ताज़ा खबर
 

‘अकीरा’ – एक और मर्दानी

निर्देशक इसे फिल्म को एक दक्षिण भारतीय मुहावरे बनाई है जिसमें अपनी तरह की फॉर्मूलेबाजी होती है। कई तरह की अतिनाटकीयताएं इसमें हैं।

Akira फिल्म में सोनाक्षी सिन्हा मुख्य भूमिका में हैं।

फिल्म समीक्षा – रवींद्र त्रिपाठी
निर्देशक- एआर मुरुगादॉस
कलाकार- सोनाक्षी सिन्हा, कोंकणासेन शर्मा, अनुराग कश्यप, कोकणा सेन
‘अकीरा’ तमिल फिल्म ‘मौना गुरु’ का हिंदी रुपांतरण है। पर एक फर्क है। मूल फिल्म हीरो केंद्रित है।  पर ‘अकीरा’ हीरोइन केंद्रित है। यानी इसमें कोई हीरो नहीं है। सोनाक्षी सिन्हा ने इसमें अकीरा  शर्मा नाम की एक ऐसी नौजवान लड़की की भूमिका निभाई है जो अपने मूल स्वभाव में अन्याय के खिलाफ लड़नेवाली है और गुंडो और बदमाशों की धुलाई करनेवाली भी। फिल्म के निर्देशक दावा कर सकते हैं कि सोनाक्षी सिन्हा इस फिल्म के बाद पर्दे पर जब ‘खामोश’ कहेंगी तो दर्शकों को उनके पिता शत्रुध्न सिन्हा की याद नहीं आएगी,। हालांकि सच में ऐसा होगा कि नहीं ऐसा  कहना मुश्किल है। फिल्म ‘मर्दानी’ में रानी मुखर्जी ने भी एक दमदार पुलिस अधिकारी की भूमिका निभाई थी। पर वे सिंघम नहीं बन सकीं। हमारी फिल्मों का ढांचा कुछ ऐसा है कि पुरुष ही ‘मर्द’ के रूप में स्वीकार किए जाते हैं। हीरोइनें ऐसी भूमिका में उस तरह की सफलता कम ही हासिल कर पाती हैं। पर निश्चित रूप से नहीं कह सकते। दर्शक का क्या पसंद करते हैं इसका पहले से अनुमान करना कठिन होता है।

‘अकीरा’ की दूसरी खासियत अनुराग कश्यप का खलनायक अवतार है। और ये तो बिना शक के कहा जा सकता है कि खलनायक के रूप मे उनकी भूमिका ‘बोंबे वेलवेट’ में करण जौहर की भूमिका से बेहतर है। कश्यप मूल रूप से निर्देशक है पर हर निर्देशक के मन में नायक न सही खलनायक बनने का ख्वाब बैठा होता है। (कृपया निर्देशक गण बुरा न मानें)। हां तो, कह रहा था कि अनुराग कश्यप ने पुलिस अधिकारी राणे की भूमिका निभाई है। राणे एक ऐसा पुलिस अधिकारी है जो खुद पैसे बनाने से लेकर खून तक के अपराधों में संलिप्त है। उसके साथ ऐसे पुलिसकर्मियों की मंडली है जो हर गुनाह में उसका साथ देती है। पर दुनिया में सिर्फ बेइमानी नही है। ईमानदार लोग या पुलिस अधिकारी भी हैं। ऐसी ही एक ईमानदार पुलिस अफसर है राबिया, जो गर्भवती है। राबिया एक तहकीकात कर रही है जिसमें राणे फंस सकता है। संयोग ऐसा बनता है कि अकीरा भी इससे जुड़ जाती है। और फिर शूरू होता है शिकारी और शिकार का खेल।

निर्देशक इसे फिल्म को  एक दक्षिण भारतीय मुहावरे बनाई है जिसमें अपनी तरह की फॉर्मूलेबाजी होती है। कई तरह की अतिनाटकीयताएं इसमें हैं। निर्देशक का पूरा जोर अपनी हीरोइन को दमदार दिखाने पर है। वैसे सोनाक्षी सिन्हा ने जिस अकीरा के किरदार को निभाया है उसका बचपन कई बीहड़ परिस्थितियों में एक छोटे से स्थान (जोधपुर) बीतता है। अकीरा बचपन में ही मार्शल आर्ट सीखती है क्योंकि उसे लग गया था औरतों के साथ अपने यहां क्या सलूक होता है। । पिता (अतुल कुलकर्णी) से उसे प्रेरणा और मदद मिलती है। बचपन में एक बार गिरफ्तार भी होती है। और जब वह बड़ी होती है तो वह मुंबई आ जाती है। अब उसमें उसमें पर्याप्त हिम्मत है और बड़ो बड़ों से टकराने की ताकत भी। पर इसी वजह से वह झमेले में भी फंसती है। वह मनोरोगियों के अस्पताल में भी पहुंच जाती है। पर उसके भीतर लड़ने की जो ताकत है वह बरकरार रहती है।  सोनाक्षी सिन्हा ने इस भूमिका को निभाते हुए कई जरूरी बारीकियों को पकड़ा है और दिलेर चरित्र के रोल में वह फबती भी हैं। उनके संवादों में जुमलेबाजी भी है जो कई जगहों पर असरदार भी हैं।

पर शुरुआती रोचकता के बाद फिल्म दूसरे हिस्से में कमजोर हो जाती है। फिर ये समझ में नहीं आता कि ईसा मसीह से किसी चऱित्र की तुलना करने का क्या मतलब है? कई दक्षिण निर्देशक अपने फॉर्मूले में इस तरह फंस जाते हैं कि उससे बाहर निकलने की कोशिश भी नहीं करते। इस फिल्म के साथ भी ऐसा ही हुआ है। फिर भी सोनाक्षी के फैन क्लब को, जिसकी अच्छी खासी संख्या है, ये फिल्म अच्छी लग सकती है।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App