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IIT-IIM के बाद आध्यात्म की शरण में क्यों गए आचार्य प्रशांत? जानिए यहां

हर आदमी की अपनी एक यात्रा होती है और उस यात्रा में उसके 10 कारण होते हैं जो उसके पीछे लगे रहते हैं, तुम्हारी अपनी यात्रा है जो तुम्हे तुम्हारे कॉलेज से लेकर जा रही है...यात्रा यात्रा है..ये विचार हैं आचार्य प्रशांत के।

आचार्य प्रशांत

आचार्य प्रशांत से जब पूछा गया कि आईआईटी आईआईएम, सिविल सर्विसेज का एग्जाम पास करते आध्यात्म की राह पर क्यों चले गए? तब उन्होंने अपनी पूरी यात्रा का विवरण कुछ इस तरह से दिया। हर आदमी की अपनी एक यात्रा होती है और उस यात्रा में उसके 10 कारण होते हैं जो उसके पीछे लगे रहते हैं, तुम्हारी अपनी यात्रा है जो तुम्हे तुम्हारे कॉलेज से लेकर जा रही है…यात्रा यात्रा है उसे आम या खास लेवल देने का काम तुम करते हो..तुमने तय कर लिया है कि इस इस जगह से होकर अगर कोई आदमी गुजरा तो बहुत खास है और अगर इन जगहों से होकर नहीं गुजरा तो कोई विशेष बात नहीं है। तुमको बाहर बैठकर जो बातें बड़ी आकर्षक लगती हैं वो बातें हो सकता है उसे बिल्कुल सामान्य सी लगती हैं जो उनके करीब होकर ही पूरी तरह गुजर चुका है। कई बार तो यह बात मुझ पर आरोप की तरह डाली जाती है कि अच्छा खुद तो कर आए सब आईआईटी, आईआईएम, सिविल सर्विसेज और हमसे कहते हो सक्सेज के पीछे मत भागो.. और कहा जाता है कि तुमने तो कर लिया सब अब हमें तो करने दो। लेकिन मैंने कर नहीं लिया..हो गया और माफी मांगता हूं…धोखे से हो गया…लेकिन न धोखा है न गलती है..सही मायने में यह एक यात्रा है..गति है, मूवमेंट है..न उसके पाने में कुछ विशेष था और छोड़ने में कुछ विशेष है…तुम्हें लग रहा है मैं ऐश नहीं कर रहा, मुझसे तो पूछ लो मैं कर रहा हूं कि नहीं?

इस मोहब्बत के लिए अध्यात्म की राह
जिंदगी प्यार की दो-चार घड़ी होती है ताज हो तख्त़ हो या दौलत हो जमाने भर की कौन सी चीज मोहब्बत से बड़ी होती है? तो इतना मुश्किल भी नहीं है समझ पाना…कि क्या है और क्यों है..ये जो आम मोहब्बत होती है जिसमें आप किसी आदमी या औरत के पीछे भाग लेते हैं उसमें भी गाने वाले को यह समझ आ गया कि मोहब्बत सबसे परे है…लेकिन एक दूसरी मोहब्बत भी होती है और जब वो मिल जाती है या समझलो मिल गई फिर महाअय्याशी है..उससे बड़ी दूसरी ऐश है। गीता में एक चैप्टर है ऐश्वर्य योग..ऐश्वर्य जो निकलता है ईश्वर से, जिसका मतलब सबसे भरा हुआ..यहां मैं कोई देवी देवता की बात नहीं कर रहा हूं…मैं अपनी बात कर रहा हूं..जब यह समझना आने लगता है कि मैं क्या हूं और मुझे एक ऐसी जिंदगी जीनी है। तो फिर आप उन राहों को महत्व नहीं देते जिस पर सब चल रहे हैं…यह बहुत छोटी सी जिंदगी है इसे वही सब करके गुजार दिया जो करने का आदेश दूसरे दे रहे हैं तो पागल हूं मैं….पहले देखना पड़ेगा कि मैं कौन हूं और मुझे करना क्या है। एक बार समझ में आया कि क्या पसंद है क्या नहीं है..क्या अपना है और क्या है…फिर तुम कहते है हो कि मुझमें इतनी ऐश है कि जो दूसरों में बटे, जिसका स्वाद दूसरे भी चख सकें..वही अद्वतीय है। मैं भरख रहा था कि मुझे कुछ मिल गया..रही होंगी कुछ परिस्थियां जिनकी वजह से मिल गया..होगा कोई मूल कारण…पर जो खुद जाना है वो इतना मजेदार है कि उसको जितना बाटों मजा उतना और बढ़ता है…फिर यह परवाह नहीं रह जाती है कि दौलत कितनी है…गाजियाबाद में बैठो या जर्मनी में..वो सब बातें बहुत छोटी हो जाती हैं..कुछ और है जो बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है।

तुम जिन चीजों के पीछे भागते हो..जो तुम्हे सपने की तरह लगती है..तुम्हारे सामने एक आदमी बैठा है, जो हर उस पढ़ाव से गुजर चुका है जिसके पीछे कोई भी भागता है और जो तुम्हारे पास बैठा हूं चक्कर पूरा करके..तुम कहते हो कि तुम्हे कुछ नहीं मिला और बहुत कुछ पाना है.. जो कुछ पाना है वो सब पाकर तुम्हारे सामने बैठा हूं…फिर मुझमें तुममें कोई अंतर नहीं है।

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