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युद्ध के बाद युधिष्ठिर भी हुए थे कंगाल, यज्ञ करने के लिए भी नहीं बचा था धन

महाभारत युद्ध के बाद पांडवों के पास अश्वमेध यज्ञ करके के लिए भी धन नहीं बचा था। तब महर्षि वेदव्यास के कहने पर पांडव हिमालय से धन लेकर आए।

Author नई दिल्ली | April 15, 2019 12:00 PM
युधिष्ठिर।

महाभारत की कथा जितनी अधिक पौराणिक है उतनी ही अनोखी भी है। वैसे तो आप महाभारत के सभी पात्र को जितना समझने की कोशिश करेंगे आपको उसमें उतना ही रहस्य नजर आएगा। लेकिन आप हम महाभारत के जिस पात्र के बारे में बताने जा रहे हैं, वे एकलौते ऐसे थे जिन्हें भगवान कृष्ण के अलावा महाभारत में होने वाली हर घटना का पहले से पता था। साथ ही यह वह पात्र है कि जिसके बारे में महाभारत में अलग से बहुत ज्यादा उल्लेख नहीं मिलता है। महाभारत का यह पात्र युधिष्ठिर है। कहते हैं कि महाभारत के युद्ध के बाद युधिष्ठिर भी कंगाल हो गए थे। साथ ही उन्हें यज्ञ करने के लिए भी धन नहीं बचा था। आगे जानते हैं वह प्रसंग।

महाभारत युद्ध के बाद पांडवों के पास अश्वमेध यज्ञ करके के लिए भी धन नहीं बचा था। तब महर्षि वेदव्यास के कहने पर पांडव हिमालय से धन लेकर आए। हस्तीनपुर का राजा बनाने के बाद एक दिन युधिष्ठिर से मिलने महर्षि वेदव्यास आए। उन्होंने युधिष्ठिर से कहा कि अपने कुल के भाई-बंधुओं की शांति के लिए तुम्हें अश्वमेध यज्ञ करना चाहिए। महर्षि वेदव्यास की बात सुनकर युधिष्ठिर ने कहा कि मेरे पास इस समय दक्षिणा में दान देने जितना भी धन नहीं है तो मैं इतना बड़ा यज्ञ कैसे कर सकता हूं।

तब महर्षि वेदव्यास ने बताया कि पूर्व के समय में इस समूचे पृथ्वी के राजा महर्षि मरुत थे। उन्होंने एक बहुत बड़ा यज्ञ किया था। उस यज्ञ में उन्होंने ब्राह्मणों को बहुत सोना दान में दिया था। सोना बहुत अधिक होने के कारण उस ब्राह्मण उसे अपने साथ नहीं ले जा सके। कहा जाता है कि वह सोना आज भी हिमालय पर है। उस धन से अश्वमेघ यज्ञ किया जा सकता है। युधिष्ठिर, महर्षि वेदव्यास द्वारा बताए गए इस कार्य को वैसा ही करने का निर्णय लिया।

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