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Kabir Singh Movie Review and Rating: दीवानगी की हदों को पार करती शाहिद कपूर की ‘कबीर सिंह’

Kabir Singh Movie Review and Rating: टूटे दिल की कहानी 'कबीर सिंह' में शाहिद कपूर एक एल्कोहॉलिक सर्जिन की भूमिका में हैं। शाहिद कपूर फिल्म में कबीर का किरदार निभा रहे हैं। कबीर अपने कॉलेज के दिनों में प्रीति नाम की एक लड़की से प्रेम कर बैठता है।

Kabir Singh Movie Review: फिल्म के पोस्टर में शाहिद कपूर

 Kabir Singh Movie Review and Rating:बहुचर्चित तेलगु फिल्म अर्जनु रेड्डी का हिंदी रिमेक `कबीर सिंह’ का नाम अगर मजनू सिंह या रांझा सिंह होता तो बेहतर होता। इस मायने में कि लोग जल्द इसे देखने जाने के पहले ही समझ जाते कि माजरा क्या है। वो ये है कि `कबीर सिंह’ के एक प्रेम दीवाने की कथा है। ऐसे दीवाने की जो अपने प्रेम को पाने के लिए इतना दीवाना हो जाता है कि खुद का सर्वनाश करने पर उतारू हो जाता है। ऐसे में सिर्फ ये सवाल बचा रह जाता है कि इतना सब कुछ होने के बाद अंत में उसे प्रेमिका मिलती है या किसी और की हो जाती है। दूसरे शब्दों मे कह सकते हैं कि लैला मजनू की हुई या नहीं? हीर रांझा की हुई या नहीं? या जो सनम बर्बाद हुआ उसे सुधरने का कोई मौका मिलता है या नहीं।

`कबीर सिंह’ का कबीर एक डॉक्टर है। जब वो मेडिकल कॉलेज में पढ़ता है तो एक आवारा-लंपट की तरह व्यवहार करता है। हालांकि पढ़ाई लिखाई में तेज है लेकिन ठुकाई करने में भी आगे रहता है। उसे गुस्से पर काबू नहीं है और जरा सी बात पर एक फुटबॉल मैच में अपने एक विरोधी की इतनी पिटाई करता है उसे मुंह-नाक से खून बहने लगता है। उसके कॉलेज में नई छात्रा और भोली भाली प्रीति (कायरा आडवाणी) आती है जिसे देखकर वो क्लासरूम मे जाकर ऐलान कर देता है कि कोई लड़का उसकी तरफ आंख उठाकरे देखेगा भी नहीं क्योंकि वो मेरी है। प्रीति शुरु-शुरु में सहमी सहमी रहती है पर बाद में उसके साथ बाहर भी जाने लगती है। रातें भी गुजारने लगती है। इतना होने के बाद सिर्फ ये प्रश्न बचा रहता है कि कबीर की शादी प्रीति से होगी या नहीं। यहीं पर रोड़े अटक जाते हैं। प्रीति के पिता और परिवार के कारण।

अब तो कबीर एक दम दीवाना हो जाता है और शराब और दूसरे नशों का आदी हो जाती है। शराब के नश में सर्जरी करने लगता है जिसके कारण उसका मेडिकल लाइसेंस पांच साल के लिए रद्द हो जाता है। प्रीति की भी शादी हो जाती है। आगे क्या होगा? कबीर ऐसे ही रहेगा? देवदास की तरह। संक्षेप में दी गई इस कहानी से ही स्पष्ट हो जाता है कि `कबीर सिंह’ ऐसी फिल्म है जिसमें कुछ कुछ बीते वक्त की मान्यताएं सामने आती है। जिसमें एक तो ये है कि एक दबंग पुरुष चाहे जो भी करे वो सही, बशर्ते वो प्रेम में पागल है। दूसरे इसमें रैगिंग के जो दृश्य हैं उनसे इससे लगता है कि निर्दशक इस बात से अनजान है कि इसके बारे में सरकार कानून बना चुकी है। पर इतना कहने के बाद ये भी जोड़ना होगा कि ये फिल्म युवा वर्ग को पसंद आ सकती है क्योंकि कैंपस जीवन को यहां जिस तरह दिखाया गया है कि उसमें एक युवकोचित आकर्षण है।

चूंकि ये तेलगु फिल्म का हिंदी रीमेक है इसलिए इसमें कुछ असंगतियां आ गई हैं। जैसे मूल तेलगु फिल्म में जाति का मसला इस तरह उभरता है कि प्रेमी प्रेमिका की शादी के लिए परिवार इसलिए तैयार नहीं है कि दोनों अलग-अलग जातियों है। यहां लड़की के बारे में दिखाया गया है कि वो सिख है और लड़का हिंदू। इसलिए जाति वाला मामला नहीं है। लेकिन लड़की के पिता शादी का विरोध इसलिए करता है लड़का उसे लफंगा किस्मा का लगता है।…और लगेगा भी अगर लड़का उसके घर आकर उसकी बेटी को किस करे। जाति संबंधी कुछ संवाद यहां हैं जो ऐसे में बेमेल लगते हैं। शायद निर्देशक ने इधर ध्यान नहीं दिया होगा हिंदी फिल्म में वो जाति का मामला गोल कर गया है।

`कबीर सिंह’ का अगर कोई आकर्षण है तो वो शाहिद कपूर जिन्होंने ऐसे प्रेमी की भूमिका निभाई है जो अपने प्यार में लुट जाने के लिए बेहद उतावला है। प्रीति के इश्क में इतना डूबा हुआ कि अपनी प्यारी कुतिया का नाम भी प्रीति रख लेता है। बहरहाल इस फिल्म के आने के बाद क्या बॉलीवुड शाहिद का डूबता सितारा उठ पाएगा? `उड़ता पंजाब’ में भी उनकी भूमिका अच्छी थी लेकिन फिल्म नहीं चली। इसलिए शाहिद का सितारा गर्दिश में ही लटकता रहा। `कबीर सिंह’ से उनको आशा होनी चाहिए। जहां तक कियारा आडवाणी का मामला है फिल्म वे आधे समय तक तो चुपचुप सी रहीं और आधे के बाद बोलना शुरू किया तो उनके पास अच्छे संवाद नहीं थे। इसलिए इस फिल्म में वो शो पीस ही अधिक लगीं।

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