बेहतर नहीं है ''फोर पिलर्स ऑफ बेसमेंट'' फिल्म लेकिन हो सकती थी - Jansatta
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बेहतर नहीं है ”फोर पिलर्स ऑफ बेसमेंट” फिल्म लेकिन हो सकती थी

मनोवैज्ञानिक गुत्थियों और ससपेंस से भरी ये फिल्म कुछ बेहतर हो सकती थी अगर निर्देशक ने मनोविज्ञान पर जम कर काम किया होता।

निर्देशक-गिरीश नाइक के
कलाकार-दिलजान वाडिया, आलिया सिंह,,शावर अली, जाकिर हुसैन, रवि गदारिया, ब्रूना अब्दुल्ला 

मनोवैज्ञानिक गुत्थियों और ससपेंस से भरी ये फिल्म कुछ बेहतर हो सकती थी अगर निर्देशक ने मनोविज्ञान पर जम कर काम किया होता। ससपेंस फिल्म बनाने वाले हमारे निर्देशकों की सीमा ये है कि वो हीरो-हीरोइन के ढांचे से बाहर नहीं निकल पाते। इस फिल्म में भी यही हुआ। समीर (दिलजान वाडिया) एक मॉल में सुरक्षा आधिकारी है।

वो चुस्त और मुस्तैद है। उसका दिल इसी मॉल में स्थित दफ्तर में काम करनेवाली लड़की रिया (आलिया सिंह) पर आ जाता है। दोनों का प्रेम परवान चढ़े कि इसके पहले एक खौफनाक वाकया होता है। समीर का एक जुड़वा भाई भी है जो मानसिक रूप से अस्वस्थ है और वो मानसिक अस्पताल से भाग जाता है।

वो भी मॉल में पहुंचता है। इसी बीच रिया मॉल के बेसमेंट में फंस जाती है और जो भी उसके निकालने जाता है वो जिंदा नहीं रहता है। अब अकेली आशा है समीर पर, जो भाई की वजह से एक अजीब स्थिति में है। क्या वो अपनी प्रेमिका को बचा पाएगा, इसी सवाल पर सारी फिल्म टिकी है।

दिलजान वाडिया ने अच्छा काम किया है लेकिन बात सिर्फ अभिनय की नहीं है। हीरोगिरी के चक्कर में मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्ति को लगभग खलनायक बना देना कहां तक जायज और संवेदनशीलता है? ये प्रश्न निर्दशक को खुद अपने आप से भी पूछना चाहिए। निर्देशक को मनोविज्ञान का गहरा अध्ययन करना चाहिए था।

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