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Budhia Singh Born to Run Movie review: भारत को समझना चाहते हैं तो जरूर देखें फिल्म

बुधिया सिंह बॉर्न टु रन एक अलग फिल्म है। अगर आप भारत को समझना चाहते हैं तो ये फिल्म आपको जरूर देखनी चाहिए।

Budhia Singh Born to Run quick review

Budhia Singh movie director: Soumendra Padhi
Budhia Singh movie cast: Manoj Bajpayee, Mayur Patole and Tillotama Shome

एक और खेल-फिल्म, जो अपने में ट्रेजडी भी है। ओडिसा के बुधिया सिंह का नाम कुछ साल पहले एक चमत्कारिक धावक के रूप में उभरा जिसने चार साल और कुछ महीने का होकर भी लंबी दौड़ या मैराथन में एक कीतिर्मान स्थापित किया। एक गरीब परिवार में जन्मे बुधिया को उसकी मां को कुछ पैसों के लिए के बेच दिया था और जिसे बिरंची दास नाम के एक जुडो प्रशिक्षक ने छुड़वाया और अपने प्रशिक्षण से कुछ ही समय में नामी धावक बना दिया। पर इतनी कम के उम्र के बच्चे का दौड़ना मीडिया और बाकी समाज में विवादास्पद भी बना और आगे चककर बिरंची दास की हत्या भी हो गई। हालांकि माना ये जाता है कि हत्या किसी और वजह से हुई थी। जो भी हो, बुधिया और विरंची की कहानी को निर्देशक सौमेंद्र पाधी ने एक बेहतरीन फिल्म रूप में दिखाया है। विरंची की भूमिका निभानेवाले मनोज वाजपेयी को छोड़कर फिल्म में कोई स्टार नहीं है और बॉक्स ऑफिस पर शायद इसे रिकॉर्ड तोड़ सफलता नहीं मिले, फिर भी अपनी तरह की एक शानदार फिल्म है।

फिल्म बुधिया (जिसकी भूमिका मयूर पटोले ने बहुत अच्छी तरह से निभाई है) की नैसर्गिक प्रतिभा और कोच यानी प्रशिक्षक बिरंची के आपसी रिश्ते को भी दिखाती है। बिरंची अनाथ बच्चों को जुडो सिखाता है और उनके लिए एक संस्था चलाता है। वह बुधिया को अपने पास लाता है। सब कुछ ठीक ठीक चल रहा है लेकिन जब एक दिन अकस्मात वो देखता है कि बुधिया में दौड़ने की जन्मजात प्रतिभा है तो वह उसकी प्रतिभा को सार्वजनिक रूप से सामने लाने में लग जाता है । कुछ लोग उसका समर्थन करते है पर सरकार और बाल विकास से जुड़े मंत्री और अधिकारी उसका विरोध भी करने लगते हैं। और जब बुधिया पुरी से भुवनेश्वर की सत्तर किलो मीटर की दूरी करने के लिए दौड़ना शुरू करता है (वह पैंसठ किलोमीटर दौड़ भी लेता है) तो एक तरफ तो उसे भारी जनसमर्थन मिलता है तो दूसरी तरफ राज्य सरकारी की सरकारी मशीनरी इस दौड़ के खिलाफ अभियान छेड़ देती है। बिरंची को घेरने की साजिशें शुरू हो जाती हैं।

फिल्म इन सारे मामलों को पूरी गहराई से दिखाती है और दशर्कों को बांधे रखती है। मनोज वाजपेयी एक बहुत अच्छे अभिनेता तो हैं उनके बारे में क्या कहना लेकिन बुधिया की जो भूमिका मयूर पटोले ने निभाई है वह लंबे समय तक याद रखी जाएगी। बुधिया एक ऐसे बच्चे के रूप में उभरता है जो बेहद सीधी सीधा है उसके भीतर मासूमियत है। और जब उसे बिरंची दास से दूर किया जाता है और एक खेल-होस्टल में भेजा जाता है तो वह वहां बेहद अकेला हो जाता है। फिल्म रियो ओलंपिक के ठीक पहले रिलीज हुई है इसलिए भी संभवत: इसमें ज्यादा लोगों की रूचि हो।

सौमेंद्र पाधी की ये फिल्म चक दे इंडिया’ या मेरी कॉम’ की तरह भले बॉक्स ऑफिस पर धन न बटोरे पर एक स्तरीय फिल्म के रूप में याद रखी जाएगी। फिल्म का पाश्वर्संगीत बहुत प्रभावशाली है।

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