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जानिए, हिन्दू धर्म में क्यों हैं इतने सारे देवी-देवता

सात्विक, राजसिक और तामसिक ये तीन मनुष्य की प्रकृति हैं। इन तीनों गुणों के मिश्रण से प्रत्येक व्यक्ति का एक व्यक्तित्व बनता है। जिस प्रकार की मनुष्य की प्रकृति है वह उसी प्रकार की प्रकृति के इष्ट से आकृष्ट होते हैं।

Author नई दिल्ली | March 15, 2019 12:27 PM
भगवान गणेश।

अक्सर लोग यह चर्चा करते हैं कि हिंदू धर्म में इतने सारे देवी-देवताओं की पूजा क्यों की जाती है। शिव जी, दुर्गा माता, गणेश जी, हनुमान जी, भगवान राम, कृष्ण आदि देवी-देवताओं के अलावा भी कई सारे मंदिर हैं। ऐसे में मनुष्य किस मार्च को चुने यह उसके लिए दुविधा की स्थिति जैसी हो जाती है। विदेशों में देखते हैं कि अक्सर लोगों को केवल एक भगवान की पूजा करनी है। भारत में तो सैकड़ों देवी-देवताओं की पूजा का विधान है। सबसे शक्तिशाली कौन हैं और भगवान के इस रेस में किसको सुप्रीम बनाएंगे और किसको असल में मानना चाहिए कि इस एक देवी या देवता की पूजा में जुड़ना है या करनी चाहिए। इस्कॉन मंदिर के रुक्मिणी कृष्ण प्रभु के द्वारा आगे हम इसे जानते हैं।

हिंदू धर्म में इतने सारे देवी-देवता होने के कारण एक साधारण आदमी यह कहता है कि मुझे किसी की पूजा नहीं करनी है। मैं किसी का बुरा नहीं करूंगा, मुझे इन झंझटों में नहीं फंसना है। ऐसे में रुक्मिणी कृष्ण प्रभु का कहना है कि इसके लिए हमें वेदों की गहराई में जाना पड़ेगा। वे कहते हैं कि वास्तव में वेद ज्ञान है यानि भगवान की वाणी। भगवान ने जब इस भौतिक जगत के संचालन के लिए एक दिशा निर्देश दिया और वही वेद कहलाता है। वेद मानव समाज के हर पहलु पर प्रकाश डालता है। साथ ही हर पहलु में हमे कैसे जीना चाहिए इसका हमारे लिए मार्गदर्शन करता है।

आगे रुक्मिणी कृष्ण प्रभु कहते हैं कि वेदों में हर मानव की अलग-अलग प्रकृति के अनुसार मानव की प्रकृति को तीन हिस्सों में बांटा गया है। सात्विक, राजसिक और तामसिक ये तीन मनुष्य की प्रकृति हैं। इन तीनों गुणों के मिश्रण से प्रत्येक व्यक्ति का एक व्यक्तित्व बनता है। जिस प्रकार की मनुष्य की प्रकृति है वह उसी प्रकार की प्रकृति के इष्ट से आकृष्ट होते हैं। लेकिन यदि एक तमोगुणी व्यक्ति को बोला जाए कि आप सतो गुण के इष्ट को स्वीकार करें तो उस व्यक्ति का उसके प्रति आकर्षण ही नहीं होगा। और जब आकर्षण ही नहीं होगा तो वो उनकी पूजा भी नहीं करेगा।

इसलिए इन्हीं तीन प्रकृतियों के अनुसार ही वैदिक शास्त्रों में 18 पुराणों को अलग-अलग तीन श्रेणियों में बांटा गया है। साथ ही अलग-अलग पुराणों में अलग-अलग देवी-देवताओं की उत्कृष्टता को बताया गया है। जैसे कि तमोगुण पुराणों में बताया गया है कि भगवान शिव की ही पूजा सर्वश्रेष्ठ है। इस सृष्टि की उत्पत्ति भी शिव जी से ही हुई है। लेकिन जो सत्व गुणी पुराण हैं वो परम सत्य के ओर ले जाते हैं। इन पुराणों में ऐसा बताया है कि जो विष्णु हैं जिनका भगवान श्रीकृष्ण से विस्तार होता है। इसलिए हिंदू धर्म में जो 33 कोटि देवी-देवता हैं उनके होने के पीछे मनुष्य मनुष्य की प्रकृति है। यही कारण है कि शास्त्रों में इतने सारे देवी-देवताओं का उल्लेख मिलता है।

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