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Movie Review ‘ब्रदर्स’: दो भाइयों की लड़ाई

यह फिल्म दो भाइयों की लड़ाई है। ये सौतेले भाई हैं और यह भी कि ये लड़ाई खेल के मैदान में है।

यह फिल्म दो भाइयों की लड़ाई है। ये सौतेले भाई हैं और यह भी कि ये लड़ाई खेल के मैदान में है। पर ये साधारण नहीं बल्कि खूनी खेल है। ऐसा खेल जो भारत में नहीं होता और जिसे अपने देश का कानून मान्यता भी नहीं देता। इसलिए कि इस खेल में जान भी जा सकती है।

पर बॉलीवुड कुछ भी करा सकता है तो ऐसा खेल भारत में होता हुआ क्यों नहीं दिखा सकता जो यहां होता ही नहीं है। लगे हाथ यह भी जान लेना चाहिए कि ह्यब्रदर्सह्ण नाम की यह फिल्म हॉलीवुड फिल्म ह्यवारियरह्ण का हिंदी रूपांतरण है। जब अमेरिकी-हिंदी में बनानी है तो कुछ न कुछ भारत का भी अमेरिकीकरण करना होगा। है कि नहीं? सो मिक्स मार्शल आर्ट नाम के इस खेल को भारत में होता हुआ दिखा दिया।

दो भाई हैं। डेविड (अक्षय कुमार) और मोंटी (सिद्धार्थ मल्होत्रा)। दोनों के पिता गैरी (जैकी श्रॉफ) एक हत्या के अपराध में जेल काटकर लौटते हैं। हत्या उन्होंने अपनी पत्नी मारिया (शेफाली शाह) की की थी। शराब के नशे में और अनजाने। गैरी की प्रेमिका भी थी जिससे बेटा हुआ मोंटी। गैरी अपनी जवानी में मिक्स मार्शल आर्ट का फाइटर रह चुका है। डेविड एक स्कूल में फिजिक्स पढ़ाता है लेकिन कभी-कभी फाइटिंग भी करता है और वह इसलिए कि उसकी बेटी को एक गंभीर बीमारी है और उसके इलाज के लिए मोटी रकम चाहिए।

मोंटी भी फाइटिंग करता है। फिर एक दिन ऐसा होता है कि पीटर ब्रिगेंजा नाम का एक पैसे वाला शख्स एलान करता है कि वह मिक्स मार्शल आर्ट की प्रतियोगिता भारत में कराएगा और विजेता को नौ करोड़ मिलेंगे। इस प्रतियोगिता में विदेशी फाइटर भी भाग लेंगे। हालात ऐसे बनते हैं कि प्रतियोगिता के फाइनल में डेविड और मोंटी ही आमने-सामने होते हैं। सवाल है कि कौन जीतेगा और क्या जीतने के लिए वे दोनों सारी हदें पार कर देंगे? यानी मारना हुआ तो मार भी देंगे?

सिद्धार्थ की ‘ब्रदर्स’ को बनाएगी सुपरहिट  मध्यांतर के पहले वाला हिस्सा बहुत धीमी गति से चलता है और कई फ्लैश बैक भी आते हैं। यह लंबा भी हो गया है। इस हिस्से को थोड़ा संपादित करने की जरूरत थी। लेकिन बाद वाला हिस्सा रोमांच से भरा है और आगे क्या होगा वाली उत्सुकता भी बनी रहती है। फाइटिंग वाले दृश्य भी सस्पेंस से भरे हैं। सिद्धार्थ मल्होत्रा ने इस फिल्म के लिए बदन पर काफी चर्बी चढ़ाई है और वे फाइटर की तरह चौड़े दिखते भी हैं।

बस एक ही चीज खटकती है कि वे हमेशा एक ही तरह की मुखमुद्रा बनाए रखते हैं जिससे चेहरे पर जरूरी विविधता नहीं रहती। अक्षय कुमार की दाढ़ी बढ़ी है जिसमें सफेदी भी दिखती है। उनका चेहरा खुरदरा है जिसके कारण उनका चरित्र भी प्रामाणिक हो गया है। लगता है कि ये आदमी मिजाज से लड़ाका नहीं है पर जरूरत के लिए लड़ रहा है। डेविड को अपने भाई से लड़ना है और हराना है।

पर साथ ही यह भी दिखाना है कि वो अपने भाई को सिर्फ हराने में दिलचस्पी रखता है उसे पूरी तरह फोड़ देने में नहीं। इसलिए रिंग में उसका मनोवैज्ञानिक तनाव भी साफ-साफ दिखता है। जोरदार घूंसा मारे या न मारे? आखिर भाई तो भाई होता है। जैक्लीन फर्नांडीज ने डेविड की पत्नी का किरदार निभाया है। लेकिन उनके पास करने के लिए दो ही चीजें हैं-बेटी की बीमारी से उदास होना और पति की जीत के मौके पर होठों पर लंबी मुस्कुराहट लाना।

ये दोनों काम उन्होंने बखूबी किए हैं। जैकी श्रॉफ की भूमिका थोड़ी जटिल और टेढ़ी है। एक ऐसे आदमी की, जो अपराध का भाव भी लिए हुए है और अपने बेटों की जीत भी चाहता है। पर फाइनल में कौन जीतेगा-इसे लेकर उसके भीतर जो द्वंद्व और तनाव है वह दिल को छूने वाला है। निर्देशक ने एक और मसाला डाला है- करीना कपूर का आइटम नृत्य। लेकिन ह्यमेरी सौ टका तेरी हैह्ण शायद वैसा धमाका नहीं मचा पाएगा जैसा फिल्मों में पहले आ चुके कुछ आइटम नंबर ने मचाया था। लड़ाई में कुछ कारतूस फुस्स भी हो जाते हैं।

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