहां से अब वह काफी आगे बढ़ चुका है। कई सितारे उभरे और अब भी रोज नए नए सितारों का उदय हो रहा है। इसके पीछे सचिन भी हैं। प्रेरणास्रोत के रूप में।

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