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Chhichhore Movie Review and Rating: हारो तब भी जज्बा बनाए रखो, असफलताओं से लड़ना सिखाती है ‘छिछोरे’

Chhichhore Movie जिस एक और बात को हर दर्शक याद रखेगा वो ये कि फिल्म के लगभग अंत में तीन दृश्य एक दूसरे के साथ चलते हैं। एक जिसमें शतरंज का खेल है, दूसरा जिसमें रिले रेस है और तीसरा जिसमें अनी बॉस्केट बॉल कॉम्पिटिशन में भाग ले रहा है।

Chhichhore movie review: फिल्म छिछोरे का एक पोस्टर।

 Chhichhore Movie Review: इसमें कई सारी चीजें हैं- लवस्टोरी है, पिता और पुत्र के प्रति लगाव है, आत्महत्या की कोशिश है, अस्पताल है, क्रिकेट, शतरंज. वेटलिफ्टिंग, बॉस्केटबॉल जैसे कई खेल हैं, दोस्ती है, दोस्तों की मस्ती है। कॉलेज की जिंदगी है, हॉस्टल लाइफ के मजे हैं, कॉमेडी है, टेंशन है, फ्लैशबैक है। कोई कह सकता है कि एक फिल्म में इतनी सारी चीजें! फिर तो स्टोरी लाइन निर्देशक के हाथ से फिसल गई होगी?

जी नहीं, ऐसा नही हुआ। उल्टे इतना सारा कुछ होने के बावजूद ये कसी हुई फिल्म है और इसका कोई ऐसा लम्हा नहीं है जो ठहरा हुआ है। हर क्षण कुछ न कुछ ऐसा होता रहता है जो बांधे रखता है। पर सबसे बड़ी बात है इसकी फिलोसॉफी। `छिछोरे’ बहुत साफ साफ कहती है लूजर होने की साइकोलॉजी गलत है। असफल होना लूजर होना नहीं है। जिंदगी जज्जे का नाम है। हार गए तब भी जज्बा बरकरार रखो। जिंदगी मे असफलता भी मिलती है। लेकिन इससे इतने निराश न हो जाएं कि अपनी जीवन लीला समाप्त करने की सोचें। असफलता को अपने ऊपर हावी न होने दें। खासकर वे बच्चे जो अपने करियर को लेकर चिंतित रहते हैं।

कहानी अनिरूद्ध उर्फ अनी (सुशांत सिंह राजपूत) और उसके बेटे राघव (मोहम्मद समद) की है। अनी का अपनी पत्नी माया (श्रद्धा कपूर) से तलाक हो चुका है लेकिन बेटे की वजह से दोनों के तार कभी कभार जुड़ जाते हैं। राघव ने इंजीनियरिंग की एंट्रेंस परीक्षा दी है और इस तनाव में है कि वो इसमें सफल होगा या नहीं। और जब नतीजा आता है तो मालूम होता है कि उसका तो नहीं हुआ। मानसिक तनाव में आकर एक बड़ी बिल्डिंग से छलांग लगा देता है। उसे अस्पताल ले जाया जाता है। बचने की उम्मीद कम है। बेहोश है। उसकी बेहोशी के इसी आलम में अनी उसे अपने होस्टल लाइफ की कहानी सुनाता है। फ्लैशबैक शुरू होता है और आता जाता रहता है। अनी बताता है कि कैसे जिस होस्टल मे वो रहता था उसे लूजर्स का माना जाता है। और इसी दौरान अनी उसे अपने पुराने दोस्तों के बारे मे बताता है जो उसके होस्टल में थे और फिसड्डी समझे जाते थे।

फिर कहानी आगे बढ़ती कि वे किस तरह अपने कॉलेज के स्पोर्ट्स कॉम्पिटिशन में भाग लेते हैं और वहां क्या क्या होता है। वो पुराने दोस्त भी अनी के बेटे की खबर पाकर अस्पताल आते हैं। सवाल है कि अनी के बेटे राघव का क्या होगा। क्या वो बचेगा? फिल्म की एक बड़ी खूबी ये है कि इसमें कोई विलेन नही है और सारे चरित्र एक टीम की तरह हैं। और सबके चरित्र की अहमियत है। सुशांत सिंह राजपूत और श्रद्धा कपूर बड़े स्टार जरूर हैं लेकिन इसके हीरो हीरोइन नहीं हैं। अनी और माया के रूप में उन दोनों के प्रेम प्रसंग जरूर हैं लेकिन उतनी ही जितनी कहानी को जरूरत है। सुशांत एक प्रौढ़ पिता और युवा विद्यार्थी – दोनों ही भूमिकाओं मे काफी नियंत्रित है। पिता के रूप में अपनी बढ़ी दाढ़ी में वे जितने संजीदा दिखते हैं विद्यार्थी के रूप मे उतने ही शरारती।

श्रद्धा भी मां और छात्रा – दोनों ही भूमिकाओं में बहुत संतुलित हैं। वरुण शर्मा का किरदार एक छात्र के रूप में चुहलों से भरा है और उनकी हर एंट्री हंसी के फव्वारे लेकर आती है। हालांकि मध्यांतर के बाद जिन दृश्यों मे वे मूछों के साथ हैं वो थोड़ी डल हो गई है। मूंछों के साथ उनकी चुहलबाजी में वैसी जान नहीं है क्योंकि चेहरे के ऊपर भाव छिप जाते हैं। निर्देशक नीतेश तिवारी ने अतीत और वर्तमान दोनों के बीच आवाजाही बनाए बनाए रखी है और अनी-माया-दोस्तों के कॉलेज लाइफ और अस्पताल के दृश्यों में कई शिथिलता नहीं आने दी है।

और हां, जिस एक और बात को हर दर्शक याद रखेगा वो ये कि फिल्म के लगभग अंत में तीन दृश्य एक दूसरे के साथ चलते हैं। एक जिसमें शतरंज का खेल है, दूसरा जिसमें रिले रेस है और तीसरा जिसमें अनी बॉस्केट बॉल कॉम्पिटिशन में भाग ले रहा है। तीनों फिल्म मे ऐसा माहौल बनाते हैं दर्शक `आगे क्या होगा’ की उत्सुकता में सांस रोके रहता है।

नीतेश तिवारी ने `दंगल’ में हीरो की इमेज बदल दी थी और आमिर खान एक उम्रदराज पिता के रूप मे केंद्रीय चरित्र बने थे। `छिछोरे’ में भी ये काम उन्होनें थोड़ा अलग तरीके से किया है। ये भी नीतेश की एक बड़ी फिल्म मानी जाएगी. इस फिल्म में सिर्फ एक बात खटकती है। वो है इसका नाम। जब फिल्म में छिछोरेपन का कहीं नामों निशान नहीं है तो फिर `छिछोरे’ नाम क्यों रखा? इसी बात पर सौ में से एक नंबर कट जाएगा और निन्यानबे अंक ही मिलेंगे।

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