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Khandaani Shafakhana Movie Review and Rating: शफाखाना चाहिए या इज्जत

Khandaani Shafakhana Movie Review and Rating: बेबी बेदी की मां (नादिरा जहीर बब्बर) इस बात के लिए तैयार नहीं है कि शफाखाने की मलकियत उसकी बेटी को मिले। उसे लगता है कि इससे परिवार की इज्जत मिट्टी में मिल जाएगी।

Khandaani Shafakhana फिल्म का एक पोस्टर।

Khandaani Shafakhana Movie Review and Rating:  सेक्स एजुकेशन की जरूरत बताने वाली ये फिल्म कॉमेडी है हालांकि आखिर में इसमें जज्बाती हो गई है। सोनाक्षी सिन्हा ने अमृतसर की बेबी बेदी नाम की एक ऐसी लड़की का किरदार निभाया है जिसके सर पर पूरे परिवार का बोझ है। यानी विधवा मां और बेकार भाई (वरुण शर्मा) का। बेबी बेदी मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव का काम करती है लेकिन वो धंधा भी ठीक नहीं चल रहा है। मकान चाचा के पास रेहन है जो बार बार घर से निकालने की धमकी देता है। अब बेबी क्या करे?

लेकिन तभी खबर आती है कि उसके मामा (कुलभूषण खरबंदा) गुजर गए और अपना खानादानी शफाखाना बेबी के नाम कर गए है। शफाखाना, जहां उन बीमारियों का इलाज होता है जिनको गुप्तरोग कहते है। जैसा कि भारतीय समाज में होता है गुप्त बीमारियों का गुप्त तरीके ही इलाज होता रहा है और न इलाज करने वाले और न कराने वाले को इज्जत से देखा जाता है।

इसलिए बेबी बेदी की मां (नादिरा जहीर बब्बर) इस बात के लिए तैयार नहीं है कि शफाखाने की मलकियत उसकी बेटी को मिले। उसे लगता है कि इससे परिवार की इज्जत मिट्टी में मिल जाएगी। लेकिन बेबी को अपने आर्थिक संकट से निकलने का कोई और रास्ता नहीं सूझता इसलिए वो मां और रिश्तेदारों से चोरी छिपे शफाखाने पर जाने लगती है और पुराने गुप्त रोगियों का इलाज करने लगती है। लेकिन इसका पता तो सबको चलना ही था सो मां से लेकर दूसरे रिश्तेदार इसके बारे मे जान जाते हैं। हंगामा बरप जाता है।

बेबी सेक्स पर `बात तो करो’ का अभियान शुरू करती है तो कई लोग इसके खिलाफ हो जाते हैं। मामला अदालत तक पहुंच जाता है। अब क्या होगा?. बेबी बचेगी .या जेल जाएगी? फिल्म भारतीय समाज में एक वर्जित-से विषय पर हैं। हमारे यहां सेक्स पर बातचीत करना अश्लील माना जाता है। यौन बीमारियां अन्य बीमारियों की तरह भी क्यों नहीं मानी जाती इसलिए कोई खुलकर इस बारे मे बात नहीं करना चाहता। फिल्म यौन विषयों पर चर्चा करने का संदेश देती है। वरुण शर्मा ने अपना कॉमिक चरित्र बहुत अच्छी तरह से निभाया है इसलिए फिल्म में हंसी के फव्वारे लगातार छूटते रहते है। अदालत का सीन भी दिलचस्प है।

शायद ये फिल्म सोनाक्षी सिन्हा के ठहरे हुए करियर को एक धक्का दे दे। हालांकि कुछ जगहों पर फिल्म ढीली रह गई है और सोनाक्षी भी आखिर में कुछ कुछ निस्तेज हो गई हैं। बादशाह बतौर कलाकार शुरू में आकर्षित करते है लेकिन अदालती दृश्य में कमजोर हो गएं हैं। वो इसलिए कि मेकअप और गेटअप के बिना हर स्टार असरहीन हो जाताहै। पर वकील की भूमिका में अन्नू कपूर अपनी छाप छोड़ गए हैं।

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