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Vishwakarma Jayanti 2020: देवताओं के शिल्पकार भगवान विश्वकर्मा की है जयंती, जानें कैसे करें पूजा और क्या है शुभ मुहूर्त

Vishwakarma Jayanti 2020, Shubh Muhurat, Puja Vidhi, Katha in Hindi: भगवान विश्वकर्मा के विभिन्न रूपों का उल्लेख अलग-्अलग धर्म पुराणों में मिलता है- दो बाहु वाले, चार बाहु और दस बाहु वाले विश्‍वकर्मा। इसके अलावा एक मुख, चार मुख एवं पंचमुख वाले विश्‍वकर्मा।

भगवान विश्वकर्मा की जयंती पर कुछ इस तरह करें उनकी पूजा

Vishwakarma Jayanti 2020, Shubh Muhurat, Puja Vidhi, Katha in Hindi: विश्वकर्मा जयंती ज्यादातर जगहों पर 16 या 17 सितंबर को कन्या संक्रांति के दिन मनाया जाता है। लेकिन राजस्थान और गुजरात के कई हिस्सों में भगवान विश्वकर्मा का जन्मदिन 7 फरवरी को भी मनाया जाता है। विश्वकर्मा एक महान ऋषि के साथ ही शिल्पकार और ब्रह्मज्ञानी थे। ऋग्वेद में भी कई जगह उनका उल्लेख देखने को मिलता है। मान्यता है कि  उन्होंने ही देवताओं के घर, नगर, अस्त्र-शस्त्र आदि का निर्माण किया था। हस्तिनापुर, द्वारिका, इंद्रपुरी, पुष्पक विमान, भगवान शिव का त्रिशूल जैसे कई भवनों और वस्तुओं के निर्माता विश्वकरमा ही हैं। कर्ण का कुंडल, विष्णु का सुदर्शन चक्र आदि का निर्माण भी उन्होंने ही किया था।

उत्पत्ति के अलग-अलग प्रमाण: विश्वकर्मा जी का जन्म कैसे हुआ इस बात को लेकर कई तरह की चर्चाएं होती हैं। एक के अनुसार, ब्रह्मा के पुत्र धर्म थे जिनकी पत्नी का नाम था वस्तु। धर्म की पत्नी वस्तु की कोख से पैदा हुए सातवें पुत्र वास्तु थे, जो शिल्पशास्त्र के आदि प्रवर्तक थे। उन्हीं वास्तुदेव की अंगिरसी नामक पत्नी से विश्वकर्मा उत्पन्न हुए थे। वहीं, स्कंद पुराण के अनुसार धर्म ऋषि के आठवें पुत्र प्रभास का विवाह देव गुरु बृहस्पति की बहन भुवना ब्रह्मवादिनी से हुआ था। भगवान विश्वकर्मा का जन्म भुवना ब्रह्मवादिनी की कोख से ही हुआ था। महाभारत आदिपर्व अध्याय 16 श्लोक 27 एवं 28 में भी इसका स्पष्ट उल्लेख मिलता है।

इसके अलावा वराह पुराण के अ.56 में उल्लेख मिलता है कि सब लोगों के उपकारार्थ ब्रह्मा परमेश्वर ने बुद्धि से विचारकर विश्वकर्मा को पृथ्वी पर उत्पन्न किया।

क्या है पूजा करने की विधि: इस दिन भक्तों को सूरज निकलने से पहले ही उठ कर नित्यकर्म से मुक्त हो जाना चाहिए। इसके बाद रोजाना उपयोग में आने वाली मशीनों को साफ करें। फिर नहाकर पूजा वाले स्थान पर बैठ जाएं। भगवान विष्णु के साथ भगवान विश्वकर्मा की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। दोनों देवताओं को कुमकुम, अक्षत, अबीर, गुलाल, मेंहदी, हल्दी, वस्त्र, फूल आदि समर्पित करें। आटे की रंगोली बनाकर उसके ऊपर सात प्रकार के अनाज रखें। इसके ऊपर जल भरकर एक कलश की स्थापना करें।

इसके अलावा, एक बर्तन में चावल रखकर समर्पित करें और भगवान वरुण देव का ध्यान करें। भगवान विष्णु और भगवान विश्वकर्मा को ऋतुफल, मिष्ठान्न, पंचमेवा, पंचामृत का भोग लगाएं। दीप-धूप आदि जलाकर दोनों देवताओं की आरती उतारें।

तिथि और मुहूर्त: विश्वकर्मा पूजा घर के साथ ही दुकान, फैक्ट्री, दफ्तर और कार्यालयों में भी होता है। इस दिन भगवान विश्वकर्मा के साथ ही उनके वाहन हाथी की भी पूजा होती है। इस दिन जहां सूर्योदय सुबह 7 बजकर 8 मिनट पर होगा वहीं, सूर्यास्त शाम के 6 बजकर 13 मिनट पर होगा। इसके अलावा, इस दिन त्रयोदशी की शुरुआत 6 फरवरी को ही रात के 8 बजकर 13 मिनट से हो जाएगी।

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