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Love Games Review: चटपटी पर दिल में नहीं बसेगी

वैसे तो इस फिल्म के निर्देशक विक्रम भट्ट हैं लेकिन बिना संकोच के ये कहा जा सकता है कि इस पर पूरी तरह से महेश भट्ट की फिल्म -फिलासफी की छाप है जो मुकेश भट्ट के साथ इस फिल्म के निर्माता भी हैं।

Author नई दिल्ली | April 8, 2016 11:01 PM

निर्देशक- विक्रम भट्ट
कलाकार-पत्रलेखा, तारा अलीशा बेरी, गौरव अरोड़ा, हितेन तेजवानी
वैसे तो इस फिल्म के निर्देशक विक्रम भट्ट हैं लेकिन बिना संकोच के ये कहा जा सकता है कि इस पर पूरी तरह से महेश भट्ट की फिल्म -फिलासफी की छाप है जो मुकेश भट्ट के साथ इस फिल्म के निर्माता भी हैं। महेश भट्ट हाल के वर्षों में उन्मुक्त यौन संबंधों की फिल्म बनाने के लिए चर्चित रहे हैं।

लव गेम्स’ की उसी तरह की है। वैसे नाम से ज्यादा भ्रमित होने की जरूरत नहीं है कि इसमें किसी तरह के खेल या गेम्स हैं। मुख्य रूप से ये वाइफ स्वैपिंग की परिकल्पना पर आधारित फिल्म है। वाइस स्वैपिंग (यानी बीवी बदल) के आजकल महानगरों में एक बीमारी की तरह फैलने की बात सुनी जाती है। हालांकि ये कितना वास्तविक है और कितना कपोल कल्पना ये कहना कठिन है, लेकिन इसके बारे में बात अक्सर की जाती है। जाहिर है भट्ट घराने के लिए ये एक मौजू विषय है। और इसी कारण फिल्म में उन्मुक्त यौन व्यवहार के स्पष्ट खेल हैं।

वैसे अगर फिल्म के सुधी दर्शक इसे बी-ग्रेड फिल्मों की श्रेणी में रखें तो विक्रम भट्ट को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। पारिवारिक संवेदनशीलता का भट्ट कैंप ने कब खयाल रखा है? पूरी फिल्म रमोना (पत्रलेखा) और सैम सक्सेना (गौरव अरोड़ा) के इर्द गिर्द घूमती है। रमोना एक विधवा है। हाल में उसके पति का निधन हुआ है। रमोना एक ऐसी औरत है जो हमेशा यौन आकांक्षाओं से भरी रहती है। उसकी मुलाकात होती है सैम सक्सेना से जो एक बहुत बड़े धनाढ्य आदमी का बेटा है। सैम अदंर से मनोवैज्ञानिक रूप से बड़ा परेशान रहता है।

रमोना और सैम का एक दूसरे के प्रति यौन आकर्षण तो है पर चूंकि सैम मानसिक रूप से परेशान रहता है इसलिए रमोना एक खेल का आइडिया पेश करती है। ये खेल है लव गेम्स का। दोनो मिलकर पाटिर्यों में किसी शादीशुदा युगल को ढूंढते हैं और एक दूसरे से प्रतिद्वंदिता करते हैं कि कौन अपने से विपरीत सेक्स के साछ संबंध बनाएगा। और इस दौराम सैम का संबंध बनता है अलीशा (तारा अलीशा बेरी) से जो पेशे से डॉक्टर है और जिसका पति वकील है। अलीशा से संबंध रखते हुए सैम को उससे एक तरह से प्यार हो जाता है और वह चाहता है कि रमोना से रिश्ता खत्म हो और लव गेम्स का चक्कर भी। पर क्या रमोना उसे ऐसा करने देगी या इसे सहज रूप से स्वीकार करेगी? इसके बाद कहानी किस दिशा में मुड़ेगी? यहीं पर फिल्म की धुरी टिकी है औ? इस विंदु पर भी कि क्या दो व्यक्तियों के बीच सिर्फ यौन संबंध का खेल हमेशा चल सकता है और औरत तथा पुरुष सिर्फ यांत्रिक संबंधों में कितनी देर तक बंधे रह सकते हैं?

पत्रलेखा इसके पहले ैसिटी लाइट्स’ फिल्म में आ चुकी हैं और उसमें उनके अभिनय की तारीफ हुई थी। पर इस फिल्म मे उनकी भूमिका कुछ अलग किस्म की है और वे इसमें आकर्षण से अधिक विकर्षँण पैदा करती हैं। शायद ये हम सबके मन का संस्कार हो कि किसी औरत को, खासकर फिल्म की हीरोइन को, इस तरह की भूमिका में स्वीकार नहीं कर पाते। गौरव भी ठीक से संवाद नहीं बोल पाते। या फिर पोस्ट प्रॉडक्शन में उनके साथ ठीक से काम नहीं हुआ है। तारा अलीशा बेरी का डॉक्टर वाला किरदार भी जम नहीं पाता। जब निर्देशक किसी किरदार को डॉक्टर के रूप में पेश करता हैं तो कुछ ऐसा लगे कि उसमें इस तरह का पेशेगत व्यक्तित्व है। हा, अलीशा जब सैम के साथ रोमांटिक लम्हों में होती हैं तो कुछ कुछ विश्वसनीय लगती है। विक्रम भट्ट की ये फिल्म चटपटी जरूर है पर दिल के भीतर प्रवेश नही करती। शायद इस मकसद से, यानी दिल में जगह बनाने के लिए, उन्होंने ये फिल्म बनाई भी नहीं है।

 

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