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Ramadan 2019: जानिए, क्यों रखा जाता है ‘रोजा’? ये है रमजान से जुड़ी मान्यताएं

दरअसल इस्लाम धर्म के मुताबिक रमजान के महीने को नेकियों आत्मनियंत्रण और खुद पर संयम रखने का महीना माना जाता है। मान्यता है कि इस दौरान रोजे रख भूखे रहने से दुनियाभर के गरीब लोगों की भूख और दर्द को समझा जाता है।

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Ramadan 2019: पवित्र रमजान के महीने की शुरुआत हो गई है। इस महीने में सारे मुसलमान रोजा रखते हैं। रोजा में लोग बिना खाए-पिए पूरे 29-30 दोनों तक रहते हैं। रोजे के दौरान सभी तय वक्त पर सुबह को सहरी और शाम को इफ्तार करते हैं। कहते हैं कि सदियों से सारे मुसलमान रमजान के पूरे महीने भूखे-प्यासे रहकर रोजे रखते हैं। परंतु क्या आप जानते हैं कि आखिर क्यों हर मुसलमान पूरे 30 दिनों तक भूखा-प्यासा रहता है और रोजे रखता है? यदि नहीं तो आगे इसे जानिए।

दरअसल इस्लाम धर्म के मुताबिक रमजान के महीने को नेकियों आत्मनियंत्रण और खुद पर संयम रखने का महीना माना जाता है। मान्यता है कि इस दौरान रोजे रख भूखे रहने से दुनियाभर के गरीब लोगों की भूख और दर्द को समझा जाता है। साथ ही कहा यह भी जाता है कि रोजे के दौरान न बुरा सुना जाता है और न बुरा देखा जाता है। इसी वजह से हर मुसलमान रोजा रख खुद को बाहरी और अंदरूनी तरफ से पाक रखता है। बता दें कि रमजान के महीने को तीन भागों में बांटा जाता है। दस दिन के पहले भाग को रहमतों का दौर बताया गया है। साथ ही दस दिन के दूसरे भाग को माफी का दौर कहा जाता है। इसके अलावा दस दिन के तीसरे भाग को जहन्नुम से बचाने का दौर पुकारा जाता है।

वहीं इस्लाम धर्म में अच्छे इंसान को बखूबी परिभाषित किया गया है। जिसके अनुसार इसके लिए केवल मुसलमान होना ही काफी नहीं है बल्कि बुनियादी पांच बातों को अमल में लाना आवश्यक है। पहला ईमान, दूसरा नमाज, तीसरा रोजा, चौथा हज और पांचवां जकात। इस्लाम में बताए गए ये पांच कर्तव्य इस्लाम को मानने वाले इंसान से प्रेम-सहानुभूति, सहायता और दर्द की प्रेरणा स्वतः पैदा कर देते हैं। रोजे को अरबी में सोम कहते हैं। जिसका मतलब है रोकना। रोजा यानि तमाम बुराइयों से परहेज करना। लूनर कलेंडर के अनुसार नौवें महीने यानि रमजान को 610 ईस्वी में पैगंबर मुहम्मद पर कुरान प्रकट होने के बाद मुसलमानों के लिए पवित्र घोषित किया गया था। कहते हैं कि तभी से दुनियाभर के मुसलमान पहली बार कुरान उतरने की याद में पूरे महीने रोजे रखते हैं।

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