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Judgementall Hai Kya Movie Review and Rating: एक मर्डर दो संदिग्ध, अंत तक सीट न छोड़ने के लिए मजबूर करती है ‘जजमेंटल है क्या’

Judgementall Hai Kya Movie Review and Rating: कहानी में ट्विस्ट तब आता है जब एक दिन मर्डर हो जाता है। इल्जाम लगता है बॉबी और केशव पर। हालांकि दोनों पुलिस वालों के सामने एक-दूसरे को ही दोषी ठहराते हैं।

Judgemental Hai Kya Movie Review and Rating: फिल्म ‘जजमेंटल है क्या’ का एक पोस्टर।

Judgementall Hai Kya Movie Review and Rating: पहले इस फिल्म का नाम `मेंटल है क्या’ था। लेकिन कुछ संस्थाओं की तरफ से `मेंटल’ शब्द को लेकर हुई आपत्ति के बाद नाम हो गया `जजमेंटल है क्या’? इसका आरंभिक हिस्सा यानी मध्यांतर के पहले तो कॉमेडी-ससपेंस थ्रिलर की तरह है लेकिन उसके बाद सिर्फ ससपेंस ही ससपेंस है।

कंगना रनौत ने इसमें बॉबी एक ऐसी शख्स का किरदार निभाया है जो ‘सिरोसिस’ नाम की मानसिक बीमारी से ग्रसित है। बॉबी के साथ बचपन में एक हादसा हुआ था। उसके माता-पिता आपस में काफी झगड़ते थे। एक दिन जब बच्ची बॉबी ने अपनी मां को बचाने के लिए पिता को धक्का दिया तो दोनों छत से गिरकर मर गए। उसके बाद बॉबी काफी बदल गई। वो फिल्मों में एक डबिंग आर्टिस्ट बन गई। पर डबिंग के दौरान जिस फिल्मी सितारे की आवाज निकालती उसके कैरेक्टर के भीतर भी चली जाती और खुद को वैसा समझने लगती है। उसका एक बॉयफ्रेंड भी है जिसका सारा समय उसके किचन के लिए सामान लाने में लग जाता है।

इसी बीच बॉबी डबिंग के दौरान अपने एक सहकर्मी को चाकू मार देती है। इस कारण उसे कुछ दिनों के लिए मानसिक अस्पताल में रहना पड़ा है। जब वो वहां से लौटकर अपने अंकल के यहां आती है तो वहां एक विवाहित जोड़े को किरदार के रूप में केशव (राज कुमार राव) और रीमा (अमायरा दस्तूर) को देखती। एक दिन रीमा की हत्या हो जाती है। अब सवाल है कि हत्यारा कौन? बॉबी को शक है कि हत्या केशव ने की। लेकिन पुलिस उसकी बात नहीं मानती। केशव छूट जाता है। कुछ समय बाद बॉबी इंग्लैंड पहुंच जाती है। वहां उसे फिर से केशव मिलता है। रिश्ते की एक बहन के पति के रूप में।

बॉबी को शक होता है कि केशव अब उसकी बहन की हत्या करेगा। क्या सच में ऐसा होगा? या ये सब बॉबी के दिमाग में चलनेवाला फितूर है? फिल्म मानसिक रोगियों की दुनिया में प्रवेश करती है लेकिन ये संदेश भी देती है कि जरूरी नहीं कि मानसिक रोगी हमेशा गलत बात ही कहे। कंगना ने ऐसे चरित्र को बखूबी निभाया है जो मानसिक स्तर पर सिर्फ अपने खयालों में जीती है। लेकिन उसके भीतर हालात को भांपने की क्षमता है।

राजकुमार राव बतौर केशव शुरू से ही थोड़े रहस्यमय लगते है। आत्म नियंत्रित भी। क्या केशव का कोई अतीत है जो उस पर हमेशा हावी रहता है? आखिर में इसकी जानकारी मिलती है। फिल्म में जिमी शेरगिल भी हैं जो लंदन में नाटक के निर्देशक की भूमिका में है। रामायण की कथा भी फिल्म में बतौर नाटक की तरह है और बॉबी का ये डॉयलाग कि `अब सीता रावण को ढूंढेगी’ इस फिल्म की एक कुंजी बन जाती है।

हालांकि रामायण पर आधारित नाटक वाला प्रसंग अनावश्यक रूप से फैल गया है और केशव के अतीत से जुड़ी कहानी बहुत छोटी हो गई है। इसलिए आखिर में निर्देशकीय पकड़ थोड़ी ढीली हो जाती है। फिर भी कंगना के फैन इस फिल्म के दिवाने ही होंगे।

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