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सफलता का आधार है गलती

हम सब अपने जीवन में कई तरह की गलतियां करते हैं। गलतियां इतनी बुरी नहीं होती, जितनी हम उन्हें बना देते हैं।

Religionसांकेतिक फोटो।

हम सब अपने जीवन में कई तरह की गलतियां करते हैं। गलतियां इतनी बुरी नहीं होती, जितनी हम उन्हें बना देते हैं। हर बात का सकारात्मक और नकारात्मक पहलू होता है। अगर हम सकारात्मक पहलू की तरफ भी ध्यान दें तो हमें नकारात्मकता में भी कहीं न कहीं आशा की किरण दिखाई देगी। गलती का सकारात्मक पहलू यह है कि गलती ही हमारी सफलता का वास्तविक आधार है।

यह बात सुनने में अजीब लगेगी लेकिन कटु सत्य यही है। दरअसल, गलती करना एक स्वाभाविक और प्राकृतिक प्रक्रिया है। हमारे घर-परिवार, समाज और कार्यालय में गलती करने वाले व्यक्ति को संदेह की नजर से देखा जाता है। कभी उसका मजाक बनाया जाता है तो कभी उस पर व्यंग्य के तीर छोड़े जाते हैं। यही कारण है कि गलती करने वाला व्यक्ति स्वयं को भी संदेह की नजर से देखने लगता है। कभी-कभी उसे आत्मग्लानि भी महसूस होती है।

जब गलती से बचने के लिए हम अतिरिक्त सतर्कता बरतते हंै तो गलती होने की संभावना और बढ़ जाती है। अतिरिक्त सतर्कता बरतने के कारण हमारा मस्तिष्क सहज नहीं रह पाता है। सहज मस्तिष्क ही सहज रूप से शारीरिक क्रियाकलापों को अंजाम देता है। मस्तिष्क सहज न रह पाने का असर हमारे शारीरिक क्रियाकलापों पर भी पड़ता है और इस तरह हम एक और गलती की तरफ बढ़ रहे होते हैं। इसलिए बार-बार गलती करने वाले इंसान को केवल डांट-डपट या डर के माध्यम से ही नहीं सुधारा जा सकता। अगर गलती करने वाले इंसान में डर बैठ जाएगा तो वह पुन: गलती करेगा। यह हमारा कर्तव्य है कि हम कुछ ऐसे उपाय करें, जिससे कि बार-बार गलती करने वाला इंसान सहज बना रहे।

सहकर्मियों का यह भी कर्तव्य है कि वे उसकी गलती को हव्वा बनाकर पेश न करें। इंसान अगर काम करेगा तो गलती भी करेगा ही। कुछ भी काम न करने वाला अथवा खाली रहने वाला इंसान क्या खाक गलती करेगा। इसलिए हमें यह समझना चाहिए कि गलती से ही तरक्की की राह निकलती है। कुछ लोग इसलिए नया काम करने से डरते है कि कहीं गलती न हो जाए। ऐसे लोग हमेशा आगे बढ़ने से डरते हैं और पिछली पंक्ति का इंसान बनकर रह जाते हैं। संसार में जितने भी महान लोग हुए हैं उन्होंने अपने जीवन में अनेक गलितयां हैं।

गलतियों के माध्यम से ही वे महानता की तरफ अग्रसर हुए हैं। वैज्ञानिक जब प्रयोगशाला में अपने प्रयोग करते हैं तो उनसे अनेक गलतियां होती हैं। ये ही गलतियां उनके प्रयोगों की सफलता का आधार बनती है। इसलिए गलतियों को जीवन का हिस्सा मानकर और उनसे सबक लेकर आगे बढ़ने में ही हमारी भलाई है। जैन धर्म में तो अपनी गलती स्वीकार कर क्षमा मांगने के लिए क्षमावाणी पर्व मनाया जाता है। इस दिन संसार के समस्त प्राणियों से जाने-अनजाने में की गई गलतियों के लिए क्षमा याचना कर सभी की खुशी के लिए कामना की जाती है। जब हम अपनी गलतियों के लिए क्षमा मांगते हैं तो हमें आत्मसंतुष्टि मिलती है और हमारा मन हल्का होता है। इस तरह माफी मांगकर हमारा बोझ भी कम होता है।

दरअसल, जब हम अपनी गलती स्वीकार करते हैं तो इसका अर्थ होता है कि हम अपने सब हथियार डालकर जाने-अनजाने में किए गए गलत काम को स्वयं भी गलत मान रहे हैं। इससे जहां एक ओर हमारा मानसिक दबाव कम होता है। दूसरी ओर, लोगों की नजरों मे हम सम्मान के पात्र भी बनते हैं। जब हम दिल से अपनी गलती को स्वीकार करते हैं तो दोबारा वह गलती होने की संभावना कम हो जाती है। हम दोबारा तभी गलती करते हैं जब हम पहली गलती के बारे में या तो सोचते नहीं हैं या फिर फौरी तौर पर सोचते हैं।

जब हम अपनी गलती स्वीकार करते हैं तो दिल से उसके बारे में सोचते हैं। इसलिए गलती के बारे में दिल से सोचेंगे तो हमें उसमें भी सकारात्कता दिखाई देगी। यानी गलती ही हमें हमारी सफलता का आधार दिखाई देगी। जब हम बार-बार गलती करते हैं तो गलती करना हमारी आदत बन जाती है। जब यह आदत पक जाती है तो हम स्वयं तो दुखी होते ही हैं, दूसरों को भी दुख देते हैं। बहरहाल बार-बार गलती करने की आदत छोड़िए और एक-दो गलती के बाद आत्मचिंतन कीजिए। यह आत्मचिंतन ही हमें सही राह दिखाएगा।

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