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जानिए, आखिर भगवान श्रीकृष्ण ने क्यों कहा दान देना है व्यर्थ

श्रीकृष्ण ने अर्जुन से दानवीर कर्ण की प्रशंसा की। यह सुनते ही अर्जुन बोले आखिर कर्ण ही क्यों सबसे बड़े दानी कहलाते हैं। मैं भी दान करता हूं तो मैं भी तो दानी हुआ।

Author नई दिल्ली | March 25, 2019 4:28 PM

हिन्दू धर्म में विश्वास रखने वाला हर व्यक्ति अपने जीवन में दान-पुण्य अवश्य करता है। बात जब दान की होती है तो सबसे पहले दानवीर कर्ण का नाम आता है। महाभारत में कर्ण एक ऐसा पत्र था जिसकी चर्चा आज भी सबसे बड़े दानी के रूप में की जाती है। आज हम आपको श्रीकृष्ण की एक घटना ऐसी घटना के बारे में बता रहे हैं जो दान से संबंधित है। इस घटना में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को यह प्रमाण दिया था कि कर्ण और अर्जुन में कौन बड़ा दानी है। साथ ही कृष्ण ने यह भी बताया था कि अर्जुन दान करने के बाद भी सबसे बड़े दानवीर क्यों नहीं कहलाए? हम आपको यह भी बता रहे हैं कि आखिर भगवान श्रीकृष्ण ने क्यों कहा कि दान देना व्यर्थ है। आगे एक प्रसंग के द्वारा इसे जानते हैं।

एक बार श्रीकृष्ण और अर्जुन एक गांव से गुजर रहे थे। श्रीकृष्ण ने अर्जुन से दानवीर कर्ण की प्रशंसा की। यह सुनते ही अर्जुन बोले आखिर कर्ण ही क्यों सबसे बड़े दानी कहलाते हैं। मैं भी दान करता हूं तो मैं भी तो दानी हुआ। इस पर कृष्ण मुस्कुरा दिया और उन्होंने सामने दो लंबे पर्वतों को सोने का बना दिया और कहा-अर्जुन ये दोनों सोने के पर्वत हैं। इन दोनों स्वर्ण पर्वतों को गांव वालों में दान करके आओ लेकिन याद रहे कि दोनों पर्वतों का एक-एक हिस्सा दान में जाना चाहिए। तुम अपने लिए कुछ भी नहीं रखोगे।

अर्जुन से श्रीकृष्ण से आशीर्वाद लिया और गांव गए। वहां सभी गांव वालों को इकट्ठा किया। अर्जुन ने गांव वालों से कहा कि सभी लाइन में खड़े हो जाओ। इसके बाद अर्जुन ने सोना बांटना शुरू कर दिया। अर्जुन के इस काम को लोगों ने बहुत सराहा और फिर अर्जुन की जय-जय कार शुरु हो गई। अपनी जयकार सुनकर अर्जुन फुले नहीं समाए। गांव के लोग सोना लाते और दुबारा लाइन में लाग जाते। इस तरह पूरे दो दोनों तक अर्जुन ऐसे ही करते रहे।

दो दिन बाद भी सोने का पहाड़ रत्ती भर भी कम नहीं हुआ। इस तरह अर्जुन पसीने-पसीने हो गए लेकिन गांव वालों से अपनी जयकार सुनकर फिर जोश में आ जाते और फिर कोशिश करते। पहाड़ कम होने का नाम ही नहीं ले रहा था। आखिर अर्जुन बोले-हे केशव! क्षमा चाहता हूं मैं ये काम और नहीं कर पाउंगा। श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा- कौंतेय तुम्हें सच में विश्राम की आवश्यकता है।

इतने में श्रीकृष्ण ने कर्ण को बुलाया और यही कहा कि तुम इन दोनों स्वर्ण पर्वतों को गांव वालों के बीच बांट आओ। कर्ण ने श्रीकृष्ण की आज्ञा का पालन करते हुए गांव वालों को बुलाया और कहा- ये सोना आप सभी का है आप जितना चाहें ले लें और आपस में बांट लें। इसके बाद कर्ण वहां से चले गए। ये देखकर अर्जुन पहले तो बहुत हैरान हुए। फिर उन्होंने श्रीकृष्ण से पूछा हे केशव! मुझे समझ में नहीं आता।

ऐसा करने का विचार मेरे मन में क्यों नहीं आया। जिस पर श्रीकृष्ण मुस्कुरा कर कहने लगे कि पार्थ सच तो ये है कि तुम्हें स्वर्ण से मोह हो गया था और तुम आकलन कर रहे थे कि किसकी कितनी जरुरत है। और उसी हिसाब से तुम सोना गांव वालों के बीच बांट रहे थे। जब गांव वाले तुम्हारी जय जयकार कर रहे थे तो तुम खुद को दाता समझने लगे। इसके उलट कर्ण ने ऐसा कुछ भी नहीं किया। उसने दोनों सोने के पर्वत गांव वालों में बांट दिया। कर्ण चाहते ही नहीं थे कि उसकी जय जयकार हो।

कर्ण को इस बात से फर्क ही नहीं था कि लोग उसकी पीठ के पीछे क्या बोल रहे हैं। साथ ही कर्ण के मन में दाता होने का भाव भी उत्पन्न नहीं हुआ। कर्ण अच्छे से जानते थे कि वो एक माध्यम हैं। जो परमात्मा द्वारा दी गई चीजों को लोगों तक पहुंचा रहे हैं। दान कुछ भी पाने की इच्छा से नहीं किया जाता है। इस प्रकार श्रीकृष्ण ने बताया कि वैसा दान व्यर्थ है जिसमें किसी चीज को पाने की इच्छा हो।

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