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Commando 3 Moview Review: भटकते भटकते कमांडो कहां पहुंचा?

कभी कभी अति उत्साह में कुछ ऐसा हो जाता है जो अच्छी चीज को भी कुछ ओछा बना देता है। ‘कमांडो 3’ में भी कुछ ऐसा ही होता है। शुरुआत में ये दिखाने के लिए कि करण वीर डोगरा (विद्युत जामवाल) नाम का इंटेलिजेंस यानी खुफिया एजेंट धांसू शख्स है, वो गुरुग्राम यानी गुड़गांव में […]

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कभी कभी अति उत्साह में कुछ ऐसा हो जाता है जो अच्छी चीज को भी कुछ ओछा बना देता है। ‘कमांडो 3’ में भी कुछ ऐसा ही होता है। शुरुआत में ये दिखाने के लिए कि करण वीर डोगरा (विद्युत जामवाल) नाम का इंटेलिजेंस यानी खुफिया एजेंट धांसू शख्स है, वो गुरुग्राम यानी गुड़गांव में कुछ पहलवानों की जमकर धुलाई करता है। मुगदरों से उनको ऐसे पीटता है मत पूछिए। लेकिन इस जबरदस्त धुलाई का कारण ये है कि एक पहलवान एक स्कूली लड़की के स्कर्ट को धीरे धीरे ऊपर खींचता है। वैसे तो ये दृश्य ये दिखाने के लिए है कि पहलवान स्कूली लड़कियों के साथ छेड़खानी कर रहा है पर ये थोड़ा असंवेदनशील जरूर है। इसीलिए इस पर सोशल मीडिया में विवाद भी शुरू हो गया है।

अब इस विवादास्पद पहलू को छोड़ भी दें तो ‘कमांडो 3’ एक औसत और कामचलाउ एक्शन फिल्म है। ये क्यों एक औसत सी फिल्म होकर रह गई है ये समझने के लिए इसकी कहानी को जान लेना जरूरी है। फिल्म के शुरू में ये दिखाया गया है कि कुछ हिन्दू लड़के अपना धर्म बदलकर मुसलमान हो गए हैं और भारत में आतंक फैलाने में लगे एक विदेशी मुस्लिम आतंकवादी सरगने के निर्देश पर काम कर रहे हैं। भारतीय खुफिया तंत्र का अनुमान है कि ये सरगना इंग्लैंड में रह रहा है। उसे धर दबोचने के लिए करण को लंदन भेजा जाता है। फिल्म में हीरोइन भी जरूरी है इसलिए भावना रेड्डी (अदा शर्मा) भी साथ जाती हैं। दोनों, ये पता लगा लेते हैं कि आतंकवादियों का सरगना बुराक़ अंसारी (गुलशन देवैया) नाम का एक आदमी है जो एक रेस्तरां चलाता है। वो बड़ा खूंखार है। बीबी से तलाक हो चुका है पर बेटे से काफी प्यार करता है।

पता चलता है बुराक अंसारी दशहरे के दिन भारत के पांच बड़े शहरों में बड़े धमाकों की योजना बना रहा है। उसे कैसे नाकाम करना है इसी में करण लग जाता है। उसके साथ दो ब्रिटिश खुफिया एजेंट भी है। एक तो मल्लिका (अंगिरा धर) जो फर्राटे से हिन्दी बोलती है, दूसरा है अरमान (सुमित ठाकुर)।

इसमें कोई संदेह नहीं कि ये फिल्म विद्युत जामवाल को फिर से एक बड़े एक्शन हीरो के रूप में स्थापित करती है। गुड़गांव से लेकर लंदन वाले एक्शन सीन दमदार है। मगर इस बात को छोड़ दें तो साथ में ये भी कहना पड़ेगा कि फिल्म काफी जगह भटक जाती है। एक तो ये दिखाना की इंग्लैंड कि खुफिया संस्था एम आई (मिलिट्री इंटेलिजेंस) बुराक अंसारी का साथ दे रही है अपने में विश्वसनीय नहीं लगता। अरे भाई निदेशक जी, पाकिस्तान के आईएसआई और ब्रिटेन के मिलिट्री इंटेलिजेंस में कुछ तो फर्क रखो। फिर करण वीर डोगरा पूरे ब्रितानी सत्ता को चुनौती देकर अंसारी को हेलीकॉप्टर से उठा लेता है ये तो और हास्यास्पद हो गया है।
फिल्म में अदा शर्मा और अंगिरा धर शो पीस की तरह हैं। हां, बतौर खलनायक गुलशन देवैया एक दमदार अभिनेता के रूप में सामने आते हैं। उनकी हर अदा में वो आक्रामकता है जो इस तरह की फिल्मों में होनी चाहिए। ये भी कहने को दिल चाहता है कि ये फिल्म कुछ कुछ अक्षय कुमार वाली बेबी की तर्ज पर है। फर्क ये है कि उसमें खलनायक को भारत लाना है और इसमें आखिर में उसे मार देना है।

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