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क्यों शादी के दिन घोड़ी पर दुल्हन लेने जाता है दूल्हा

मान्यता है कि भगवान श्री कृष्ण और रुकमणी के विवाह के समय भी भगवान कृष्ण को युद्ध करना पड़ा था।

युद्ध में घोड़ों की एक महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है। (प्रतीकात्मक चित्र)

भारतीय संस्कृति में शादी सिर्फ एक परंपरा ही नहीं उससे बढ़कर एक जीवन के रुप में माना जाता है। शादी को एक उत्सव के रुप में मनाया जाता है। इसमें अनेकों तरह की परंपराएं होती है जिसमें से एक है कि दूल्हा बारात लेकर घोड़ी पर ही क्यों जाता है। माना जाता है कि अपनी भाभी और बहन से शगुन के बाद ही दूल्हा घोड़े पर बैठकर अपने जीवनसाथी को लेने जाता है। ये सवाल हर किसी के दिमाग में एक बार अवश्य आया होगा कि दूल्हा सिर्फ घोड़ी पर ही क्यों बारात लेकर जाता है। प्राचीन मान्यताओं के अनुसार माना जाता है कि प्राचीन समय में दूल्हा विवाह के लिए जाता था तब वीरता के प्रदर्शन के लिए उसे युद्ध करना पड़ता था, इस तरह के प्रसंग शास्त्रों में विद्यमान है।

रामायण के अनुसार जब माता सीता का स्वयंवर हो रहा था तो वहां शर्त भगवान शिव के त्रिशूल को तोड़ने की रखी गई थी। इस शर्त को भगवान राम ने पूरा किया था और जब वो माता सीता को वरमाला डालने के लिए आगे बढ़े तो वहां मौजूद सभी राजा महाराजा ने युद्ध के लिए तलवारे निकाल ली थी। परशुराम ने वहां आकर सभी को भगवान राम के बारे में बताया और कहा कि इनसे युद्ध मृत्यु को बुलाना है। इसके बाद भगवान राम का माता सीता के साथ विवाह हुआ। माना जाता है कि घोड़े पर आने वाला राजा बहुत ही बलवान होता है।

भगवान श्री कृष्ण का विवाह रुकमणी के साथ हुआ तब भी कृष्ण जी को युद्ध करना पड़ा था। युद्ध में घोड़ों की एक महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है। घोड़ों को वीरता और शौर्य का प्रतिक माना जाता था। समय बदला और स्वयंवर और युद्ध की परंपराएं खत्म हो गईं। घोड़ों से घोड़ी पर दूल्हा ले जाने का कारण है कि घोड़ी को बुद्धिमान, दक्ष और चालाक जानवर माना जाता है। इसके साथ ही माना जाता है कि घोड़ी पर एक स्वस्थ व्यक्ति माना जाता है। हिंदू धर्म में माना जाता है कि जो घोड़ी की बाग संभाल सकता है वो परिवार और उसकी जिम्मेदारियों को भी संभाल सकता है।

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