Vikat Sankashti Chaturthi Vrat Katha (विकट संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा): वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को विकट संकष्टी चतुर्थी तिथि का व्रत रखा जा रहा है। इस दिन भगवान गणेश की विधिवत पूजा करने के साथ-साथ व्रत रखने का विधान है। मान्यता है कि इस दिन भगवान गणेश की पूजा करने से सुख-समृद्धि, धन-वैभव की प्राप्ति हो सकती है। इस दिन गणेश जी की पूजा करने के साथ चंद्रोदय पर अपना व्रत खोलना चाहिए। इसके साथ ही इस दिन व्रथ कथा का पाठ करना चाहिए। इससे शुभ फलों की प्राप्ति हो सकती है। जानें संकष्टी चतुर्थी की व्रत कथा…
विकट संकष्टी चतुर्थी तिथि 2026 (Vikat Sankashti Chaturthi 2026 Date)
वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि आरंभ: 5 अप्रैल 2026, रविवार को सुबह 11:59 बजे से
वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि समाप्त: 6 अप्रैल 2026, सोमवार को दोपहर 02:10 बजे तक
विकट संकष्टी चतुर्थी 2026 तिथि- उदया तिथि और चंद्रोयग के हिसाब से विकट संकष्टी चतुर्थी का व्रत 5 अप्रैल 2026, रविवार को रखा जाएगा।
विकट संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा (Vikat Sankashti Chaturthi Vrat Katha)
एक समय की बात है, एक राज्य में धर्मकेतु नाम के एक विद्वान ब्राह्मण रहते थे। उनकी दो पत्नियां थीं सुशीला और चंचला। सुशीला अत्यंत धार्मिक और आस्थावान थी, जबकि चंचला का धर्म-कर्म में कोई विशेष विश्वास नहीं था। व्रत और उपवास करने के कारण सुशीला का शरीर कमजोर हो गया था, जबकि चंचला स्वस्थ और सुदृढ़ थी।
समय बीतने पर सुशीला को एक पुत्री हुई और चंचला को पुत्र की प्राप्ति हुई। इस पर चंचला ने व्यंग्य करते हुए सुशीला से कहा कि तुम इतने व्रत-उपवास करती हो, फिर भी तुम्हें पुत्री मिली, जबकि मैंने कुछ नहीं किया और मुझे पुत्र प्राप्त हुआ। चंचला की ये बातें सुनकर सुशीला बहुत दुखी हुई, लेकिन उसने अपनी श्रद्धा और भक्ति नहीं छोड़ी।
जब विकट संकष्टी चतुर्थी का व्रत आया, तो सुशीला ने पूरे समर्पण और श्रद्धा के साथ यह व्रत किया। उसकी सच्ची भक्ति से भगवान गणेश प्रसन्न हुए और उसे पुत्र प्राप्ति का आशीर्वाद दिया। कुछ समय बाद उसकी यह इच्छा पूरी भी हो गई। लेकिन दुर्भाग्यवश, उसके पति धर्मकेतु का देहांत हो गया। इसके बाद चंचला अलग रहने लगी, जबकि सुशीला अपने बच्चों के साथ उसी घर में रहकर उनका पालन-पोषण करने लगी।
सुशीला का पुत्र बहुत बुद्धिमान और गुणवान निकला। उसकी मेहनत और समझदारी से घर में समृद्धि आने लगी। यह देखकर चंचला के मन में ईर्ष्या उत्पन्न हो गई। एक दिन अवसर पाकर उसने सुशीला की पुत्री को कुएँ में धकेल दिया, लेकिन भगवान गणेश की कृपा से उसकी जान बच गई।
जब चंचला ने यह देखा कि स्वयं भगवान गणेश सुशीला और उसके परिवार की रक्षा कर रहे हैं, तो उसे अपने किए पर गहरा पछतावा हुआ। उसने तुरंत सुशीला से क्षमा मांगी। सुशीला ने उसे क्षमा कर दिया और उसे भी विकट संकष्टी चतुर्थी का व्रत करने की सलाह दी। चंचला ने श्रद्धा से यह व्रत किया, जिससे उसके जीवन में भी सुख-समृद्धि आने लगी और भगवान गणेश की कृपा उस पर भी बरसने लगी।
डिस्क्लेमर: इस लेख में दी गई तिथि, शुभ मुहूर्त और धार्मिक महत्व की जानकारी सामान्य मान्यताओं, पंचांग और धार्मिक ग्रंथों पर आधारित है। संकष्टी चतुर्थी का समय और विधि अलग-अलग क्षेत्रों या परंपराओं में भिन्न हो सकती है। जनसत्ता इसकी पूर्ण सत्यता या सटीक परिणामों का कोई दावा नहीं करता है। किसी भी त्योहार की तिथि या पूजा विधि के बारे में अंतिम निर्णय लेने से पहले अपने क्षेत्र के विद्वान ज्योतिषी या पुरोहित से परामर्श अवश्य लें।
