भगवान शिव को क्यों कहा जाता है नीलकंठ? जानिए

भगवान शिव को सृष्टि का पालनहार भी कहा जाता है। उनके गले में नाग, हाथों में डमरू और त्रिशूल होता है।

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भगवान शिवजी का सांकेतिक फोटो

भगवान शिव को देवों का देव महादेव कहा जाता है। भगवान शिव को सृष्टि का पालनहार भी कहा जाता है। उनके गले में नाग, हाथों में डमरू और त्रिशूल होते हैं। इन्हें कई नामों से जाना जाता है। उनमें से कुछ नाम हैं- महादेव, भोलेनाथ, शंकर, महेश, रुद्र और नीलकंठ। इन सभी में नीलकंठ उनका एक प्रसिद्ध नाम है। आइए, आज हम यह जानते हैं कि भगवान शिव को नीलकंठ क्यों कहा जाता है।

शास्त्रों के अनुसार, देवताओं और राक्षसों के बीच एक बार अमृत मंथन हुआ था। यह मंथन दूध के सागर यानी क्षीरसागर में हुआ था। इस मंथन से लक्ष्मी, शंख, कौस्तुभमणि, ऐरावत, पारिजात, उच्चैःश्रवा, कामधेनु, कालकूट, रम्भा नामक अप्सरा, वारुणी मदिरा, चन्द्रमा, धन्वन्तरि, अमृत और कल्पवृक्ष ये 14 रत्न निकले थे। इनमें से देवता अपने साथ अमृत ले जाने में सफल हुए थे। लेकिन मंथन से 14 रत्न में से विष भी निकला था। माना जाता है यह विष इतना खतरनाक था कि इसकी एक बूंद पूरे संसार को खत्म कर सकती थी। इस बात से परेशान सभी देवता और दानव हल ढूंढ़ने विष के घड़े को लेकर भगवान शिव के पास पहुंचे।

भगवान शिव ने इसका हल निकाला और वह खुद विष का पूरा घड़ा पी गए। लेकिन भगवान शिव ने ये विष गले से नीचे नहीं उतारा। कहा जाता है कि भगवान शिव ने इस विष को गले में ही रोक कर रखा। इसी वजह से उनका कंठ नीले रंग का हो गया, जिसके बाद उनका नाम नीलकंठ पड़ा।

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