त्याग, तस्लीम (समर्पण) और रज़ा-ए-इलाही के आगे हर चीज़ कुर्बान कर देने का नाम है ईद-उल-अजहा है, जिसे आम तौर पर बकरीद कहा जाता है। इस्लामी कैलेंडर के मुताबिक यह मुकद्दस त्योहार ज़िलहिज्जा महीने की 10वीं तारीख को मनाया जाता है। यही वह मुबारक वक्त होता है जब दुनिया भर से लाखों मुसलमान फ़र्ज़-ए-हज अदा करने के लिए मक्का मुकर्रमा पहुंचते हैं। ईद-उल-अजहा का ताल्लुक हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम और उनके फ़रज़ंद (बेटे) हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम की अज़ीम कुर्बानी से जुड़ा हुआ है। रिवायतों के मुताबिक हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम को बुज़ुर्गी की उम्र में औलाद की नेमत हासिल हुई थी। फिर अल्लाह तआला ने उनके ईमान और फ़रमाबरदारी का इम्तिहान लेने के लिए उन्हें अपने सबसे प्यारे बेटे हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम को राह-ए-खुदा में कुर्बान करने का हुक्म दिया।

हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने बिना किसी झिझक के अल्लाह के हुक्म के आगे सर-ए-तस्लीम ख़म कर दिया। जब वो अपने बेटे को ज़िबह करने के लिए तैयार हो गए और छुरी चला दी, तो अल्लाह तआला ने उनकी नियत, सब्र और मुकम्मल ईमानदारी को कबूल फरमाया। उसी वक्त हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम की जगह एक दुम्बा भेज दिया गया, जिसकी कुर्बानी दी गई। यही वह अज़ीम वाक़िआ है जिसकी याद में दुनिया भर के मुसलमान ईद-उल-अजहा पर कुर्बानी अदा करते हैं। यह त्योहार हमें अल्लाह की रज़ा के लिए अपनी सबसे अज़ीज़ चीज़ तक कुर्बान कर देने, सब्र, तक़वा और फ़रमाबरदारी का पैगाम देता है।

हज और बकरीद का क्या ताल्लुक है?

ईद-उल-अजहा यानी बकरीद का हज से बेहद गहरा रूहानी और मज़हबी ताल्लुक है। इस्लामी कैलेंडर के मुताबिक यह  त्योहार ज़िलहिज्जा महीने की 10वीं तारीख को मनाया जाता है। इस साल 28 मई 2026 को बकरीद मनाई जाएगी। यही वह मुबारक दौर होता है जब दुनिया भर से लाखों मुसलमान हज अदा करने के लिए मक्का मुकर्रमा पहुंचते हैं। बकरीद हजरत इब्राहीन और उनके बेटे की कुर्बानी से जुड़ी है, अल्लाह तआला ने उनकी नियत, तक़वा और मुकम्मल इताअत को कबूल फरमाया और हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम की जगह एक दुम्बा भेज दिया, जिसकी कुर्बानी दी गई। इसी अज़ीम वाक़िए की याद में दुनिया भर के मुसलमान ईद-उल-अजहा पर कुर्बानी अदा करते हैं। मिना’ (Mina) में हाजी जाकर अपनी कुर्बानी की रस्म पूरी करते हैं, जिसे ‘यौम-उल-नह्र’ कहा जाता है।

हज के दौरान भी इसी सुन्नत-ए-इब्राहीमी को ज़िंदा किया जाता है। हुज्जाज (हाजी) मक्का के करीब मिना में रमी-जमरात (शैतान को कंकरी मारना), वक़ूफ़-ए-अराफात और मुजदलफा में क़ियाम (रुकना) जैसी अहम इबादात अदा करने के बाद कुर्बानी करते हैं। यही वजह है कि हज और ईद-उल-अजहा को एक-दूसरे से जुड़ी हुई अज़ीम इबादतें माना जाता है। यह त्योहार मुसलमानों को सब्र, कुर्बानी, तक़वा, फ़रमाबरदारी और रज़ा-ए-इलाही के लिए हर चीज़ न्योछावर कर देने का पैग़ाम देता है। हजरत इब्राहीम का वाक्या ये जाहिर करता है कि अल्लाह तक न गोश्त पहुंचता है और न खून, बल्कि इंसान का तकवा और नियत पहुंचती है।

बकरीद में किन-किन जानवरों की होती है कुर्बानी

इस्लाम में बकरीद पर कुर्बानी का खास महत्व है। आमतौर पर लोग बकरे की कुर्बानी के बारे में जानते हैं, लेकिन शरीयत के अनुसार कुछ और जानवरों की भी कुर्बानी दी जा सकती है। हर जानवर के लिए अलग नियम और शर्तें बताई गई हैं। हालांकि कई इस्लामिक देशों में कुर्बानी को लेकर स्थानिय नियम हैं जिनका पालन करना पड़ता है।

बकरा या बकरी

सबसे ज्यादा बकरा या बकरी की कुर्बानी दी जाती है। इस्लाम में बकरे और बकरी की कुर्बानी के लिए भी कुछ नियम बताएं गए हैं। इस नियम के मुताबिक जानवर के पैदा हुए बच्चे की कुर्बानी नहीं की जा सकती। जिस बकरे या बकरी की कुरबानी की जाएगी उसकी उम्र कम से कम 1 साल होनी चाहिए। एक बकरा सिर्फ एक व्यक्ति की तरफ से कुर्बान किया जाता है।

भेड़ और दुंबा की भी होती है कुर्बानी

भेड़ की कुर्बानी भी इस्लाम में जायज मानी गई है। अगर भेड़ अच्छी और तंदुरुस्त हो तो 6 महीने की उम्र भी काफी मानी जाती है। यह भी एक व्यक्ति की तरफ से कुर्बान की जाती है। इस्लामी शरीयत में भेड़ और दुंबा दोनों की कुर्बानी जायज मानी गई है। हदीस और इस्लामी रिवायतों में दुम्बे का खास जिक्र मिलता है। माना जाता है कि हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के बेटे हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम की जगह अल्लाह तआला ने जो जानवर भेजा था, वह दुम्बा था। दुम्बा एक खास तरह की भेड़ होती है, जिसकी कुर्बानी कई मुस्लिम देशों में आम है।

ऊंट की भी होती है कुर्बानी

ऊंट की कुर्बानी को भी इस्लाम में मान्यता दी गई है। ऊंट की उम्र कम से कम 5 साल होनी चाहिए।  इसमें भी 7 लोगों तक की हिस्सेदारी हो सकती है। अरब देशों में ऊंट की कुर्बानी ज्यादा प्रचलित है।  

गाय और बैल की कुर्बानी

इस्लाम में गाय, बैल या भैंस की कुर्बानी भी जायज़ मानी जाती है। इन जानवर की उम्र कम से कम 2 साल होनी चाहिए।  इसमें 7 लोग हिस्सेदारी कर सकते हैं। हालांकि भारत के कई राज्यों गौ हत्या पर प्रतिबंध है, इसलिए उन राज्यों में गाय की कुर्बानी नहीं की जाती।

कुर्बानी के लिए किस तरह का जानवर होना चाहिए ?

इस्लामी नियमों के अनुसार उसी जानवर की कुर्बानी की जा सकती है जो जानवर स्वस्थ हो, उसे कोई बीमारी नहीं हो। उसके पैरों में कोई परेशानी नहीं हो वो कमजोर या बीमार नहीं हो। जानवर के आंख, कान या पैर में गंभीर चोट या परेशानी नहीं हो। जिस जानवर को जिबा किया जाएगा उसकी परवरिश और देखभाल अच्छे से की गई हो। माना जाता है कि खुदा को खुद का पाला हुआ जानवर की कुर्बानी करना खासतौर पर पसंद है। इस्लामिक मान्यताओं के मुताबिक कुर्बानी सिर्फ जानवर की नहीं, बल्कि अल्लाह की राह में अपनी सबसे प्रिय चीज छोड़ने की भावना का प्रतीक मानी जाती है। इसका मकसद त्याग, इंसानियत और तकवा (ईश्वरभय) को बढ़ावा देना है।

कुर्बानी का गोश्त बांटने का सुन्नत तरीका क्या है?

इस्लाम में कुर्बानी का गोश्त बांटने के लिए भी नियम बनाए गए है। इस्लामी शरीयत के अनुसार, कुर्बानी के बाद जानवर के मांस को तीन बराबर हिस्सों में बांटा जाता है।

  1. पहला हिस्सा समाज के गरीबों, यतीमों और जरूरतमंदों को दिया जाता है,  ताकि कोई भी त्योहार के दिन भूखा न रहे।
  2. दूसरा हिस्सा अपने रिश्तेदारों, दोस्तों और पड़ोसियों के लिए होता है जो आपसी भाईचारा मजबूत करता है।
  3. तीसरा हिस्सा परिवार का होता है जिसे घर में इस्तेमाल के लिए रखा जाता है।

ईद-उल-अज़हा पर सफाई, तहज़ीब और सामाजिक सौहार्द है जरूरी

एक जिम्मेदार शहरी और बा-शऊर मुसलमान होने के नाते, ईद-उल-अज़हा के मौके पर हमें चाहिए कि कुर्बानी का अमल खुले रास्तों, सड़कों या सार्वजनिक जगहों पर करने से गुरेज़ करें। कुर्बानी के बाद बचने वाले अवशेषों को इधर-उधर फेंकने के बजाय उन्हें सही तरीके से ज़मीन में दफ़्न किया जाए या नगर निगम की तरफ़ से तयशुदा डस्टबिन में डाला जाए। इससे ना सिर्फ़ सफाई और माहौल की पाकीज़गी बरकरार रहती है, बल्कि दूसरे नागरिकों को भी किसी तरह की परेशानी या तकलीफ़ का सामना नहीं करना पड़ता।

डिस्क्लेमर: यह लेख सामान्य इस्लामी मान्यताओं, ऐतिहासिक संदर्भों और शरीयत के स्थापित नियमों पर आधारित है। किसी भी विशिष्ट या स्थानीय फतवे,नियम की विस्तृत जानकारी के लिए अपने प्रामाणिक इस्लामी विद्वानों या मुफ्ती से सलाह लें।